झीरम घाटी नक्सली हमला: 13 साल बाद अदालत में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित, 31 अगस्त को आ सकता है निर्णय
झीरम घाटी नक्सली हमले की सुनवाई पूरी हो गई है। जगदलपुर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है। 31 अगस्त को निर्णय आने की संभावना है। हमले में 27 लोगों की मौत हुई थी।

13 August 2026 | Raipur: छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित और दर्दनाक राजनीतिक-नक्सली हमलों में शामिल झीरम घाटी कांड में करीब 13 साल बाद न्यायिक प्रक्रिया एक अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। जगदलपुर जिला सत्र न्यायालय में मामले की सुनवाई पूरी हो गई है और दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें दर्ज होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।
कोर्ट 31 अगस्त 2026 को इस मामले में फैसला सुना सकता है। हालांकि, अंतिम निर्णय उसी दिन सुनाया जाएगा या किसी अन्य तारीख को, यह अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा।
25 मई 2013 को दरभा इलाके की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था। हमले में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं सहित 27 लोगों की मौत हुई थी। घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और छत्तीसगढ़ की राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ा।
दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें पूरी
जगदलपुर जिला सत्र न्यायालय में 12 अगस्त को मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष ने अपनी अंतिम दलीलें पूरी कीं। इसके बाद अदालत ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA की ओर से अधिवक्ता दिनेश पाणिग्रही ने अदालत में अंतिम पक्ष रखा। वहीं आरोपियों की ओर से अधिवक्ता अरविंद चौधरी ने बचाव पक्ष की दलीलें पेश कीं। अब अदालत के फैसले पर सभी की नजर है।
झीरम घाटी मामला सिर्फ एक आपराधिक केस नहीं है। इसमें प्रदेश की तत्कालीन राजनीति, नक्सली हिंसा, सुरक्षा व्यवस्था और हमले के पीछे की साजिश जैसे कई सवाल वर्षों से जुड़े रहे हैं।
25 मई 2013 को क्या हुआ था
25 मई 2013 की शाम कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला दरभा क्षेत्र से गुजर रहा था। झीरम घाटी के पहाड़ी और घने जंगल वाले इलाके में माओवादियों ने काफिले को निशाना बनाकर हमला किया।
NIA के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार हमला करीब शाम 4:15 बजे हुआ था। एजेंसी के रिकॉर्ड में 27 लोगों की मौत और 38 लोगों के घायल होने की जानकारी दर्ज है। मृतकों में 10 पुलिसकर्मी भी शामिल थे।
हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा और वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल सहित कई प्रमुख राजनीतिक चेहरे मारे गए थे।
महेंद्र कर्मा को बस्तर में सलवा जुडूम आंदोलन के प्रमुख चेहरों में माना जाता था। नक्सलियों के खिलाफ उनकी मुखर भूमिका के कारण वे लंबे समय से माओवादियों के निशाने पर थे।
नक्सलियों ने घात लगाकर किया था हमला
जांच एजेंसियों के मुताबिक माओवादियों ने काफिले के गुजरने वाले रास्ते पर पहले से घात लगाई थी। काफिले के झीरम घाटी क्षेत्र में पहुंचते ही हमला शुरू किया गया।
NIA के रिकॉर्ड में हमले के दौरान बड़ी संख्या में हथियार और गोला-बारूद इस्तेमाल होने तथा कुछ हथियारों के लूटे या खो जाने का भी उल्लेख है। एजेंसी के अनुसार दो AK-47 राइफल, 9 एमएम पिस्तौल, हैंड ग्रेनेड और अन्य सामग्री का विवरण जांच में सामने आया था।
हमले के बाद माओवादियों ने इसकी जिम्मेदारी ली थी। इस घटना को छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा की सबसे बड़ी और राजनीतिक रूप से सबसे गंभीर घटनाओं में गिना जाता है।
केंद्र ने NIA को सौंपी थी जांच
झीरम हमले के बाद मामले की जांच केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी थी। NIA ने दरभा थाने में दर्ज मूल FIR के आधार पर 27 मई 2013 को अपनी जांच शुरू की और इसे RC-06/2013/NIA/DLI के रूप में दर्ज किया।
NIA के रिकॉर्ड के मुताबिक मामले में IPC की हत्या, हत्या की साजिश, डकैती, दंगा और अन्य धाराओं के साथ Arms Act, Explosives Act और Unlawful Activities (Prevention) Act की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई।
जांच आगे बढ़ने के साथ कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और अदालत में आरोप पत्र दाखिल किए गए।
NIA ने दो चरणों में दाखिल की थी चार्जशीट
NIA के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार 25 सितंबर 2014 को नौ गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ जगदलपुर की NIA विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई थी।
इसके बाद 28 सितंबर 2015 को 30 अन्य आरोपियों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई। एजेंसी ने यह भी दर्ज किया है कि फरार आरोपियों के खिलाफ आगे की जांच जारी रही।
यानी झीरम कांड की जांच एक ही चरण में खत्म नहीं हुई। अलग-अलग आरोपियों और जांच के पहलुओं के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ती रही।
