रायपुर, 23 जून 2026: छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय में लंबित और नए दर्ज हो रहे अवमानना मामलों के आंकड़ों ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। इस संवेदनशील विषय को आधार बनाकर पूर्व कैबिनेट व विधि मंत्री मोहम्मद अकबर ने वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने राज्यपाल को एक औपचारिक पत्र प्रेषित कर राज्य के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही की भारी कमी होने का दावा किया है।

राज्यपाल को पत्र: प्रशासनिक शिथिलता पर उठाए कड़े सवाल
पूर्व विधि मंत्री मोहम्मद अकबर ने 22 जून 2026 को राजभवन को भेजे अपने पत्र में राज्य सरकार की कार्यशैली को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों और आदेशों का समय पर पालन करना किसी भी चुनी हुई सरकार का संवैधानिक और वैधानिक दायित्व होता है। इसके बावजूद, छत्तीसगढ़ में निचले स्तर से लेकर मंत्रालय तक के अधिकारी अदालती आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं।
अकबर ने राज्यपाल से विशेष आग्रह किया है कि वे इस गंभीर और संवैधानिक संकट वाले विषय पर तत्काल राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित करें और प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायालय के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए कड़े कदम उठाने का निर्देश दें।
पांच सालों के आंकड़े दे रहे हैं बड़ी गवाही
अपने पत्र के साथ पूर्व मंत्री ने उच्च न्यायालय के पिछले पांच वर्षों के आधिकारिक आंकड़ों की एक सूची भी संलग्न की है। यह तालिका स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि आम नागरिकों को अपने हक के फैसलों को लागू करवाने के लिए किस कदर दोबारा अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं:
| वर्ष | दर्ज अवमानना याचिकाओं की संख्या |
|---|
| 2021 | 1010 |
| 2022 | 1279 |
| 2023 | 1185 |
| 2024 | 1504 |
| 2025 | 1884 |
| 2026 (14 जून तक) | 744 |
इन आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि वर्ष 2021 की तुलना में वर्ष 2025 तक आते-आते अवमानना के मामलों में लगभग 87 प्रतिशत की एक अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2025 में दर्ज हुए 1884 मामले अब तक के इतिहास में सबसे उच्च स्तर पर हैं।
भाजपा सरकार के आते ही मामलों में आई तेजी
कांग्रेस नेता मोहम्मद अकबर ने सीधे तौर पर राजनीतिक हमला बोलते हुए कहा कि दिसंबर 2023 में प्रदेश की सत्ता में भाजपा की वापसी के बाद से इस ग्राफ में अप्रत्याशित उछाल आया है। वर्ष 2024 और 2025 के आंकड़े इसकी सीधी पुष्टि करते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकार और उसके वरिष्ठ सचिवों द्वारा समय-समय पर विभागों की समीक्षा की जाती, तो आम जनता को कोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिए दोबारा पैसे खर्च करके अवमानना याचिका लगाने की नौबत ही नहीं आती। बार-बार अवमानना याचिकाओं का दायर होना यह साबित करता है कि वर्तमान नौकरशाही बेलगाम हो चुकी है और उसे कानून का कोई डर नहीं रह गया है।
पूर्व विधि मंत्री ने सरकार के समक्ष रखीं तीन प्रमुख मांगें
इस प्रशासनिक गतिरोध को दूर करने और आम जनता को त्वरित न्याय दिलाने के उद्देश्य से मोहम्मद अकबर ने अपने पत्र के जरिए शासन से तीन बेहद महत्वपूर्ण मांगें की हैं:
- नियमित समीक्षा तंत्र का गठन: राज्य सरकार और सामान्य प्रशासन विभाग हर महीने सभी विभागों में लंबित पड़े अदालती आदेशों और उनके अनुपालन की बिंदुवार समीक्षा करें।
- दोषी अधिकारियों पर कड़ा एक्शन: जो भी अधिकारी तय समय-सीमा के भीतर माननीय न्यायालय के आदेश को लागू नहीं करता है, उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए और उसके खिलाफ सेवा नियमों के तहत दंडात्मक कार्रवाई हो।
- प्रशिक्षण और विधिक साक्षरता: सभी विभागों के आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (डीडीओ) और स्थापना प्रभारियों को आवश्यक कानूनी प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे अदालती आदेशों की तकनीकी बारीकियों को समझकर तत्काल अनुपालन सुनिश्चित कर सकें।
वर्ष 2026 के शुरुआती आंकड़े भी चिंताजनक
चालू वर्ष 2026 के जो आंकड़े 14 जून तक सामने आए हैं, वे भी बेहद डरावने हैं। महज साढ़े पांच महीनों के भीतर ही उच्च न्यायालय में 744 अवमानना के केस दर्ज किए जा चुके हैं। यदि मामलों के बढ़ने की यही रफ्तार जारी रही, तो इस साल के अंत तक यह संख्या 1400 या 1500 के पार पहुंच सकती है। हालांकि यह संख्या पिछले साल के रिकॉर्ड को तोड़ेगी या नहीं, यह आने वाले समय में साफ होगा, लेकिन मौजूदा आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि राज्य का प्रशासनिक अमला कोर्ट के आदेशों को बेहद हल्के में ले रहा है।