छत्तीसगढ़ में मतांतरण पर नंदकुमार साय का विस्फोटक दावा: आदिवासी ही नहीं, साहू समाज में भी बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन का आरोप, सियासी गलियारों में मचा हड़कंप
वरिष्ठ भाजपा नेता नंदकुमार साय ने राज्य में सुनियोजित तरीके से चल रहे मतांतरण के खेल को लेकर बड़ा दावा किया है, जिसके बाद प्रभावशाली साहू समाज और आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की राजनीति में एक नया उबाल आ गया है।

रायपुर 25 जून 2026 : छत्तीसगढ़ के भीतर पिछले लंबे समय से जारी मतांतरण (धर्म परिवर्तन) की बहस एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। प्रदेश के बेहद कद्दावर आदिवासी नेता और पूर्व भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार साय के एक ताजा और बेहद सनसनीखेज बयान ने राज्य के सियासी तापमान को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।
नंदकुमार साय ने सीधे तौर पर यह दावा किया है कि छत्तीसगढ़ में केवल अनुसूचित जनजाति (आदिवासी समाज) को ही निशाना नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि राज्य के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सर्वाधिक प्रभावशाली माने जाने वाले साहू समाज (तेली समुदाय) समेत कई अन्य महत्वपूर्ण जातियों के लोग भी बहुत बड़ी तादाद में मतांतरित हो रहे हैं। वरिष्ठ नेता के इस आरोप के बाद पूरे प्रदेश में प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
सुनियोजित तरीके से हो रहा मतांतरण: साय के गंभीर आरोप
नंदकुमार साय ने अपने आधिकारिक बयान में बेहद कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कहा कि राज्य के भीतर एक सोची-समझी और सुनियोजित रणनीति के तहत भोले-भले लोगों का मतांतरण कराया जा रहा है। उन्होंने इस पूरे नेटवर्क को देश और समाज की आंतरिक सुरक्षा तथा ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरा बताया।
साय ने मांग की है कि इस अवैध और अनैतिक खेल में शामिल जितने भी लोग हैं, चाहे वे किसी भी ऊंचे पद या संस्था से जुड़े हों, उनके खिलाफ राज्य सरकार को तत्काल प्रभाव से अब तक की सबसे सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
सामाजिक और कानूनी स्तर पर होगा आर-पार का विरोध
अपने संबोधन में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने साफ किया कि मतांतरण की इन बढ़ती राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आने वाले दिनों में इस कुप्रथा में शामिल ताकतों का सामाजिक और कानूनी, दोनों ही स्तरों पर पुरजोर तरीके से विरोध किया जाएगा।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो भी संगठन या व्यक्ति बलपूर्वक, किसी भी प्रकार के आर्थिक या भौतिक प्रलोभन, मानसिक दबाव या फिर शादी व नौकरी का झांसा देकर धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन कराने का दोषी पाया जाएगा, उसे किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। ऐसे तत्वों को जेल की सलाखों के पीछे भेजने के लिए समाज खुद कानून का सहारा लेगा।
छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2020 और बस्तर के जमीनी हालात
छत्तीसगढ़ में जबरन या प्रलोभन देकर कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2020’ पूरी कठोरता के साथ लागू है। इस कड़े कानून के प्रावधानों के तहत किसी भी व्यक्ति को भय, प्रलोभन, कपट या विवाह के माध्यम से एक धर्म से दूसरे धर्म में ले जाना एक गंभीर संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है।