इसी वजह से इस मामले की कानूनी प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रही।
कितने आरोपी अदालत तक पहुंचे
12 अगस्त 2026 की सुनवाई से संबंधित रिपोर्ट के मुताबिक मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से एक आरोपी की मौत हो चुकी है और 10 आरोपी अब भी हिरासत में बताए गए हैं।
दूसरी ओर, NIA के आधिकारिक रिकॉर्ड में मामले में गिरफ्तार आरोपियों और अन्य आरोपियों के खिलाफ दाखिल चार्जशीट का विस्तृत विवरण अलग तरीके से दर्ज है। इसलिए अदालत के अंतिम फैसले में किन आरोपियों की भूमिका पर क्या निष्कर्ष आता है, यह निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।
साजिश का सवाल आज भी बना हुआ है
झीरम घाटी हमले के बाद से ही यह सवाल उठता रहा है कि क्या यह केवल एक माओवादी हमला था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश भी थी।
कांग्रेस नेताओं और पीड़ित परिवारों की ओर से समय-समय पर हमले की व्यापक साजिश की जांच की मांग उठती रही है। राज्य पुलिस की अलग जांच और NIA की जांच को लेकर भी वर्षों तक कानूनी और राजनीतिक विवाद रहा।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने झीरम मामले से जुड़े एक अलग राज्य पुलिस जांच संबंधी विवाद में NIA की अपील खारिज कर दी थी। उस मामले में अदालत के समक्ष यह सवाल था कि राज्य पुलिस की अलग FIR और जांच को किस सीमा तक आगे बढ़ाया जा सकता है।
इस घटनाक्रम ने झीरम कांड की जांच को लेकर चल रही बहस को और लंबा कर दिया।
13 साल बाद फैसला क्यों अहम है
झीरम घाटी हमला छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी लोग नहीं भूल पाए हैं। एक ही हमले में प्रदेश कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की मौत ने राजनीतिक नेतृत्व को बड़ा झटका दिया था।
इस हमले में मारे गए नेताओं में नंद कुमार पटेल और महेंद्र कर्मा जैसे बड़े नाम थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी गंभीर रूप से घायल हुए थे और बाद में उनकी मौत हो गई।
घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे। राजनीतिक दलों ने यह भी पूछा था कि इतनी बड़ी राजनीतिक यात्रा के लिए सुरक्षा इंतजाम पर्याप्त क्यों नहीं थे।
वर्षों बाद अदालत में सुनवाई पूरी होने से पीड़ित परिवारों और राजनीतिक दलों की नजर अब न्यायिक फैसले पर टिक गई है।
अदालत के फैसले से क्या साफ होगा
31 अगस्त को अगर अदालत फैसला सुनाती है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होगा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को अदालत के सामने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कितनी मजबूती से साबित कर पाया।
आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों, गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य और जांच एजेंसी की ओर से प्रस्तुत सामग्री पर अदालत का निष्कर्ष महत्वपूर्ण होगा।
सिर्फ आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है। अदालत प्रत्येक आरोपी की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला करेगी।
यही कारण है कि 31 अगस्त का संभावित फैसला इस लंबे समय से चल रहे मामले में एक बड़ा कानूनी पड़ाव माना जा रहा है।
झीरम कांड की जांच का राजनीतिक असर
झीरम कांड का असर सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहा। छत्तीसगढ़ में हर चुनावी दौर में यह घटना राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती रही है।
कांग्रेस ने कई बार हमले के पीछे बड़ी साजिश की जांच की मांग उठाई है। दूसरी ओर, भाजपा और कांग्रेस के बीच इस मामले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी होते रहे हैं।
2025 में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की ओर से झीरम हमले को लेकर किए गए राजनीतिक आरोपों के बाद मामला फिर सुर्खियों में आया था। कांग्रेस ने इन आरोपों पर आपत्ति जताते हुए जांच की मांग की थी।
2025 में झीरम कांड की 12वीं बरसी पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी SIT जांच की मांग दोहराई थी। उन्होंने मामले की जांच में बड़े षड्यंत्र की संभावनाओं की जांच की मांग की थी।
इससे साफ है कि अदालत की कार्यवाही के साथ-साथ झीरम मामला राजनीतिक विमर्श में भी लगातार बना रहा है।
अब 31 अगस्त पर टिकी नजर
12 अगस्त की सुनवाई के बाद अब तत्काल सवाल यही है कि क्या 31 अगस्त को जगदलपुर जिला सत्र न्यायालय इस मामले में अपना फैसला सुनाएगा।
फिलहाल अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है। इसलिए 31 अगस्त को निर्णय आने की संभावना है, लेकिन अंतिम तौर पर फैसला उसी दिन होगा या तारीख आगे बढ़ेगी, यह अदालत की अगली कार्यवाही से स्पष्ट होगा।
करीब 13 साल पहले हुए इस हमले ने छत्तीसगढ़ की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को हिला दिया था। अब लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद मामला फैसले की दहलीज तक पहुंच चुका है।
पीड़ित परिवार, राजनीतिक दल और प्रदेश की जनता अब अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।



