हरेली तिहार पर फिर गरमाई छत्तीसगढ़ की सियासत, भूपेश बघेल ने पीएम मोदी पर साधा निशाना
हरेली तिहार को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासत तेज है। भूपेश बघेल के बयान के बाद भाजपा-कांग्रेस के बीच संस्कृति और राजनीति पर बहस बढ़ी।

13 August 2026 | Raipur: छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हरेली तिहार को लेकर एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बयान के बाद हरेली के सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस भी सामने आ गई है।
हरेली छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक पर्वों में शामिल है और इसका सीधा संबंध खेती, किसान, पशुधन और हरियाली से है। इस दिन किसान कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं, अच्छी बारिश और बेहतर फसल की कामना करते हैं तथा गांवों में पारंपरिक खेल और लोक संस्कृति से जुड़े आयोजन होते हैं।
भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हरेली को सरकारी स्तर पर बड़े आयोजन के रूप में पहचान मिली थी। मुख्यमंत्री निवास में हरेली मनाने, गेड़ी चढ़ने, भौंरा चलाने और पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देने की तस्वीरें प्रदेश की राजनीति और सोशल मीडिया में लंबे समय तक चर्चा में रही हैं। 2023 में भी बघेल ने मुख्यमंत्री निवास में कृषि उपकरणों की पूजा की थी और पारंपरिक खेलों में हिस्सा लिया था।
बघेल सरकार के दौरान हरेली समेत छत्तीसगढ़ के कई स्थानीय तीज-त्योहारों को सरकारी स्तर पर मनाने की परंपरा को विस्तार मिला। हरेली के मौके पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़ी जागरूकता के लिए मुख्यमंत्री महतारी न्याय रथ की शुरुआत भी की गई थी।
हरेली को लेकर बघेल की राजनीति केवल त्योहार तक सीमित नहीं रही। उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ी संस्कृति, लोक खेलों और ग्रामीण परंपराओं को राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यक्रमों से जोड़ने की कोशिश की गई। सरकारी दस्तावेजों और उस दौर की रिपोर्टों में हरेली, तीजा, पोरा और छेरछेरा जैसे त्योहारों को बढ़ावा देने का उल्लेख मिलता है।
यही वजह है कि हरेली का आयोजन अब केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रह गया है। प्रदेश की राजनीति में यह छत्तीसगढ़ की पहचान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय संस्कृति से जुड़े मुद्दे के तौर पर भी इस्तेमाल होता रहा है।
भाजपा सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री निवास में हरेली तिहार का आयोजन जारी रहने पर कांग्रेस ने इसे लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी दी थी। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया था कि भाजपा सरकार भी उन परंपराओं को आगे बढ़ा रही है जिन्हें पिछली कांग्रेस सरकार ने स्थापित किया था।
हरेली के बहाने छत्तीसगढ़ की राजनीति में संस्कृति बनाम राजनीति की बहस पहले भी सामने आती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उनकी सरकार ने छत्तीसगढ़ी संस्कृति और स्थानीय परंपराओं को नई पहचान दिलाने का काम किया।
दूसरी तरफ भाजपा की ओर से कांग्रेस सरकार की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। यही राजनीतिक खींचतान अब हरेली जैसे पारंपरिक पर्व के आसपास भी दिखाई दे रही है।
हरेली की मूल भावना खेती और प्रकृति से जुड़ी है। किसान इस दिन हल, कुदाल, फावड़ा और दूसरे कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं को भी विशेष रूप से सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।
पारंपरिक तौर पर हरेली के दिन घरों के दरवाजे पर नीम की पत्तियां लगाने की परंपरा भी रही है। ग्रामीण जीवन में नीम को स्वास्थ्य और सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है। इसी दिन गेड़ी, भौंरा, गिल्ली-डंडा और अन्य पारंपरिक खेलों का आयोजन भी कई इलाकों में होता है।
छत्तीसगढ़ में हरेली को किसानों के सबसे बड़े लोक पर्वों में गिना जाता है। इस दिन घरों में चीला, ठेठरी, खुरमी और अरसा जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाने की परंपरा भी है।
पिछली सरकार के समय हरेली को छत्तीसगढ़िया ओलंपिक से भी जोड़ा गया था। पारंपरिक खेलों को गांव से राज्य स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की गई थी, जिसमें कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, संखली जैसे खेल शामिल थे और बाद में खेलों की संख्या बढ़ाई गई।
