बहुमत की तानाशाही पर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक हथौड़ा: भिलाई निगम कमिश्नर को हटाने का पार्षदों का प्रस्ताव अवैध घोषित, अदालत ने कहा- कानून से ऊपर कोई नहीं
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 32 पार्षदों की रिट याचिका खारिज करते हुए तय प्रक्रियाओं के अनुपालन को लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल स्तंभ बताया।

इस महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाले कानूनी सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट की एकल पीठ ने भिलाई नगर निगम के 32 निर्वाचित पार्षदों द्वारा दायर की गई उस रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें निगम कमिश्नर राजीव पांडेय को उनके पद से तत्काल हटाने के प्रस्ताव को लागू करने की गुहार लगाई गई थी।
न्यायालय ने मामले की गहन समीक्षा करने के बाद पार्षदों द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव को पूरी तरह से गैर-कानूनी और नियमों के विपरीत पाया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यदि लोकतांत्रिक संस्थाएं ही स्थापित प्रक्रियाओं का मखौल उड़ाने लगेंगी, तो प्रशासनिक व्यवस्था में अराजकता का माहौल पैदा हो जाएगा। यह फैसला राज्य की स्थानीय राजनीति में मचे घमासान के बीच एक बड़े विधिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
जानिए क्या है पूरा प्रशासनिक विवाद और क्यों पार्षदों ने खोला था मोर्चा
इस पूरे कानूनी और राजनीतिक विवाद की शुरुआत भिलाई नगर निगम के प्रशासनिक गलियारे से हुई थी। नगर निगम भिलाई के पार्षद संदीप निरंकारी और आदित्य सिंह समेत कुल 32 निर्वाचित पार्षदों ने मिलकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में एक संयुक्त याचिका दायर की थी। पार्षदों का आरोप था कि निगम के वर्तमान आयुक्त राजीव पांडेय पूरी तरह से मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं। याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया था कि कमिश्नर द्वारा मेयर-इन-काउंसिल (MIC) और निगम की सामान्य सभा की आवश्यक मंजूरी और सहमति के बिना ही कई बड़े वित्तीय तथा प्रशासनिक निर्णय अपने स्तर पर लिए जा रहे हैं, जो पार्षदों के अधिकारों का हनन है।
पार्षदों का दावा था कि इस मनमानी के विरोध में 25 मार्च 2026 को भिलाई नगर निगम की एक विशेष बजट सत्र की सामान्य सभा बुलाई गई थी। इस बैठक में छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 की धारा 54 के तहत तीन-चौथाई से भी अधिक बहुमत का उपयोग करते हुए कमिश्नर राजीव पांडेय को पद से हटाने का एक औपचारिक प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित किया गया था। पार्षदों का मुख्य आक्रोश इस बात को लेकर था कि इतने बड़े बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बावजूद राज्य शासन द्वारा कमिश्नर को हटाने के संबंध में कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई। पार्षदों ने सरकार की इस खामोशी को लोकतांत्रिक व्यवस्था और विधायी नियमों का खुला उल्लंघन बताते हुए सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट ने नियमों की व्याख्या करते हुए पार्षदों के प्रस्ताव को माना शुरुआत से ही अवैध
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने इस पूरे मामले से जुड़े विधिक पहलुओं, छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम के प्रावधानों और दोनों पक्षों की दलीलों को बेहद बारिकी से टटोला। अदालत ने पाया कि जिस 25 मार्च 2026 की बैठक में कमिश्नर को हटाने का यह विवादित प्रस्ताव लाया गया था, वह मूल रूप से एक विशेष बजट बैठक थी। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ नगरपालिका (कार्य संचालन) नियम, 2016 के नियम 3 और नियम 5 का विशेष हवाला देते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी और कानूनी खामी को उजागर किया।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि नगर निगम की नियमावली के अनुसार, किसी भी विशेष बैठक के भीतर केवल और केवल उन्हीं पूर्व निर्धारित विषयों पर चर्चा या मतदान किया जा सकता है, जिनका स्पष्ट रूप से उल्लेख बैठक के लिए पहले से जारी किए गए आधिकारिक नोटिस और एजेंडे में किया गया हो। बिना एजेंडे में शामिल किए किसी भी गंभीर विषय को अचानक सदन के पटल पर नहीं रखा जा सकता।
