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हमने सहना सीख लिया है, कुछ न कहना सीख लिया है ; बोलेंगे तो बात बढ़ेगी, चुप ही रहना सीख लिया है..

शंकर पांडे (वरिष्ठ पत्रकार) एम.ए., बी.एससी., एलएल.बी., बी.जे. (पत्रकारिता) हैं। अविभाजित म.प्र. से छत्तीसगढ़ में पिछले 46 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैँ, पत्रकारिता के साथ ही "छत्तीसगढ़" पर 6 पुस्तकें भी लिख चुके हैं, प्रिंट सहित इलेक्ट्रानिक मिडिया में कार्य किया है। इनकी रूचि राजनीति, इतिहास, क्राइम, संस्कृति लेखन में है।



‘आइना-ए-छत्तीसगढ़’

“Aaina-E-Chhattisgarh”
शंकर पांडेय, रायपुर, 30/10/2026

 

हमने सहना सीख लिया है, कुछ न कहना सीख लिया है…
बोलेंगे तो बात बढ़ेगी, चुप ही रहना सीख लिया है…

बापू यानि महात्मा गांधी के 3 बंदर अपने आप में एक कहावत बन चुके हैं। गांधी के तीन विचारों को दर्शाने वाले ये बंदर बताते हैं, बुराई से दूर 3 विचारों को दर्शानेवाले रहना चाहिए। न बुरा देखा जाए, न बुरा कहा जाए और न बुरा सुना जाये.. गाँधी के 3 विचारों को दर्शानेवाले बंदर बताते हैं, व्यक्ति को बुराइयों से दूर होना चाहिये, न बुरा देखा जाय, न बुरा कहा जाये, न ही बुरा सुना जाये.. पर भारत की कुछ विपक्षी पार्टियों ने बापू के 3 बंदरों की परिभाषा ही बदल दी है? जो अंधा था वह क़ानून बन गया है! जो बहरा था वह सरकार बन गयी है! जनता की आवाज उसे सुनाई ही नहीं दे रही है? जो गूंगा था वह कुछ मिडिया बन गया है, वह तो सरकार के खिलाफ कुछ बोलता ही नहीं है….! वैसे बापू को 3 बंदर चीन के किसी प्रतिनिधि मंडल ने भेंट किया था, ये गाँधी जी को इतने पसंद आये की जीवन भर अपने पास रखा था।


 

‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ में क्या खास..

नेहरु-गाँधी परिवार की बहु, कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री सोनिया गाँधी ने अपनी पुस्तक में ज़िंदगी के पहलुओं को सामने रखने जा रही हैं जिनके बारे में सालों तक लोगों से बहुत कम बात की। 544 पन्नों की किताब 10 नवंबर को प्रकाशित होगी, इटली में उनके बचपन से ले भारत में जीवन, परिवार की त्रासदियों और राजनीति में प्रवेश तक की कहानी दर्ज है। सोनिया के मुता बिक, अपनी ज़िंदगी पर लिखना आसान नहीं था, क्योंकि मतलब उन अनु भवों को दोबारा याद करना था जिन्हें लंबे समय तक भीतर संजो रखा था, सोनिया की व्यक्तिगत यादें, पारिवारिक संबंध, भारत में लंबे सार्वजनिक जीवन की गतिविधियां है, किताब में प्यार, परिवार, पहचान जिम्मेदारी, ‘अपनेपन’ कीतलाश विषय प्रमुख हैं, किताब की शुरु आत सन 1965 कैम्ब्रिज इंग्लैंड से होती है। 19 साल की सोनिया माइनो छात्रा थीं जहां मुलाकात राजीव गांधी से हुई, दोनों के बीच प्रेम संबंध शुरू हुआ, बाद में वे भारत आती हैँ, राजीव गांधी से शादी की, तब भारत की पीएम इंदिरा गांधी की बहू बनीं उनके संस्मरण में राजीव-इंदिरा गांधी का जिक्र, परिवार से जुड़ी घटनाओं का व्यक्तिगत नज़रिये से वर्णन है संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या, 7 साल बाद राजीव की हत्या जैसी त्रासदियों का जिक्र है, सोनिया के अनुसार भारत आने के बाद हिंदी सीखना, साड़ी पहनना, भारतीय खान-पान अपनाने की कोशिश की। यह सफर छोटे शहरवाले इटली, उनके बचपन से भारत की जटिल सामाजिक, राजनीतिक दुनिया पहुंचने का था। सोनिया के राजनीति से दूरी बना रखने और बाद में प्रवेश करने की कहानी भी शामिल है। राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया पर राजनीति में आने दबाव रहा, लेकिन शुरुआत में दूरी बनाये रखी। बाद में वह भारत की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं राजनीति यात्रा का सबसे चर्चित अध्याय 2004 का है। कांग्रेस नीत गठबंधन के चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी ने पीएम पद स्वीकार नहीं किया! अपनेपन में उनके फैसले, उस दौर के अनुभवों को भी जगह दी है, किताब का शीर्षक ही इसके विचार की ओर इशारा करता है, अपनेपन की तलाश! इटली में बचपन, भारत में छह दशकों से ज्यादा समय रहने सोनिया , सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों को करीब से देखा। किताब में वह भारत को अपनेपन यानी अपनेपन वाले देश के रूप में देखती हैं। उनके अनुसार जब उन्होंने राजनीति से दूरी बना पीछे मुड़ अपने जीवन को देखा तो पूरी यात्रा में प्यार और वफादारी की एक निरंतर कड़ी दिखाई दी, यही वजह है किताब राज नीतिक घटनाओं का रिकॉर्ड नहीं, व्यक्तिगत अनुभवों, भावनात्मक यात्रा पर भी केंद्रित है। देखना यह है, राजीव के साथ छ्ग के कुल्हाड़ी घाट और दुगली आने का उल्लेख है या नहीं..?

