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फर्जी आठवीं की मार्कशीट से 13 साल तक सरकारी नौकरी: GST विभाग की बड़ी कार्रवाई, दो कर्मचारी बर्खास्त, अब जांच के घेरे में सत्यापन व्यवस्था

छत्तीसगढ़ के जीएसटी विभाग में वर्ष 2013 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। कथित रूप से फर्जी आठवीं कक्षा की अंकसूची के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले दो कर्मचारियों को 13 वर्ष बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। विभागीय जांच, आरटीआई से सामने आए दस्तावेज और विधानसभा में मामला उठने के बाद कार्रवाई तेज हुई। हालांकि इस पूरे मामले में दस्तावेजों के सत्यापन और कथित संरक्षण देने वाले अधिकारियों की भूमिका को लेकर अब भी कई सवाल बने हुए हैं।







रायपुर | 8 जुलाई 2026 : सरकारी नौकरियों में फर्जी दस्तावेजों के जरिए नियुक्ति प्राप्त करने के मामलों पर छत्तीसगढ़ सरकार लगातार सख्ती दिखा रही है। इसी कड़ी में राज्य के वाणिज्यिक कर (जीएसटी) विभाग ने एक महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए दो कर्मचारियों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी हैं। आरोप है कि दोनों कर्मचारियों ने वर्ष 2013 में भृत्य भर्ती के दौरान आठवीं कक्षा की कथित फर्जी अंकसूची प्रस्तुत कर नौकरी हासिल की थी। बाद में दोनों को पदोन्नति देकर सहायक ग्रेड-3 बनाया गया, लेकिन वर्षों बाद शिकायतों, दस्तावेजों के सत्यापन और विस्तृत जांच के बाद पूरा मामला सामने आया।

जीएसटी आयुक्त पुष्पेंद्र मीणा द्वारा जारी आदेश के बाद किशोर पटेल और भागवत पटेल की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। विभाग का यह कदम सरकारी भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी प्राप्त करने वालों के खिलाफ सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

13 साल बाद खुला भर्ती प्रक्रिया का बड़ा राज

जानकारी के अनुसार यह मामला वर्ष 2013 में आयोजित भृत्य भर्ती से जुड़ा है। उस समय न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता के रूप में आठवीं कक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक था।

आरोप है कि भर्ती के दौरान किशोर पटेल और भागवत पटेल ने आठवीं कक्षा की ऐसी अंकसूचियां प्रस्तुत कीं, जिनमें 96 प्रतिशत से अधिक अंक दर्शाए गए थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर दोनों का चयन किया गया और उन्हें विभाग में नियुक्ति मिल गई।

नियुक्ति के बाद दोनों कर्मचारी लगातार विभाग में कार्यरत रहे और समय के साथ उनकी पदोन्नति भी हो गई। बाद में दोनों सहायक ग्रेड-3 के पद तक पहुंच गए।

पदोन्नति के बाद शिकायतों ने खोली परतें

बताया जा रहा है कि दोनों कर्मचारियों की पदोन्नति के बाद भर्ती प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों को लेकर शिकायतें सामने आने लगीं।

शिकायतकर्ताओं ने संबंधित विद्यालय के परीक्षा परिणाम रजिस्टर और मूल अभिलेखों के आधार पर दोनों की अंकसूचियों की सत्यता पर सवाल उठाए।

इसके बाद मामला विभाग के संज्ञान में आया और दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया। प्रारंभिक स्तर पर दस्तावेजों को सही बताया गया, लेकिन शिकायतें लगातार जारी रहीं।

आरटीआई से सामने आए महत्वपूर्ण दस्तावेज

इस पूरे मामले में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने जांच को नई दिशा दी।

आरटीआई के माध्यम से उपलब्ध अभिलेखों में आरोप लगाया गया कि समतुल्यता परीक्षा में अनुपस्थित परीक्षार्थियों के रोल नंबर का उपयोग कर कथित रूप से फर्जी अंकसूचियां तैयार की गई थीं।

यदि जांच में यह तथ्य पूरी तरह प्रमाणित होता है तो यह केवल फर्जी अंकसूची का मामला नहीं बल्कि सरकारी अभिलेखों के दुरुपयोग और दस्तावेजों की कूटरचना का भी गंभीर मामला माना जा सकता है।

विधानसभा में मामला उठने के बाद जांच हुई तेज

प्रारंभिक जांच के बाद मामला शांत होता दिखाई दे रहा था, लेकिन बाद में यह विषय विधानसभा तक पहुंच गया।

विधानसभा में मामला उठने के बाद विभागीय स्तर पर दोबारा गंभीरता से जांच शुरू की गई। उपलब्ध दस्तावेजों, अभिलेखों और शिकायतों का पुनः परीक्षण किया गया।

