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पुलिस कस्टडी डेथ मामले में बड़ा खुलासा: पंकज बेक की मौत पर अदालत ने उठाए गंभीर सवाल, फिर से जांच के आदेश

बहुचर्चित पंकज बेक कस्टोडियल डेथ मामले में न्याय की एक नई किरण जगी है। पुलिस की जांच और आत्महत्या की कहानी में कई बड़े झोल पाए गए हैं। अदालत ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए मामले की नए सिरे से जांच का कड़ा आदेश दिया है। यदि पुलिस टीम निष्पक्ष जांच में विफल रहती है, तो मामला सीबीआई को सौंपा जा सकता है।







रायपुर, 01 जुलाई। कानून व्यवस्था की रक्षा करने और आम नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने वाली पुलिस जब खुद सवालों के घेरे में आ जाए, तो न्याय प्रणाली पर जनता का भरोसा डगमगाने लगता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग अंतर्गत अंबिकापुर के बहुचर्चित पंकज बेक कस्टोडियल डेथ मामले में कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। लगभग पांच साल पुराने इस संवेदनशील मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली, जांच की दिशा और गढ़े गए तथ्यों पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।

सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश महेश कुमार राज की अदालत ने पुलिस द्वारा पेश की गई जांच रिपोर्ट और कहानी को सिरे से खारिज करते हुए इसे बेहद संदेहास्पद माना है। अदालत ने मृतक के परिजनों की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया है और पूरे मामले की नए सिरे से निष्पक्ष जांच करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

न्यायिक हस्तक्षेप और सीबीआई जांच की चेतावनी

इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका शुरू से ही संदिग्ध रही है। मृतक पंकज बेक के परिजनों और उनके वरिष्ठ अधिवक्ता राजवर्धन सिंह ने अदालत के समक्ष पुलिस की कहानी की धज्जियां उड़ाने वाले कई ठोस तथ्य रखे। अधिवक्ता ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट और पुलिस द्वारा गढ़े गए आत्महत्या के सिद्धांत में मौजूद अंतर्विरोधों को प्रमुखता से उजागर किया। इन तथ्यों को सुनने के बाद अदालत ने स्पष्ट तौर पर माना कि पंकज बेक की मृत्यु पुलिस हिरासत के दौरान दम घुटने के कारण हुई है।

न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक की निगरानी में एक विशेष टीम गठित कर जांच करने को कहा है। अदालत ने सख्त हिदायत दी है कि यदि यह टीम निष्पक्ष जांच करने में जरा भी विफल साबित होती है, तो इस पूरे प्रकरण को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई के हवाले कर दिया जाएगा।

चोरी की राशि और एफआईआर दर्ज होने में भारी देरी

पूरे मामले की शुरुआत एक चोरी की शिकायत से हुई थी, लेकिन पुलिस की कार्रवाई ने इसे और उलझा दिया। शिकायतकर्ता तनवीर सिंह ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि सत्ताईस जून दो हजार उन्नीस को उसके घर से एक लाख रुपये की नकदी चोरी हो गई थी। हैरान करने वाली बात यह है कि इस घटना की नामजद एफआईआर पंद्रह दिन बाद यानी ग्यारह जुलाई दो हजार उन्नीस को दर्ज की गई। अदालत ने जांच एजेंसियों से सीधा सवाल किया कि घटना के तुरंत बाद पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई गई।

दूसरी ओर, पुलिस अधिकारियों ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने यह बयान दिया था कि हिरासत में लिए गए दोनों संदेहियों ने तेरह लाख रुपये की चोरी करना कबूल किया था। अदालत ने इस बिंदु पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पूछा कि जब मूल शिकायत ही मात्र एक लाख रुपये की थी, तो आरोपितों से तेरह लाख रुपये की स्वीकारोक्ति किस आधार पर और कैसे करवा ली गई।

