बस्तर की ढोकरा कला का वैश्विक मंच पर डंका: पीएम मोदी ने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री को भेंट की ‘ट्री ऑफ लाइफ’ शिल्पकृति
पीएम मोदी ने न्यूजीलैंड के पीएम क्रिस्टोफर लक्सन को छत्तीसगढ़ के बस्तर की प्रसिद्ध ढोकरा 'ट्री ऑफ लाइफ' कलाकृति भेंट की। जानिए 4000 साल पुरानी इस आदिवासी धातु शिल्प कला की पूरी कहानी और इसके वैश्विक सम्मान का सफर।

इस राजकीय भेंट के बाद से न केवल बस्तर बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के कला जगत और आदिवासी कारीगरों में भारी हर्ष का माहौल है। यह पहला मौका नहीं है जब देश के मुखिया ने राजनयिक संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए भारतीय हस्तशिल्प को चुना हो, लेकिन बस्तर की 4,000 साल पुरानी इस कलाकृति का चयन होने से छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों का हौसला सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और राज्य के संस्कृति विभाग ने इस उपलब्धि को ऐतिहासिक बताया है। उनका कहना है कि बस्तर के घड़वा और माड़िया कलाकारों द्वारा अपने पसीने से सींची गई यह विधा आज दुनिया के महानतम नेताओं के ड्राइंग रूम की शोभा बन रही है, जो राज्य के लिए गौरव का विषय है।

सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी है बस्तर की ढोकरा कला
ढोकरा शिल्प जिसे स्थानीय बोलचाल में ‘बेलमेटल’ (घंटी धातु) कला भी कहा जाता है, मानव इतिहास की सबसे पुरानी धातु ढलाई तकनीकों में से एक है। इतिहासकारों और हस्तशिल्प बोर्ड के विशेषज्ञों के अनुसार, इस कला का सीधा संबंध सिंधु घाटी सभ्यता (मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध ‘नर्तकी की मूर्ति’) से माना जाता है। बस्तर के आदिवासी समाज ने इस जटिल और अलौकिक विधा को अपनी पीढ़ियों के माध्यम से आज तक बिल्कुल मूल रूप में जीवित रखा है।
इस कला की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसे बनाने के लिए किसी भी तैयार सांचे या आधुनिक मशीनरी का उपयोग नहीं किया जाता है। कोंडागांव और बस्तर संभाग के घड़वा, गोंड, माड़िया और घसिया समाज के लोग पूरी तरह अपने हाथों की कारीगरी और प्राकृतिक संसाधनों के बल पर इसे तैयार करते हैं। यही कारण है कि इस तकनीक से बनी हर एक कलाकृति दुनिया में इकलौती होती है और उसका कोई दूसरा डुप्लीकेट नहीं बनाया जा सकता।
बस्तर की ढोकरा कला को इसकी प्रामाणिकता और अनूठे स्वरूप के लिए भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग (Geographical Indication Tag) भी प्रदान किया जा चुका है। यह टैग इस बात का प्रमाण है कि इस कला की जड़ें केवल और केवल बस्तर की आबोहवा और यहां के आदिवासी समाज में ही समाहित हैं।
क्या है ‘ट्री ऑफ लाइफ’ और महुआ के पेड़ का रहस्य?
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन को भेंट की गई ‘ट्री ऑफ लाइफ’ कलाकृति बेहद खास और प्रतीकात्मक है। बस्तर के घड़वा शिल्पकारों द्वारा ढोकरा कला के जरिए तैयार की गई इस कलाकृति में महुआ के वृक्ष को दर्शाया गया है। बस्तर की आदिवासी संस्कृति में महुआ और सल्फी के वृक्षों को ‘जीवन का वृक्ष’ (ट्री ऑफ लाइफ) माना जाता है, क्योंकि ये वृक्ष उनके जीवनयापन, संस्कृति और धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा आधार हैं।
शिल्पकृति में पेड़ की शाखाओं पर खूबसूरत पक्षी, विभिन्न वन्यजीव और सघन पत्तियां उकेरी गई हैं, जो प्रकृति, समृद्धि, सतत विकास और ब्रह्मांड के संपूर्ण जीवन चक्र को दर्शाती हैं। यह भारतीय दर्शन के ‘कल्पवृक्ष’ के विचार को साकार करता है। दिलचस्प बात यह है कि यह कलाकृति न्यूजीलैंड की मूल माओरी संस्कृति की ‘व्हाकापापा’ (Whakapapa) अवधारणा से भी गहराई से मेल खाती है, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे जुड़ाव तथा पूर्वजों के साथ संबंधों को दर्शाती है।
इस कांस्य शिल्पकृति की चमक और इसकी फिनिशिंग इतनी बारीक है कि यह पहली नजर में ही किसी को भी अपना मुरीद बना लेती है। राजनयिक उपहार के तौर पर इसका चुना जाना यह दिखाता है कि भारत किस तरह अपनी प्राचीन जड़ों को आधुनिक कूटनीति के साथ जोड़कर वैश्विक मंच पर पेश कर रहा है।
