अंबिकापुर बाल संप्रेक्षण गृह में सुरक्षा की बड़ी चूक: पुराना दरवाजा तोड़कर फिर फरार हुए 13 अपचारी बालक, पुलिस महकमे में मचा हड़कंप
अंबिकापुर बाल संप्रेक्षण गृह से 13 अपचारी बालक पुराना दरवाजा तोड़कर फरार। एक महीने में दूसरी बड़ी घटना से प्रशासन में हड़कंप। सुरक्षा के दावों की खुली पोल, पुलिस की नाकेबंदी जारी। पढ़िए 'द फोर्थ पिलर' की विस्तृत रिपोर्ट और प्रशासनिक लापरवाही का विश्लेषण।

15 जुलाई 2026, रायपुर।छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से एक बेहद सनसनीखेज और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करने वाली खबर सामने आई है। शहर के कन्या परिसर रोड बिशुनपुर स्थित शासकीय बाल संप्रेक्षण गृह (चाइल्ड ऑब्जर्वेशन होम) से मंगलवार की रात एक बार फिर 13 अपचारी बालक यानी कानून से संघर्षरत किशोर, सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए फरार हो गए। इस बड़ी घटना के बाद पूरे सरगुजा पुलिस महकमे और महिला एवं बाल विकास विभाग में हड़कंप मच गया है।
मिली जानकारी के अनुसार, फरार हुए सभी अपचारी बालक अलग-अलग संगीन आपराधिक मामलों में यहां निरुद्ध किए गए थे। मंगलवार की देर शाम इन बच्चों ने सुनियोजित तरीके से बैरक के एक पुराने और जर्जर हो चुके दरवाजे को अपना निशाना बनाया। उन्होंने मिलकर उस कमजोर दरवाजे को क्षतिग्रस्त कर दिया और परिसर से बाहर निकलने में पूरी तरह कामयाब हो गए। बताया जा रहा है कि कुल 14 बालकों ने भागने की कोशिश की थी, लेकिन मुस्तैदी दिखाते हुए एक को मौके पर ही पकड़ लिया गया, जबकि शेष 13 अहाता फांदकर नौ दो ग्यारह हो गए।
घटना की भनक लगते ही बाल संप्रेक्षण गृह के प्रबंधन ने तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचित किया। सूचना मिलते ही गांधीनगर थाना पुलिस के साथ-साथ जिले के आला प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने तुरंत शहर के संवेदनशील चौराहों और निकास मार्गों पर नाकेबंदी कर दी है, लेकिन देर रात तक फरार किशोरों का कोई सुराग नहीं मिल सका था।
एक महीने के भीतर दूसरी बड़ी वारदात: व्यवस्था पर खड़े हुए गंभीर सवाल
अंबिकापुर के इस बाल संप्रेक्षण गृह से बच्चों के भागने का यह कोई पहला मामला नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले एक महीने के भीतर ही सुरक्षा में सेंधमारी की यह दूसरी सबसे बड़ी वारदात है। इससे पहले बीते 23 जून को भी इसी संस्थान से भारी बारिश, गरज-चमक और बिजली गुल होने का फायदा उठाकर 13 अपचारी बालक खिड़की की ग्रिल तोड़कर फरार हो गए थे।
जून की उस घटना में फरार हुए बालकों में से दो का सुराग पुलिस आज तक नहीं लगा पाई है, और अब एक नया मामला सामने आ गया है। बार-बार हो रही इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि बाल सुधार गृहों की सुरक्षा केवल कागजों तक ही सीमित है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सुरक्षाकर्मियों की मुस्तैदी न होने और भवन के जर्जर ढांचे के कारण ये बच्चे आसानी से भागने की योजना बना लेते हैं।
इतना ही नहीं, इस साल फरवरी महीने में भी इसी संप्रेक्षण गृह से अपचारी बालकों के भागने का मामला दर्ज किया गया था। लगातार हो रही इन घटनाओं से साफ है कि प्रशासन पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं ले रहा है। हर बार घटना के बाद जांच के आदेश तो दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आता।
कलेक्टर और एसएसपी के निर्देशों की खुली पोल, नहीं हुआ कमियों पर काम
23 जून की घटना के बाद सरगुजा के कलेक्टर अजीत वसंत और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) राजेश अग्रवाल ने खुद बाल संप्रेक्षण गृह का आकस्मिक निरीक्षण किया था। अधिकारियों ने पूरे परिसर का मुआयना करने के बाद भवन की जर्जर स्थिति, कमजोर खिड़कियों और सुरक्षा में मौजूद भारी कमियों को चिन्हित किया था। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए इन कमियों को तत्काल दूर करने के सख्त निर्देश जारी किए थे।
हालांकि, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। फरवरी में जब पहली बार बच्चे भागे थे, तब भी सुरक्षा ऑडिट के निर्देश दिए गए थे, लेकिन कोई ठोस सुरक्षात्मक बदलाव नहीं किया गया। इसके बाद जब जून में दूसरी बार घटना हुई, तब भी केवल कागजी खानापूर्ति की गई और जर्जर दरवाजे वैसे ही छोड़ दिए गए। यह स्पष्ट है कि उच्चाधिकारियों के निर्देशों की अनदेखी की गई है, जिसका खामियाजा अब समाज को भुगतना पड़ रहा है।
महज तीन हफ्तों के भीतर ही अपचारी बालकों ने उसी ढुलमुल व्यवस्था का फायदा उठाया और इस बार खिड़की के बजाय पुराने दरवाजे को तोड़कर अपनी आजादी का रास्ता चुन लिया। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही और कड़े निर्देशों की अवहेलना का मामला है, जिस पर अब जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सरगुजा, सूरजपुर और कोरिया तक पुलिस की रेड, परिजनों से भी संपर्क