शारीरिक क्षमता और दीवार फांदने की मनगढ़ंत थ्योरी

पुलिस ने अपनी केस डायरी में दावा किया था कि पंकज बेक पुलिस हिरासत से भाग निकला था। पुलिस की कहानी के अनुसार, पंकज ने परमार अस्पताल की लगभग आठ फीट ऊंची बाउंड्रीवॉल को फांदकर अंदर प्रवेश किया था। अदालत में इस कहानी की व्यावहारिकता पर सवाल खड़े किए गए। बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि पंकज बेक की ऊंचाई मात्र पांच फीट थी। एक पांच फीट के व्यक्ति के लिए बिना किसी सहारे के आठ फीट ऊंची चिकनी दीवार को फांदना व्यावहारिक रूप से असंभव प्रतीत होता है।

इसके अलावा, पुलिस ने पंकज के भागने का जो रास्ता बताया था, वहां जमीन पर कांच के टूटे हुए टुकड़े और नुकीली शीशियां बिखरी पड़ी थीं। पोस्टमार्टम और मेडिकल रिपोर्ट में पंकज के पैरों के तलवे या निचले हिस्से में खरोंच या कटने का एक भी निशान नहीं पाया गया। अदालत ने इसे पुलिस की कहानी का सबसे कमजोर और झूठा पहलू माना।

कूलर की जंजीर से फांसी का संदेहास्पद दावा

पुलिस ने पंकज बेक की मौत को आत्महत्या करार देते हुए बताया था कि उसने अस्पताल परिसर में रखे एक कूलर के पास फांसी लगा ली। पुलिस के अनुसार, कूलर की ऊंचाई जमीन से करीब नौ से दस फीट थी और फांसी के लिए पानी के पतले पाइप तथा कूलर बांधने वाली पतली लोहे की चैन का इस्तेमाल किया गया था।

इस सिद्धांत पर भी न्यायालय ने कड़े सवाल दागे। अदालत का तर्क था कि जब कोई व्यक्ति फांसी लगाता है, तो उसके शरीर में भारी छटपटाहट होती है और शरीर का पूरा वजन नीचे की ओर पड़ता है। ऐसी स्थिति में वह पतली चैन या पाइप टूट जाना चाहिए था, लेकिन घटनास्थल पर ऐसा कुछ भी टूटा हुआ नहीं मिला। अदालत ने जांच अधिकारियों से यह भी पूछा कि यदि मृतक के लिए इतनी ऊंचाई तक पहुंचना संभव था, तो उसने वहां मौजूद पेड़ का इस्तेमाल क्यों नहीं किया।

समय के अंतर्विरोध और अस्पताल प्रबंधन की अनभिज्ञता

घटना की रात के समय को लेकर पुलिस और अस्पताल प्रबंधन के बयानों में भारी विरोधाभास सामने आया है। पुलिस अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि रात लगभग एक बजे उन्हें पंकज के परमार अस्पताल के भीतर फांसी लगाने की पक्की सूचना मिल गई थी। एक आरक्षक मनीष सिंह के दीवार फांदकर अस्पताल के भीतर जाने की बात भी डायरी में लिखी गई थी।

लेकिन इसके बिल्कुल उलट, परमार अस्पताल के चिकित्सकों और स्टाफ ने बयान दिया कि उन्होंने बाइस जुलाई की सुबह छह बजे से साढ़े छह बजे के बीच युवक के शव को लटकते हुए पहली बार देखा था। न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर रोष व्यक्त करते हुए सवाल किया कि यदि पुलिस को रात एक बजे ही घटना की भनक लग गई थी, तो उन्होंने अस्पताल प्रबंधन को तुरंत सूचित क्यों नहीं किया और शव को सुबह तक उसी हालत में क्यों छोड़ दिया गया।