हालिया जमीनी रिपोर्टों और पुलिस रिकॉर्ड्स पर नजर डालें, तो राज्य के बस्तर संभाग के अंतर्गत आने वाले सुदूर जिलों (जैसे नारायणपुर, कोंडागांव और बस्तर) में मतांतरण से जुड़े विवादों के चलते स्थानीय स्तर पर लगातार हिंसक झड़पें और सामाजिक तनाव की दुखद घटनाएं सामने आई हैं। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए राज्य प्रशासन ने अब प्रत्येक जिला स्तर पर विशेष निगरानी दल और त्वरित शिकायत निवारण समितियों का गठन किया है, जो ऐसी हर संदिग्ध गतिविधि पर पैनी नजर रख रही हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में साहू समाज का विशाल साम्राज्य और आबादी के आंकड़े
नंदकुमार साय द्वारा अपने बयान में विशेष रूप से साहू समाज का नाम लिए जाने के पीछे इस वर्ग की विशाल आबादी और उनका राजनीतिक रसूख है। छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या में साहू (तेली) समाज की हिस्सेदारी विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार लगभग 20% से लेकर 24% के बीच आंकी जाती है।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की सटीक गणना के लिए ‘क्वांटिफाइएबल डेटा आयोग’ (Quantifiable Data Commission) का गठन किया गया था। इस आयोग की एक लीक हुई रिपोर्ट जो इंटरनेट मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर काफी प्रसारित हुई थी, उसके अनुसार छत्तीसगढ़ में अकेले साहू समाज की जनसंख्या लगभग 30 लाख 5 हजार 661 दर्ज की गई थी।
इस लीक हुए डेटा के मुताबिक, साहू समाज पूरे छत्तीसगढ़ की कुल ओबीसी आबादी में सबसे शीर्ष स्थान (लगभग 24.03%) पर काबिज है। हालांकि, यहां यह ध्यान रखना बेहद आवश्यक है कि इस रिपोर्ट के आंकड़ों को तत्कालीन या वर्तमान सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक मंचों पर जारी नहीं किया गया है। भारत के इतिहास में आखिरी बार संपूर्ण और आधिकारिक जातिगत जनगणना ब्रिटिश काल के दौरान सन 1931 में आयोजित की गई थी। यही कारण है कि आज जितने भी सामाजिक आंकड़े सामने आते हैं, वे सभी या तो अनौपचारिक रिपोर्ट्स पर आधारित हैं या फिर विभिन्न आयोगों के अनुमानित सर्वे मात्र हैं।
90 में से 37 सीटों पर सीधा प्रभाव, सत्ता की चाबी है यह समुदाय
छत्तीसगढ़ के चुनावी और राजनीतिक समीकरणों में साहू समाज को ‘किंगमेकर’ का दर्जा प्राप्त है। राज्य की कुल 90 विधानसभा सीटों में से लगभग 30 से लेकर 37 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां साहू समाज के मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका में है। बिलासपुर, दुर्ग और रायपुर संभाग के मैदानी इलाकों में इस समाज का दबदबा इतना ज्यादा है कि कोई भी राजनीतिक दल इन्हें टिकट वितरण में नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
यही वजह है कि जब नंदकुमार साय जैसे कद्दावर आदिवासी चेहरे ने इस समाज के भीतर चल रहे मतांतरण का मुद्दा उठाया, तो इसने सीधे तौर पर राज्य के सबसे बड़े वोट बैंक को झकझोर कर रख दिया है। जानकारों का मानना है कि साय का यह बयान आने वाले समय में राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है और दक्षिणपंथी संगठन इस मुद्दे को लेकर और अधिक आक्रामक रुख अख्तियार कर सकते हैं।
गंभीर सामाजिक चिंता का विषय और प्रशासनिक चुनौतियां
नंदकुमार साय के इस बयान के बाद समाजविदों का मानना है कि यदि जनजातीय क्षेत्रों के बाद अब मैदानी इलाकों के ओबीसी बाहुल्य समाजों में भी मतांतरण की शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो यह प्रदेश की आंतरिक शांति के लिए एक बेहद गंभीर चुनौती साबित होगी।
प्रशासनिक स्तर पर अब खुफिया तंत्र (Inteligence) को और अधिक सक्रिय करने की मांग उठ रही है, ताकि ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में चल रही प्रार्थना सभाओं और चंगाई सभाओं की आड़ में होने वाले कथित धर्म परिवर्तन के खेल की वास्तविक सत्यता का पता लगाया जा सके और दोषियों के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई की जा सके।



