छत्तीसगढ़ कोल घोटाला: आईएएस अधिकारियों के वाट्सएप चैट से खुलासा, भूपेश बघेल को थी पूरी जानकारी
ईओडब्ल्यू ने कोयला लेवी घोटाले में विशेष अदालत में पूरक आरोपपत्र पेश किया है। आईएएस अधिकारियों के वाट्सएप चैट से बड़ा खुलासा हुआ है कि पूरी कार्यप्रणाली और अवैध वसूली की जानकारी तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी।

डिजिटल सबूतों की शृंखला में सबसे अहम खुलासा तत्कालीन खनिज सचिव अंबलगन पी और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा के बीच 15 जून 2019 को हुई बातचीत से हुआ है। इस दिन कोरबा जिले की प्रमुख कोल वाशरियों पर अचानक एक बड़ी और गोपनीय संयुक्त कार्रवाई की गई थी। अंबलगन ने इस भारी-भरकम प्रशासनिक कदम की पल-पल की जानकारी टुटेजा को वाट्सएप के माध्यम से दी थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि इस पूरी कार्रवाई को अत्यधिक गोपनीय रखा गया है और इसकी भनक केवल खनिज संचालक तथा कोरबा कलेक्टर को है। प्रशासनिक अमले में इस स्तर की गोपनीयता अमूमन बड़े अभियानों में ही बरती जाती है। जब अंबलगन ने संवाद के दौरान इस पूरे मामले को मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाने का सुझाव दिया, तो दूसरी तरफ से टुटेजा का जवाब बेहद स्पष्ट था। उन्होंने तुरंत लिखा कि माननीय मुख्यमंत्री को इसकी जानकारी है। इस एक वाक्य ने पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली को बेनकाब कर दिया है। इसी बातचीत में यह भी तय किया गया कि मीडिया को भटकाने के लिए इस कार्रवाई को एक सामान्य और रूटीन जांच बताया जाएगा। ऐसा ही हुआ। सच को फाइलों में दफन कर दिया गया।
जांच एजेंसी के दस्तावेजों के पन्ने दर पन्ने पलटने पर यह साफ होता है कि यह सिंडिकेट केवल कुछ अधिकारियों की मिलीभगत का परिणाम नहीं था, बल्कि इसे संस्थागत रूप दे दिया गया था। कोयला परिवहन को पूरी तरह से नियंत्रित करने के लिए ई-परमिट प्रणाली में बड़े पैमाने पर मनमाने बदलाव किए गए। इन तकनीकी बदलावों का एकमात्र उद्देश्य अवैध वसूली को सुगम बनाना था। वाट्सएप संदेशों की गहराई से जांच करने पर पता चला है कि अधिकारियों ने जानबूझकर नियमों में ऐसी खामियां छोड़ीं ताकि परिवहनकर्ताओं को ब्लैकमेल किया जा सके। बिना लेवी चुकाए एक भी ट्रक अपनी जगह से हिल नहीं सकता था। यह पूरा तंत्र एक समानांतर सरकार की तरह काम कर रहा था। जांच अधिकारियों ने दस्तावेजों में दर्ज किया है कि इतने बड़े पैमाने पर हो रही अनियमितता सत्ता के शीर्ष संरक्षण के बिना संभव ही नहीं थी। वाट्सएप से निकले साक्ष्यों ने उन सभी दावों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि उच्च स्तर पर किसी को इस भ्रष्टाचार की भनक नहीं थी।
कोयला लेवी वसूली तक ही यह नेटवर्क सीमित नहीं रहा। पूरक आरोपपत्र में यह सनसनीखेज तथ्य भी सामने आया है कि जांच की आंच अब आयरन पैलेट और लौह अयस्क उद्योगों तक पहुंच चुकी है। तत्कालीन भौमिकी एवं खनिकर्म संचालक आईएएस जयप्रकाश मौर्य और निलंबित आईएएस समीर विश्नोई के बीच हुई वाट्सएप बातचीत ने एक नए घोटाले का पर्दाफाश किया है। अदालत में पेश किए गए चैट ट्रांसक्रिप्ट के मुताबिक 28 सितंबर 2021 से लेकर मई 2022 की लंबी अवधि के दौरान इन दोनों अधिकारियों का खनिज पट्टों के आवंटन और अल्ट्राटेक के प्रतिनिधियों को लेकर तत्कालीन विभागीय अधिकारी अनुराग दीवान के साथ लगातार संवाद होता रहा। यह बातचीत सामान्य विभागीय कामकाज का हिस्सा बिल्कुल नहीं थी। इसके पीछे एक गहरी साजिश रची जा रही थी। खनिज संपदा की लूट का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा था।