बजट पारित करना और कमिश्नर को हटाना दो अलग विषय, अनुषंगी मानना पूरी तरह गलत
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को कड़ाई से रेखांकित किया कि 25 मार्च की बैठक का जो एजेंडा सभी पार्षदों को पहले जारी किया गया था, उसमें आयुक्त राजीव पांडेय को पद से हटाने का कोई भी दूर-दूर तक जिक्र या मुद्दा शामिल ही नहीं था। अदालत ने कहा कि निगम का वार्षिक बजट पारित करना एक पूरी तरह से अलग वित्तीय प्रक्रिया है, जबकि निगम के प्रशासनिक मुखिया यानी कमिश्नर को उनके पद से हटाने का प्रस्ताव एक अत्यंत गंभीर और पृथक प्रशासनिक विषय है।
याचिकाकर्ताओं की इस दलील को कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया कि कमिश्नर को हटाने का मुद्दा बजट बैठक से जुड़ा हुआ एक सहायक या अनुषंगी विषय था और इसे अंतिम समय में पेश किया जा सकता था। हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक आदेश में बेहद कड़े शब्दों में कहा कि सदन में भारी बहुमत का होना अपनी जगह बिल्कुल ठीक है, लेकिन कानून और स्थापित वैधानिक प्रक्रिया का अक्षरशः पालन करना हर हाल में अनिवार्य है। चूंकि यह प्रस्ताव बिना किसी पूर्व नोटिस और बिना एजेंडे में शामिल किए लाया गया था, इसलिए विधिक रूप से यह शुरुआत से ही पूरी तरह शून्य और अवैध था।
मनमानी बनाम पारदर्शिता: कमिश्नर और पार्षदों के बीच का पुराना अंतर्विरोध आया सामने
दरअसल, भिलाई नगर निगम में कमिश्नर राजीव पांडेय और पार्षदों के बीच का यह टकराव नया नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबी प्रशासनिक खींचतान रही है। इससे पहले भी कांग्रेस और कुछ निर्दलीय पार्षदों ने कमिश्नर के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नगर निगम के मुख्य गेट के सामने टेंट लगाकर अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन किया था। पार्षदों का आरोप था कि कमिश्नर द्वारा विभिन्न वार्डों के विकास कार्यों के लिए आवंटित होने वाली राशि और मूलभूत सुविधाओं में भेदभाव किया जा रहा है और सामान्य सभा द्वारा पारित जनकल्याणकारी प्रस्तावों की निरंतर अनदेखी की जा रही है।
इस पूरे विवाद पर भिलाई निगम के आयुक्त राजीव पांडेय का रुख हमेशा से नियमों की कड़ाई से पालना करने का रहा है। उन्होंने पूर्व में भी अपनी सफाई में स्पष्ट किया था कि वे किसी भी नियम के विरुद्ध या विधि के प्रतिकूल जाकर कार्य नहीं करेंगे। उनका मानना है कि निगम के सीमित संसाधनों के भीतर पारदर्शिता और तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना उनका पहला शासकीय कर्तव्य है। यदि सामान्य सभा या महापौर परिषद द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय कानून के दायरे से बाहर जाता है, तो एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे उस विषय को राज्य शासन के संज्ञान में लाएं।
स्थानीय निकायों के संचालन के लिए एक नजीर साबित होगा हाई कोर्ट का यह दूरगामी फैसला
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह निर्णय आने वाले समय में राज्य के सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के सुचारू संचालन के लिए एक मार्गदर्शक नजीर साबित होगा। कई बार स्थानीय निकायों में राजनीतिक रस्साकशी के चलते संख्या बल के दम पर नियमों को ताक पर रखकर प्रशासनिक अधिकारियों को दबाने या हटाने के प्रयास किए जाते हैं, जिस पर इस फैसले ने पूरी तरह से कानूनी रोक लगा दी है।
हाई कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से यह संदेश पूरी तरह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में लोकतान्त्रिक संस्थाओं को शक्ति जरूर मिलती है, लेकिन वह शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती। बहुमत का उपयोग केवल स्थापित कानूनों के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है। इस फैसले के बाद भिलाई नगर निगम की सियासत में फिलहाल पार्षदों के गुट को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है, वहीं प्रशासनिक खेमे को नियमों के मुताबिक काम करने की नई ताकत मिली है।