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बस्तर : कई राष्ट्रपति, पीएम आ चुके हैँ….

छत्तीसगढ़ के बस्तर का दौरा अब तक देश के कई राष्ट्रपति कर चुके हैं। मुख्य रूप से देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद 23 मार्च 1953 को बस्तर आए थे। जगदलपुर के पास ग्रामीण इलाके में श्रम दान से बने छात्रावास, कुएं निर्माण का उद्घाटन किया था। राष्ट्रपति बनने के बाद 3-4 जून 2004 को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम बस्तर के रान सर्गीपाल पहुंचे थे। इससे पहले रक्षा वैज्ञानिक के तौर पर कई बार बस्तर आ चुके थे। प्रतिभा ताई पाटिल बस्तर आने वाली तीसरी राष्ट्रपति थीं। परिवार के साथ 29 सितंबर 2008 को बस्तर आई, प्रतिभाजी विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात देखने गई। जल प्रपात के सौंदर्य से अभिभूत हो कर, बस्तर पर्यटन को बढ़ावा देने, सुविधाओं के विस्तार की भी जरूरत बताई थी। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 25-26 जुलाई 2018 को दो दिवसीय दौरे पर बस्तर (जगदलपुर-दंतेवाड़ा) पहुंचे थे। वे चित्रकोट में रात्रि विश्राम करने वाले पहले राष्ट्रपति थे। वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू कई बार बस्तर आ चुकी हैं। उन्होंने 7 फरवरी 2026 को जगदलपुर में ‘बस्तर पंडुम 2026’ का शुभारंभ किया था, 23 अक्टूबर 2026 को ही बस्तर दशहरा के अवसर पर ऐतिहासिक मुरिया दरबार, सार्वजनिक, कार्यक्रमों में शामिल हुईं बस्तर में अब तक कई पीएम आ चुके हैं। देश के पहले पीएम पंडित नेहरू 1955 में बस्तर आए थे। इंदिरा गांधी 1972 में अबूझमाड़ और बस्तर के दौरे पर आई थीं। पूर्व पीएम राजीव गांधी भी अपने कार्यकाल, राजनीतिक दौरों के दौरान बस्तर आए थे। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी पहले और पीएम के कार्य काल के दौरान (1998, 1999 चुनाव प्रचार के दौरान) बस्तर (सोनार पाल-जगदलपुर के लाल बाग मैदान) आए थे। पूर्व पीऍम डॉ. मनमोहन सिंह छत्तीसगढ़ और नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के दौरों पर आए थे, 2013 में ही सुकमा बस्तर क्षेत्र नक्सली हमले बाद जायज़ा लेने, घायलों से मिलने पहुंचे थे।वर्तमान पीएम नरेंद्रमोदी कई बार बस्तर आ चुके हैं। वर्ष 2015 में दंते वाड़ा और 3 अक्टूबर 2023 को जगदलपुर (बस्तर) का दौरा किया था।

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पानी को फिर गांव का बनाने की कहानी…