जांच में इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि मौर्य ने आयरन ओर उद्योगपतियों की एक विशेष बैठक बुलाई थी। इस बैठक का एजेंडा राज्य के विकास पर चर्चा करना नहीं था। इसका मुख्य उद्देश्य उद्योगपतियों पर प्रति टन एक सौ रुपये की अवैध लेवी चुकाने का दबाव बनाना था। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मौर्य ने इन उद्योगपतियों को सीधे तौर पर आरोपित सूर्यकांत तिवारी और उसके सिंडिकेट से संपर्क करने का निर्देश दिया था। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी द्वारा सीधे तौर पर एक प्राइवेट सिंडिकेट को अवैध वसूली का ठेका दिलाना प्रशासनिक पतन की पराकाष्ठा को दर्शाता है। यह कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई थी। पूरा औद्योगिक जगत इस अवैध वसूली तंत्र से त्रस्त था। लेवी नहीं देने वालों के खनिज पट्टे निरस्त करने या उनके काम में प्रशासनिक अड़चनें पैदा करने की खुली धमकी दी जाती थी।
सिंडिकेट को मजबूती प्रदान करने के लिए तकनीकी रास्तों का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया। 20 से 31 जुलाई 2020 के बीच विश्नोई की अन्य अधिकारियों के साथ हुई वाट्सएप बातचीत से यह साबित होता है कि ई-परमिट व्यवस्था में किए गए बदलाव पूरी तरह से पूर्व नियोजित थे। विश्नोई ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सिस्टम को इस तरह से डिजाइन किया जाए जिससे हर एक ट्रांजैक्शन सिंडिकेट की नजर से होकर गुजरे। करोड़ों रुपये की इस लेवी का बड़ा हिस्सा सत्ता के गलियारों तक पहुंचता था। कांग्रेस कार्यालय राजीव भवन तक 104 करोड़ रुपये पहुंचने के खुलासे ने पहले ही राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। इस 570 करोड़ रुपये के महाघोटाले में अब तक कई बड़े नेताओं और अधिकारियों की संलिप्तता उजागर हो चुकी है। कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव सहित नौ आरोपियों को विशेष अदालत द्वारा समन जारी किया जाना इस मामले की गंभीरता को और बढ़ा देता है।
जांच के इस वर्तमान चरण में अधिकारी वाट्सएप चैट, डिजिटल साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को एक-दूसरे से जोड़ने में लगे हुए हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच एजेंसी ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से भी उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया था। हालांकि यह प्रयास सफल नहीं हो सका क्योंकि उनसे कोई संपर्क स्थापित नहीं हो पाया। डिजिटल ट्रांसक्रिप्ट में मौजूद अधिकारियों के सीधे संवाद अब न्यायालय की निगरानी में हैं। हर एक संदेश का तकनीकी और कानूनी विश्लेषण किया जा रहा है। जांच एजेंसियां अब लौह अयस्क मामले में शामिल सिंडिकेट के अन्य सदस्यों की धरपकड़ की तैयारी कर रही हैं। अदालत में अगली सुनवाई के दौरान इन वाट्सएप चैट के मेटाडेटा और सर्वर लॉग्स को बतौर प्राथमिक साक्ष्य प्रस्तुत करने की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है।