लंबी जांच प्रक्रिया के बाद विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दोनों कर्मचारियों की नियुक्ति विवादित दस्तावेजों के आधार पर हुई थी। इसके बाद विभाग ने सेवा समाप्ति की कार्रवाई की।

जीएसटी आयुक्त ने जारी किए सेवा समाप्ति आदेश

मंगलवार को जीएसटी आयुक्त पुष्पेंद्र मीणा ने दोनों कर्मचारियों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त करने के आदेश जारी किए।

आदेश में स्पष्ट किया गया कि सरकारी सेवा प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों की सत्यता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि नियुक्ति फर्जी अथवा गलत दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त की जाती है तो ऐसी नियुक्ति विधिसम्मत नहीं मानी जा सकती।

सरकारी सेवा नियमों के अनुसार गलत जानकारी, जाली दस्तावेज अथवा तथ्यों को छिपाकर प्राप्त की गई नियुक्ति निरस्त की जा सकती है।

96 प्रतिशत अंकों वाली अंकसूचियां बनी जांच का केंद्र

जांच के दौरान सबसे अधिक चर्चा दोनों कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत की गई उन अंकसूचियों की रही जिनमें आठवीं कक्षा में 96 प्रतिशत से अधिक अंक दर्शाए गए थे।

शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि विद्यालय के मूल परीक्षा परिणाम रजिस्टर और प्रस्तुत अंकसूचियों में गंभीर अंतर पाया गया।

इन्हीं विसंगतियों ने जांच एजेंसियों का ध्यान आकर्षित किया और बाद में पूरे मामले की गहन जांच की गई।

सत्यापन प्रक्रिया पर भी उठे गंभीर सवाल

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर सामने आया है।

आरोप है कि नियुक्ति के समय जिन दस्तावेजों का सत्यापन किया गया, वे प्रारंभिक स्तर पर सही पाए गए थे। बाद में उन्हीं दस्तावेजों पर गंभीर आपत्तियां सामने आईं।

इससे यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि दस्तावेज वास्तव में फर्जी थे तो प्रारंभिक सत्यापन में यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों का बहुस्तरीय डिजिटल सत्यापन भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए आवश्यक है।

शिक्षा अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल कायम

मामले में कार्रवाई के बाद भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिन शिक्षा अधिकारियों पर कथित रूप से दस्तावेजों के सत्यापन अथवा संरक्षण देने के आरोप लगाए गए थे, उनके विरुद्ध अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उनके विरुद्ध भी विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि वर्तमान में इस संबंध में किसी अंतिम निष्कर्ष या कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

क्या दर्ज होगा आपराधिक मामला

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है तो उसके विरुद्ध केवल सेवा समाप्ति ही नहीं बल्कि भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत कूटरचना, धोखाधड़ी और जाली दस्तावेजों के उपयोग जैसे अपराधों में भी कार्रवाई संभव है।

हालांकि इस मामले में अब तक सार्वजनिक रूप से यह जानकारी सामने नहीं आई है कि दोनों कर्मचारियों अथवा अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध अलग से आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है या नहीं।

इस संबंध में आगे की कार्रवाई जांच एजेंसियों और सक्षम प्राधिकारियों के निर्णय पर निर्भर करेगी।

भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की जरूरत फिर हुई उजागर

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में तकनीक आधारित दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

यदि सभी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का ऑनलाइन डेटाबेस से स्वतः मिलान किया जाए तो फर्जी अंकसूची अथवा जाली प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त करने की संभावना काफी हद तक समाप्त हो सकती है।

वर्तमान में देश के अनेक शिक्षा बोर्ड और विश्वविद्यालय अपने प्रमाणपत्रों का डिजिटल सत्यापन उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे भविष्य में भर्ती प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाई जा सकती है।

सरकारी तंत्र के लिए चेतावनी भी, सीख भी

जीएसटी विभाग की यह कार्रवाई केवल दो कर्मचारियों की सेवा समाप्ति तक सीमित नहीं मानी जा रही है।

यह मामला सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में दस्तावेज सत्यापन, विभागीय जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता को भी सामने लाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रत्येक भर्ती में आधुनिक डिजिटल सत्यापन प्रणाली अपनाई जाए और शिकायतों की समयबद्ध जांच सुनिश्चित हो तो भविष्य में इस प्रकार के मामलों की पुनरावृत्ति को काफी हद तक रोका जा सकता है।

फिलहाल विभाग की कार्रवाई के बाद अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या जांच का दायरा आगे बढ़ेगा, क्या कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों की पहचान होगी और क्या संबंधित अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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