छत्तीसगढ़िया, वरिष्ठ आईएएस, आयुक्त तारन प्रकाश सिन्हा का एक लेख काफी चर्चा में है, उनका कहना है पानी कभी किसी एक का नहीं होता। बादल से उतर कर धरती में समाता है, कुएं में ठहरता है, तालाब में सोता है, और फिर किसी न किसी बहाने पूरे गांव के काम आता है। छग के लोग भूले नहीं थे, बस थोड़ी धूल जम गई थी, 24 अप्रैल 2025 को, पंचायती राज दिवस के दिन, इसी धूल को झाड़ने का काम शुरू हुआ नाम रखा गया “मोर गांव, मोर पानी”। यह कोई ऐसी योजना नहीं हैजो दफ्तर में बनी, गांव में उतार दी गई। इसकी बुनावट उलटी है। गांव ने बताया उसे क्या चाहिए और काम उसी हिसाब से हुआ। बड़े बांध नहीं, बड़ी मशीनें नहीं बड़े ठेके नहीं। छोटे-छोटे डबरी तालाब, मेड़, बांधान जैसे दादा-परदादा बनाया करते थे, वैसे ही, परआज के हाथों से। मनरेगा/वीबी जी रामजी के मजदूरों ने अपने गांव की धरती पर अपने गांव का पानी रोका भी । आंकड़ा बताता है, 33 जिलों में अभी तक ₹ दो हजार करोड़ से अधिक खर्च करके एक लाख 3 हजार 651 ऐसे काम मंजूर हो चुके हैं।कबीरधाम, बिलासपुर, बालोद जैसे जिले सबसे आगे रहे, पर नारायणपुर और सुकमा जैसे कठिन क्षेत्र भी इस यात्रा से अछूते नहीं रहे। पानी किसी सीमा को नहीं मानता,न इस अभियान ने माना।नाम भी कितने अपने से हैं “नवा तरिया”, “आय के जरिया” “आजीविका डबरी”, “आवा पानी झोखो”। ये शब्द किसी फाइल से नहीं, गांव की बोली से निकले हैं। भाषा अपनी होती है, तो काम अपना लगने लगता है। लोग इसे सरकार का नहीं आंगन का काम मानने लगे पुराना ज्ञान, नई तकनीक से हाथ मिलाता दिखा। एक ओर बुजुर्गों का वह हिसाब बताता था पानी कहां रुकेगा, कहां बहेगा। दूसरी ओर युक्तधारा पोर्टल, क्लार्ट जैसे ऐप हैं, जो उसीको विज्ञान की भाषा में कहते हैं.. “जल दूत” नाम की एक व्यवस्था अब कुओं का जलस्तर नापती है, और पंचायत भवन की दीवार पर वह आंकड़ा लिखा जाता है, गांव अब पानी काहिसाब-किताब खुद रखने लगा हो। हर पंचायत में एक क्यू.आर कोड भी लगा है। पानी बचाना ही काफी नहीं था, इसलिए अभियान ने पानी को कमाई से भी जोड़ा। 15 हजार से भी अधिक “आजीविका डबरी” अकेले उन परिवारों की जमीन पर बनी हैं, अब तक हाशिये पर खड़े थे, आदिवासी, महिलाएं, और विशेष रूप से कमजोर जन जातीय समूह। इन डबरियों में मछली पलती है, किनारे सब्जी उगती है। 700 से अधिक सामुदायिक तालाब स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के हवाले हैं,जो अब पानी की रखवाली भी करती हैं और उसकी कमाई बांटती हैं। पीएम आवास योजना के डेढ़ लाख से अधिक घरों में लोगों ने अपने खर्च से ही वर्षा जल संचयन लगवा लिया, किसी ने कहा नहीं, खुद समझा। इस पूरी यात्रा में बात सबसे गहरी है मनरेगा, वीबी जीरामजी के जरिए हर दिन हजारों, लाखोँ हाथों को काम मिल रहा है, इनमें आधे से अधिक हाथ महिलाओं के हैं। यानी पानी कभी सिरपर ढोया जाता था, अब वही पानी महिलाओं के हाथों में मजदूरी और मान दोनों लेकर आ रहा है और इस सबका असर धरती के भीतर दिखने लगा है। पुराने समय में तो गांव तालाब खुद खोदते थे, खुद संभालते थे। बीच में यह समझ कहीं खो गई थी, पानी की जिम्मेदारी गांव की अपनी है। “मोर गांव, मोर पानी” उसी पुरानी समझ को नए ढंग से लौटा लाया है। जल संरक्षण की योजना नहीं, यह याद दिलाने का भी प्रयास है जब गांव अपने पानी को अपना मान लेता है, तो पानी भी गांव का ही हो जाता है बरसों तक, पीढ़ियों तक…।

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और अब बस…

* जगदलपुर में मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा दुनिया का सबसे लंबा लगभग 75 से 76 दिनों तक चलने वाला अनोखा लोक पर्व है।

* छ्ग में कुछ तो खास बात है तभी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, पीएम, गृहमंत्री यहां आते रहते हैँ।

* छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक पिकअप वाहन के सीक्रेट चैंबर से ₹ 4 करोड़ कैश बरामद किया गया है।

‘आइना-ए-छत्तीसगढ़ ‘
 {21 सालों से लगातार}


 

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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