कोंडागांव: बस्तर की ‘शिल्पनगरी’ जहां बसती है यह कला
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले को इस नायाब कला की वजह से ही ‘शिल्पनगरी’ (City of Crafts) का दर्जा मिला हुआ है। वर्तमान में कोंडागांव और उसके आस-पास के क्षेत्रों में लगभग 400 से अधिक परिवार सीधे तौर पर ढोकरा कला के जरिए अपनी आजीविका चला रहे हैं। यदि पूरे बस्तर संभाग के सातों जिलों की बात करें, तो इस कला से अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से करीब 10,000 कारीगर जुड़े हुए हैं।
इस कला को बचाने और इसे वैश्विक पहचान दिलाने में बस्तर के कलाकारों का समर्पण अतुलनीय है। कोंडागांव के जयदेव बघेल (दिवंगत पद्मश्री कलाकार) से लेकर पंचूराम सागर जैसे अनगिनत शिल्पकारों ने अपनी पूरी जिंदगी इस कला को निखारने में लगा दी। अब तक बस्तर के 20 से अधिक शिल्पकारों को इस उत्कृष्ट विधा के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
जब राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कोंडागांव के शिल्पकारों को पता चला कि उनकी बनाई गई कलाकृति को स्वयं देश के प्रधानमंत्री ने न्यूजीलैंड के राष्ट्रप्रमुख को भेंट किया है, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। शिल्पकारों ने कहा कि देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बस्तर के हस्तशिल्प को राजकीय सम्मान देना उनकी पीढ़ियों की साधना का सबसे बड़ा फल है।
जानिए कैसे बनती है यह ऐतिहासिक ढोकरा कलाकृति
ढोकरा कला का निर्माण बेहद जटिल, धैर्यपूर्ण और समय लेने वाली प्रक्रिया है। इसे बनाने में लगभग 16 से 27 अलग-अलग चरणों से गुजरना पड़ता है। आइए इसे संक्षिप्त और आसान भाषा में समझते हैं:
- मिट्टी का मूल ढांचा: सबसे पहले कारीगर काली मिट्टी और भूसे को मिलाकर अपनी पसंदीदा आकृति का एक बुनियादी ढांचा तैयार करते हैं, जिसे धूप में सुखाया जाता है।
- मोम का धागा और कोटिंग: इसके बाद मधुमक्खी के मोम (Beeswax) को गर्म करके पतले धागे बनाए जाते हैं और इन धागों को सूखी हुई मिट्टी की आकृति पर बहुत बारीकी से लपेटा जाता है। इसी चरण में कलाकृति की बारीक नक्काशी पूरी की जाती है।
- मिट्टी की अंतिम परत: मोम की डिजाइनिंग के बाद इसके ऊपर नदी की चिकनी मिट्टी और धान की भूसी का लेप चढ़ाया जाता है और धातु पिघलाकर डालने के लिए एक छोटा सा छिद्र छोड़ दिया जाता है।
- लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग: इस पूरे सांचे को भट्टी की तेज आंच में तपाया जाता है। गर्मी के कारण अंदर का मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है (इसीलिए इसे ‘लॉस्ट वैक्स’ कहते हैं) और मोम की जगह खाली हो जाती है।
- धातु का प्रवाह: अब पिघले हुए पीतल, तांबे और कांसे (बेलमेटल) के मिश्रण को उस खाली स्थान में डाला जाता है। ठंडा होने के बाद बाहरी मिट्टी को सावधानी से ठोककर तोड़ दिया जाता है, जिसके बाद चमचमाती हुई धातु की कलाकृति बाहर आती है।
प्रधानमंत्री मोदी की कल्चरल डिप्लोमेसी (सांस्कृतिक कूटनीति)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा से अपने विदेशी दौरों में भारत की विविधता और स्थानीय कारीगरों की कला को बढ़ावा दिया है। इसे कूटनीति की भाषा में ‘सांस्कृतिक कूटनीति’ (Cultural Diplomacy) कहा जाता है। न्यूजीलैंड की इस यात्रा में उन्होंने बस्तर की ढोकरा कला के साथ-साथ उत्तराखंड की पारंपरिक ऊनी टोपी (पहाड़ी टोपी) भी प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन को भेंट की, जो उत्तराखंड की हिमालयी पहचान का प्रतीक है। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय महिला हॉकी टीम द्वारा हस्ताक्षरित एक हॉकी स्टिक भी भेंट की।
राजनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक नेताओं को महंगे आधुनिक उपहारों के बजाय अपने देश की पारंपरिक और ऐतिहासिक मिट्टी से जुड़े हस्तशिल्प देना दोनों देशों के बीच आत्मिक और गहरे सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देता है। बस्तर की कला को मिला यह अंतरराष्ट्रीय मंच आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के हस्तशिल्प उद्योग के लिए विदेशी बाजारों के नए द्वार खोलेगा और स्थानीय रोजगार को भारी बढ़ावा देगा।



