लद्दाख की मांगों पर हलचल तेज: सीजेपी प्रतिनिधिमंडल और सोनम वांगचुक के साथ बातचीत के बाद जेपी नड्डा का बड़ा बयान
लद्दाख में छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की मांग को लेकर जेपी नड्डा से मिला सीजेपी प्रतिनिधिमंडल। सोनम वांगचुक भी रहे मौजूद। केंद्र सरकार और कारगिल-लेह प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी। जानिए पूरी रिपोर्ट।

मुलाकात के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेपी नड्डा ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार लद्दाख के लोगों की सांस्कृतिक पहचान, भूमि अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर पूरी तरह गंभीर है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय लगातार सभी पक्षों के संपर्क में है ताकि लद्दाख की क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके।
जानिए किन प्रमुख मुद्दों पर हुई चर्चा
लद्दाख के प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्रालय की उच्चस्तरीय समिति के सामने अपनी चार मुख्य मांगें रखी हैं। इन मांगों में लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची का विस्तार सबसे प्रमुख है।
इसके अलावा लद्दाख के लिए दो अलग लोकसभा सीटों का आवंटन (एक लेह और एक कारगिल के लिए) तथा स्थानीय युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। सोनम वांगचुक और अन्य नेताओं ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख के प्राकृतिक संसाधनों और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को निजी कंपनियों और बाहरी दखल से खतरा मंडरा रहा है।
सोनम वांगचुक की पदयात्रा और सत्याग्रह का प्रभाव
लद्दाख को प्रशासनिक और संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग काफी समय से चल रही है। सोनम वांगचुक ने इस मुद्दे पर व्यापक जनसमर्थन जुटाने के लिए लेह में कई दिनों तक अनशन किया था और बाद में दिल्ली के जंतर-मंतर तक मार्च भी निकाला था।
वांगचुक का कहना है कि लद्दाख का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जनजातीय आबादी का है। ऐसे में भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त जिला परिषदों को कानूनी और विधायी अधिकार मिलना बेहद जरूरी है। उनके इस आंदोलन के बाद ही केंद्र सरकार ने वार्ता प्रक्रिया को तेज करने का फैसला किया।
केंद्र सरकार का रुख: समाधान की दिशा में सकारात्मक कदम
प्रेस वार्ता के दौरान जेपी नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह लद्दाख के सतत विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाना ही इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार इस क्षेत्र के प्रति कितनी संवेदनशील है।
सरकार ने संकेत दिया है कि लद्दाख की विशिष्ट संस्कृति, भूमि और रोजगार के संरक्षण के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय (Constitutional Safeguards) तैयार किए जा रहे हैं। यद्यपि छठी अनुसूची को सीधे लागू करने को लेकर तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर विचार चल रहा है, लेकिन गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति समाधान निकालने के करीब है।
कारगिल और लेह का एकजुट मोर्चा
लद्दाख के इतिहास में यह पहला मौका है जब बौद्ध बहुल लेह अंचल का ‘अपेक्स बॉडी’ और मुस्लिम बहुल कारगिल अंचल का ‘कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस’ एक मंच पर आए हैं। दोनों संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी बुनियादी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे अपना लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेंगे।
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने वार्ता के बाद कहा कि बातचीत सकारात्मक माहौल में हुई है। उन्हें उम्मीद है कि सरकार जल्द ही कोई ठोस निर्णय लेगी ताकि सीमावर्ती क्षेत्र के नागरिकों का विश्वास मजबूत हो सके।
रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है लद्दाख
चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं के कारण लद्दाख सामरिक दृष्टि से भारत का बेहद संवेदनशील हिस्सा है। इसके साथ ही, हिमालयी क्षेत्र होने के कारण यहाँ का ग्लेशियर और पर्यावरण तेजी से बदल रहा है।
स्थानीय निवासियों को डर है कि यदि अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियां और पर्यटन बढ़ा, तो यहाँ के पानी के स्रोत सूख जाएंगे और पर्यावरण पूरी तरह तबाह हो जाएगा। यही वजह है कि स्थानीय जनता स्वायत्तता और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार आवाज उठा रही है।
आगे क्या
गृह मंत्रालय की उप-समिति (Sub-Committee) के साथ लद्दाख के प्रतिनिधियों की अगली दौर की बैठक जल्द होने वाली है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार लद्दाख के दोनों जिलों (लेह और कारगिल) की हिल काउंसिलों को अधिक प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां देने पर विचार कर रही है।
अब देखना होगा कि केंद्र सरकार लद्दाख के नेताओं को छठी अनुसूची जैसा संवैधानिक सुरक्षा कवच देने पर क्या अंतिम रुख अपनाती है। पूरे देश की नजरें इस महत्वपूर्ण वार्ता के नतीजों पर टिकी हुई हैं।