सीआरपीएफ जवान का बयान और कीचड़ का रहस्य

न्यायिक मजिस्ट्रेट की जांच के दौरान सीआरपीएफ के एक जवान दीपक का बयान भी दर्ज किया गया था। जवान ने दावा किया था कि उसने रात के करीब पौने बारह बजे एक व्यक्ति को केवल अंडरवियर पहने हुए भागते देखा था। अदालत ने इस बयान की सत्यता पर भी संदेह जताया। अदालत ने पूछा कि जब उक्त जवान की ड्यूटी रात बारह बजे से लेकर दो बजे तक निर्धारित थी, तो वह पौने बारह बजे घटनास्थल के पास क्या कर रहा था और उसने यह बात तुरंत अपने कमांडेंट को क्यों नहीं बताई।

इसके अतिरिक्त, मौसम को लेकर भी सवाल उठे। घटना जुलाई के महीने में बरसात के मौसम के दौरान हुई थी। बारिश के कारण चारों तरफ कीचड़ फैला हुआ था। भागने और दीवार चढ़ने की प्रक्रिया में मृतक के पैरों, तलवों और उंगलियों के बीच कीचड़ लगा होना चाहिए था, लेकिन शव परीक्षण में शरीर पर कहीं भी कीचड़ का नामोनिशान नहीं मिला।

पाइप पर चढ़ने की थ्योरी और पदचिह्नों की अनदेखी

पुलिस की जांच रिपोर्ट में एक और हैरान करने वाला दावा किया गया था कि पंकज छह फीट की दीवार फांदने के बाद एक कमजोर पानी के पाइप के सहारे नौ फीट की ऊंचाई तक पहुंच गया। अदालत ने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या कोई पांच फीट का सामान्य व्यक्ति किसी पतले पाइप के सहारे नौ फीट ऊपर चढ़ सकता है।

साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या वह प्लास्टिक या लोहे का पाइप इतना मजबूत था कि एक वयस्क व्यक्ति का पूरा वजन आसानी से सह सके। जांचकर्ताओं ने दीवार पर कुछ पैरों के निशान मिलने की बात भी कही थी, लेकिन फॉरेंसिक जांच में यह कहीं भी साबित नहीं किया गया कि वे निशान असल में पंकज बेक के ही थे। सीआरपीएफ कैंपस के पास से मिले पदचिह्नों की भी कोई वैज्ञानिक जांच नहीं की गई, जो पुलिस की घोर लापरवाही को दर्शाता है।

अहम साक्ष्यों को छिपाना और पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट

न्यायालय ने अभियोजन पक्ष और पुलिस के रवैये पर सख्त नाराजगी जाहिर की। सुनवाई के दौरान जब अदालत ने मामले से जुड़ी रोजनामचा, सानहा और मूल केस डायरी के अवलोकन की मांग की, तो पुलिस विभाग द्वारा इसे अदालत में पेश नहीं किया गया। चोरी के जिस आरोप में पंकज को पकड़ा गया था, उससे जुड़े कोई स्पष्ट सीसीटीवी फुटेज भी न्यायालय को नहीं दिखाए गए। उप संचालक अभियोजन द्वारा समय-समय पर जो कानूनी सुझाव दिए गए थे, पुलिस ने उन पर भी अमल करना उचित नहीं समझा। परिजनों ने शुरुआत से ही आरोप लगाया था कि पुलिसकर्मियों ने पंकज की पीट-पीटकर हत्या कर दी और बाद में खुद को बचाने के लिए शव को अस्पताल में लटका दिया।

तत्कालीन थाना प्रभारी विनीत दुबे और अन्य पुलिसकर्मियों पर मामला भी दर्ज हुआ था, लेकिन पुलिस ने खुद को बचाते हुए सत्ताईस जुलाई दो हजार तेईस को क्लोजर रिपोर्ट पेश कर मामला रफा-दफा कर दिया था। अब अदालत के इस नए आदेश से मृतक के परिजनों को न्याय मिलने की एक बड़ी आस बंधी है।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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