कागजी ‘जादूगरी’ या भू-माफिया से सांठगांठ? बिलासपुर में राजस्व बाबुओं ने रातों-रात बढ़ा दिया जमीन का रकबा, निगल गए सरकारी सड़क
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग में राजस्व विभाग के कर्मचारियों और भू-माफियाओं के गठजोड़ का एक बड़ा और सनसनीखेज मामला सामने आया है। चांटीडीह क्षेत्र में स्थित एक मूल भूखंड के सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर कर रातों-रात उसका क्षेत्रफल बढ़ा दिया गया। इस कूट रचना के जरिए सरकारी सड़क और एक अन्य व्यक्ति की पैतृक निजी भूमि को हड़प लिया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि पटवारी जांच में फर्जीवाड़ा साबित होने के बाद भी सात महीनों से न्याय की फाइल तहसील कार्यालय में धूल फांक रही है और पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।

इस पूरे खेल में सबसे शर्मनाक पहलू प्रशासनिक उदासीनता का है। पीड़ित द्वारा लगातार गुहार लगाने और पटवारी प्रतिवेदन में साफ-साफ फर्जीवाड़ा उजागर होने के बावजूद, पिछले सात महीनों से अधिक समय से न्याय की फाइल तहसील और एसडीएम कार्यालय के चक्कर काट रही है। रसूखदार आरोपियों को बचाने के लिए फाइल को लगातार दबाने की कोशिश की जा रही है, जिससे शासन के भ्रष्टाचार विरोधी दावों पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं।
सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर और 0.70 एकड़ भूमि बनी 0.77 एकड़
इस पूरे सुनियोजित फर्जीवाड़े के मुख्य पीड़ित चांटीडीह निवासी विष्णु प्रसाद यादव हैं। विष्णु प्रसाद यादव के अनुसार, चांटीडीह क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले खसरा नंबर 381/7 की मूल भूमि का वास्तविक और वैध क्षेत्रफल 0.70 एकड़ था। यह भूमि उनके पैतृक अधिकारों के तहत दर्ज थी। लेकिन राजस्व विभाग के कुछ भ्रष्ट बाबुओं ने भू-माफियाओं से मोटी रकम लेकर और सांठगांठ कर सरकारी दस्तावेजों में कूट रचना की।
विभाग के इन जादूगरों ने रातों-रात कागजों पर इस 0.70 एकड़ की मूल भूमि को बढ़ाकर 0.77 एकड़ दर्शा दिया। कागजों पर बढ़े हुए इस 0.07 एकड़ के रकबे को पूरा करने के लिए मौके पर मौजूद आम जनता के उपयोग की सरकारी सड़क और शिकायतकर्ता विष्णु प्रसाद की पैतृक निजी भूमि को इस विवादित खसरे के भीतर अवैध रूप से शामिल कर लिया गया।
भू-माफिया और रजिस्ट्री का त्रिकोणीय खेल
कागजों पर रकबा बढ़ते ही भू-माफियाओं और जमीन के कथित विक्रेताओं का सिंडिकेट सक्रिय हो गया। जमीन के मूल विक्रेता अशोक मौर्य ने कूट रचित और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर इस बढ़े हुए रकबे का खेल रचा। अशोक मौर्य ने इस फर्जी क्षेत्रफल को वैध बनाने के लिए क्रेता राजकुमारी पाण्डेय और पूजा कछवाहा के साथ मिलकर एक सोची-समझी साजिश तैयार की।
इन सभी आरोपियों ने आपसी मिलीभगत से जमीन की एक काल्पनिक और भ्रामक चौहद्दी (सीमा निर्धारण) तैयार की। इस चौहद्दी के सहारे उप-पंजीयक कार्यालय में जमीन की अवैध रजिस्ट्री भी करा ली गई। इस धोखाधड़ीपूर्ण रजिस्ट्री के कारण धरातल पर पीड़ित विष्णु प्रसाद यादव की वास्तविक और मौके पर काबिज 0.14 एकड़ पैतृक जमीन अचानक कम हो गई, जिस पर अब बाहरी लोगों का दावा ठोक दिया गया है।
तहसीलदार कार्यालय में धूल फांक रही न्याय की फाइल
जब पीड़ित विष्णु प्रसाद यादव को अपनी जमीन कम होने और सरकारी रिकॉर्ड में हुए इस बड़े हेरफेर की जानकारी मिली, तो उनके होश उड़ गए। वे तुरंत मामले के दस्तावेज लेकर राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुंचे। पीड़ित की शिकायत के बाद मामले की जांच के लिए हल्का पटवारी को निर्देशित किया गया था। पटवारी ने मौके का मुआयना करने और पुराने अभिलेखों का मिलान करने के बाद अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी।