मंगलवार रात की इस घटना के बाद सरगुजा पुलिस ने बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है। गांधीनगर पुलिस की अलग-अलग टीमें अंबिकापुर शहर के रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, लॉज और ढाबों में लगातार तलाशी अभियान चला रही हैं। पुलिस को आशंका है कि रात के वक्त ये बच्चे किसी बस या ट्रेन के जरिए शहर से बाहर निकलने की फिराक में हो सकते हैं।
चूंकि इस संप्रेक्षण गृह में निरुद्ध किए गए अधिकांश अपचारी बालक सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर और कोरिया जिलों के रहने वाले हैं, इसलिए पुलिस ने संबंधित जिलों के पुलिस कप्तानों से भी संपर्क साधा है। पुलिस की विशेष टीमें इन बच्चों के गृह ग्रामों के लिए रवाना कर दी गई हैं। इसके साथ ही, बच्चों के परिजनों को भी सख्त हिदायत दी गई है कि यदि कोई भी बच्चा घर पहुंचता है या उनसे संपर्क करता है, तो तुरंत पुलिस को सूचित करें।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन अपचारी बालकों पर चोरी, लूटपाट, बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं। ऐसे में इन किशोरों का समाज में खुलेआम घूमना कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। पुलिस ने स्थानीय लोगों से भी अपील की है कि यदि उन्हें किसी भी संदिग्ध किशोर की जानकारी मिले, तो वे तुरंत गांधीनगर पुलिस या कंट्रोल रूम को सूचित करें।
मानवाधिकार और बाल सुधार के दावों के बीच सुरक्षा का संकट
यह घटना केवल सुरक्षा की चूक नहीं है, बल्कि यह देश के बाल सुधार गृहों की आंतरिक स्थिति पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) के तहत इन केंद्रों को जेल नहीं बल्कि ‘सुधार गृह’ माना जाता है, जहां बच्चों की काउंसलिंग और उनके पुनर्वास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। लेकिन अक्सर इन केंद्रों में संसाधनों की भारी कमी और सुरक्षाकर्मियों की लापरवाही के चलते यह सुधार गृह ‘भागने के केंद्र’ बनते जा रहे हैं।
स्थानीय समाजसेवियों का मानना है कि इन केंद्रों में तैनात स्टाफ को किशोर मनोविज्ञान की समझ नहीं होती, और न ही वे सुरक्षा को लेकर गंभीर होते हैं। अक्सर रात्रिकालीन ड्यूटी में सुरक्षाकर्मी सोए रहते हैं या परिसर की निगरानी ठीक से नहीं करते, जिसका फायदा ये शातिर दिमाग किशोर उठा लेते हैं। जब तक इन केंद्रों में चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी, जिम्मेदारी तय करने वाले सुरक्षा बल और आधुनिक बुनियादी ढांचा तैनात नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना नामुमकिन होगा।
सवाल यह भी उठता है कि क्या इन बच्चों का मन अशांत है? क्या उन्हें सुधारने के लिए जिस तरह की शिक्षा और मार्गदर्शन की आवश्यकता है, वह उन्हें वहां मिल पा रहा है? अक्सर ये बालक अपराध की दुनिया में इसलिए भी वापस चले जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे सुधार गृह की चारदीवारी से बेहतर बाहर की दुनिया में ‘सुरक्षित’ हैं। सुधार गृहों को जेल जैसा नहीं, बल्कि वास्तव में सुधार का केंद्र बनाना एक बड़ी चुनौती है जिसे सरकार को प्राथमिकता देनी होगी।
अब देखना यह होगा कि इस ताजा घटना के बाद राज्य शासन और महिला एवं बाल विकास विभाग इस गंभीर लापरवाही पर क्या कड़ा रुख अपनाते हैं। क्या उन अधिकारियों पर गाज गिरेगी जिन्होंने कलेक्टर और एसएसपी के आदेशों को हवा में उड़ा दिया? या फिर हर बार की तरह इस बार भी मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा। समाज को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहिए ताकि कानून और सुरक्षा का मजाक न बने।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व और भविष्य की रणनीति
यह स्पष्ट है कि अंबिकापुर बाल संप्रेक्षण गृह की वर्तमान व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। जब तक ढांचे को सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक अपचारी बालकों का भागना जारी रहेगा। प्रशासन को तत्काल प्रभाव से सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ानी चाहिए और नाइट विजन वाले कैमरों के माध्यम से मॉनिटरिंग सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, सुरक्षा बलों की संख्या में वृद्धि करना अनिवार्य है।
इसके अलावा, इन बालकों की मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के लिए विशेषज्ञों की टीम भी वहां होनी चाहिए ताकि उनके मन में भागने के विचार कम हों। केवल ताले और दरवाजे बदलना समाधान नहीं है, बल्कि बालकों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा करना भी जरूरी है। क्या अंबिकापुर का प्रशासन आने वाले दिनों में ऐसी कोई विस्तृत योजना तैयार करेगा? यह आने वाला समय ही बताएगा।
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम बाल न्याय प्रणाली में कहीं विफल हो रहे हैं। बाल सुधार का अर्थ केवल बंदिशें लगाना नहीं, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां अपराधी प्रवृत्ति के किशोर खुद को सुरक्षित महसूस करें और अपराध की राह छोड़ें। अंबिकापुर की घटना एक चेतावनी है, जिसे प्रशासन को गंभीरता से लेना चाहिए।