इस पूरे घटनाक्रम का एक राजनीतिक पहलू यह भी है कि छत्तीसगढ़ की स्थानीय पहचान को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने दावे करती रही हैं। कांग्रेस बघेल सरकार के दौरान शुरू किए गए सांस्कृतिक आयोजनों को अपनी उपलब्धि बताती है, जबकि भाजपा सरकार भी इन परंपराओं को आगे बढ़ाने की बात करती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी इस राजनीतिक बहस में इसलिए जुड़ता है क्योंकि केंद्र की ओर से देशभर में स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण और ग्रामीण जीवन से जुड़े अभियानों को बढ़ावा देने की बात लगातार सामने आती रही है। छत्तीसगढ़ में भी केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक तुलना होती रही है।
बघेल की राजनीति में छत्तीसगढ़िया पहचान एक प्रमुख मुद्दा रही है। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कई सरकारी कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ी भाषा, खान-पान, लोकनृत्य और पारंपरिक खेलों को प्रमुखता दी। उनके समर्थक इसे छत्तीसगढ़ की अस्मिता को मजबूत करने वाला कदम बताते रहे हैं।
वहीं भाजपा नेता कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए कथित घोटालों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर बघेल पर हमला करते रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक माहौल में दोनों दलों के बीच पुरानी सरकार के कामकाज को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है।
ऐसे में हरेली का मुद्दा भी राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा बनता दिख रहा है। त्योहार के सांस्कृतिक स्वरूप से अलग जब नेताओं के बयान सामने आते हैं तो सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर बहस तेज हो जाती है।
छत्तीसगढ़ में हरेली की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह है कि यह पर्व सीधे गांव और किसान के जीवन से जुड़ा है। खेती शुरू होने के समय मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति, पशुधन और कृषि उपकरणों के प्रति सम्मान की भावना को सामने लाता है।
हरेली के दिन किसान अच्छी बारिश की कामना करते हैं क्योंकि खरीफ फसल की सफलता काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। इसलिए यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती के पूरे चक्र से भी जुड़ा हुआ है।
राजनीतिक दलों के लिए भी ऐसे लोक पर्व जनता से सीधे जुड़ने का मौका देते हैं। नेता जब गेड़ी चढ़ते हैं, किसानों के साथ कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं या पारंपरिक खेलों में शामिल होते हैं तो इसका राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह का संदेश जाता है।
भूपेश बघेल की सरकार ने इस मॉडल को बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया था। मुख्यमंत्री निवास में गांव जैसा माहौल तैयार कर हरेली मनाने और छत्तीसगढ़ी कलाकारों को मंच देने की तस्वीरें व्यापक रूप से सामने आई थीं। 2023 में भी मुख्यमंत्री निवास को ग्रामीण परिवेश में सजाकर लोकनृत्य और पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हरेली कौन मनाता है। असली राजनीतिक सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति को लेकर किस सरकार ने क्या किया और जनता के बीच उसका असर कितना रहा।
इसी वजह से भूपेश बघेल के बयान को केवल एक त्योहार पर प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसे प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच छत्तीसगढ़िया पहचान को लेकर चल रही लंबी राजनीतिक बहस की कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।
हरेली के बहाने एक बार फिर यह चर्चा सामने आ गई है कि स्थानीय संस्कृति को सरकारी कार्यक्रमों का हिस्सा बनाने से उसे कितना फायदा होता है और राजनीतिक दलों द्वारा संस्कृति के इस्तेमाल की सीमा क्या होनी चाहिए।
प्रदेश के गांवों में हालांकि हरेली का अपना अलग महत्व है। वहां यह दिन राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा खेती-किसानी, पशुधन, बारिश, परिवार और पारंपरिक खेलों का दिन होता है। किसान अपने कृषि उपकरणों की पूजा कर आने वाले खेती के मौसम के लिए बेहतर पैदावार की उम्मीद करते हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में हरेली चाहे जितनी बार मुद्दा बने, इसकी जड़ें ग्रामीण जीवन में ही हैं। यही वजह है कि हर साल इस पर्व के साथ संस्कृति के साथ-साथ राजनीति भी चर्चा में आ जाती है।
मौजूदा विवाद में भी एक तरफ भूपेश बघेल की छत्तीसगढ़िया संस्कृति को लेकर पुरानी राजनीति है और दूसरी तरफ भाजपा सरकार की ओर से इन परंपराओं को आगे बढ़ाने का दावा। आने वाले दिनों में इस बयानबाजी का रुख किस तरफ जाता है, यह प्रदेश की राजनीतिक बहस में एक नया मुद्दा जरूर जोड़ सकता है।