पटवारी प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित हो गया कि खसरा नंबर 381/7 के रकबे में अवैध रूप से हेरफेर किया गया है और शिकायतकर्ता की भूमि को दबाया गया है। लेकिन इसके बाद प्रशासनिक संरक्षण का खेल शुरू हुआ। तत्कालीन तहसीलदार आकाश गुप्ता के कार्यालय में यह फाइल पहुंचने के बाद करीब छह से सात महीने तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही। प्रशासनिक अधिकारियों और बाबुओं द्वारा लगातार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा जाता रहा। वर्तमान समय में तत्कालीन तहसीलदार के स्थानांतरण के बाद यह संवेदनशील मामला प्रभारी तहसीलदार थवाईत के पास लंबित है, लेकिन पीड़ित को आज तक राहत नहीं मिल सकेंगी है।
शासकीय छुट्टी के दिन अवैध निर्माण और कब्जे का खेल
शिकायतकर्ता विष्णु प्रसाद यादव ने प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपे अपने शिकायती पत्र में एक और बेहद गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने बताया कि जमीन की अवैध क्रेता राजकुमारी पाण्डेय ने कानून और नगर निगम के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए एक सोची-समझी रणनीति के तहत काम किया। उन्होंने 17 अप्रैल 2026 को शासकीय अवकाश (छुट्टी के दिन) का फायदा उठाया, जब सभी सरकारी दफ्तर बंद थे।
छुट्टी के दिन का लाभ उठाते हुए आरोपियों ने भारी संख्या में मजदूरों और असामाजिक तत्वों को मौके पर बुलाया और आनन-फानन में पीड़ित की पैतृक जमीन पर अवैध कब्जा करते हुए वहां पक्की बाउंड्रीवाल खड़ी कर दी और ऊपर से शेड भी तान दिया। पीड़ित ने तत्काल इसकी लिखित शिकायत बिलासपुर नगर पालिक निगम के जोन क्रमांक सात के कार्यालय में दर्ज कराई थी। परंतु नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी के कारण उस दिन अवैध निर्माण को नहीं रोका जा सका, जिससे भू-माफियाओं के हौसले और बुलंद हो गए।
एसडीएम के हस्तक्षेप के बाद भी टेबल-टेबल घूमती रही फाइल
बिलासपुर राजस्व विभाग के भीतर फैले भ्रष्टाचार और लापरवाही का आलम यह है कि निचले स्तर के बाबू वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को भी ठेंगा दिखाने से नहीं चूक रहे हैं। मामले की शिकायत जब अनुविभागीय अधिकारी राजस्व (एसडीएम) तक पहुंची, तो उन्होंने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए तहसील कार्यालय से स्पष्ट रिपोर्ट मांगी थी।
परंतु तहसील कार्यालय के शातिर बाबुओं ने एसडीएम के आदेश के बाद भी फाइल को अटकाए रखा। बाबुओं ने फाइल पर स्पष्ट विधिक अभिमत न होने का एक तकनीकी बहाना बनाया और फाइल को वापस एसडीएम कार्यालय की तरफ मोड़ दिया। महीनों तक बाबू इस बेहद संवेदनशील और भ्रष्टाचार से जुड़ी फाइल को अपने पास लेने और उस पर अंतिम निर्णय के लिए आगे बढ़ाने से कतराते रहे। इस पूरे घटनाक्रम से साफ तौर पर जाहिर होता है कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक तंत्र के भीतर बैठे कुछ लोग सीधे तौर पर आरोपियों को बचाने और मामले को रफा-दफा करने के खेल में लिप्त हैं।
पारदर्शिता और डिजिटल रिकॉर्ड पर उठते गंभीर सवाल
छत्तीसगढ़ सरकार जहां एक तरफ भुइयां पोर्टल और डिजिटल भू-अभिलेखों के माध्यम से राजस्व विभाग में पूर्ण पारदर्शिता लाने का दावा कर रही है, वहीं बिलासपुर का यह मामला इन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। डिजिटल दौर में भी यदि बाबू अपनी कलम की ताकत से किसी की जमीन का रकबा कागजों पर बढ़ा सकते हैं, तो आम जनता की संपत्ति की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।
विष्णु प्रसाद यादव जैसे छोटे और मध्यम वर्गीय किसान एवं भूमि स्वामी आज न्याय के लिए दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं। बिलासपुर के जागरूक नागरिकों और पीड़ित परिवार ने अब इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच संभाग आयुक्त (कमिश्नर) और छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व मंत्री से करने की मांग की है, ताकि इस पूरे रैकेट का भंडाफोड़ हो सके और दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा सके।



