बेलसोंडा भू-विवाद:माफियागीरी और रसूख का नंगा नाच,पूर्व सरपंच ने खोला वर्तमान सरपंच और जनपद पदाधिकारियों के खिलाफ मोर्चा
अधिकारियों की मिलीभगत और बिना RI के दस्तखत वाले 'फर्जी पंचनामे' की खुली पोल; जिला राजस्व टीम के सीमांकन ने पलटी पूरी बाजी।

महासमुंद/बेलसोंडा । ग्रामीण राजनीति की आड़ में पनप रहे भू-माफिया तंत्र, प्रशासनिक मिलीभगत और राजनीतिक विद्वेष का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने महासमुंद जिला प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। ग्राम पंचायत बेलसोंडा की पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर ने वर्तमान पंचायत और जनपद पदाधिकारियों के खिलाफ आर-पार की जंग का ऐलान करते हुए कलेक्टरेट पहुंची । पूर्व सरपंच ने ग्रामीणों और पूर्व पंचों की भारी हुजूम के साथ कलेक्टर को एक ऐसा शिकायती दस्तावेज सौंपा है, जिसने सत्ता की हनक पर बैठे मौजूदा प्रतिनिधियों की नींद उड़ा दी है।
पूर्व सरपंच भामिनी चंद्राकर ने तीखे तेवरों में वर्तमान पंचायत राज व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि वर्तमान सरपंच प्रीति ढीमर और जनपद के कुछ रसूखदार पदाधिकारियों द्वारा सीधे-साधे और निर्दोष ग्रामीणों का मानसिक शोषण किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कलेक्टरेट में अपनी खोखली धमक दिखाने और सरेआम फोटो खिंचवाकर ‘क्रेडिट’ लूटने की भूख में, ग्रामीणों को ‘आवास दिलाने’ का झांसा देकर कलेक्टरेट लाया गया। यह जनदर्शन का उपयोग नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए रचा गया एक सोची-समझी साजिश का “पॉलिटिकल स्टंट” था।
पूर्व सरपंच ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि वर्तमान सरपंच प्रीति ढीमर अपनी डगमगाती राजनीतिक कुर्सी और साख को बचाने के लिए बौखलाहट में हैं। इसी दुश्मनी और राजनीतिक द्वेष के चलते उन्होंने पद का दुरुपयोग कर उनकी निजी लगानी (स्वामित्व वाली) जमीन को निशाना बनाया और उसे तहस-नहस करने की कोशिश की।
इस दमनकारी कार्रवाई की पोल खोलते हुए भामिनी चंद्राकर ने बड़ा तकनीकी साक्ष्य पेश किया। उन्होंने बताया कि जिस तोड़फोड़ की कार्रवाई को बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा था, उसके पंचनामे पर आज तक राजस्व निरीक्षक (RI) मनीष श्रीवास्तव के हस्ताक्षर ही नहीं हैं। बिना सक्षम अधिकारी के दस्तखत का यह पंचनामा चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि यह पूरी कार्रवाई कितनी फर्जी, एकतरफा और गैर-कानूनी थी।
प्रशासनिक उपेक्षा के खिलाफ लगभग चार महीने तक न्याय की चौखट पर डटे रहने के बाद आखिरकार सच की जीत हुई। 25 जून 2026 को जिला राजस्व टीम द्वारा किए गए उच्च स्तरीय मौका जांच और सीमांकन की आधिकारिक रिपोर्ट ने विरोधियों के झूठे दावों को जमींदोज कर दिया।
आधिकारिक पंचनामा रिपोर्ट में यह प्रामाणिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि:
- शासकीय भूमि खसरा नंबर 1661, 1651 और 2466 (जो मूल खसरा नंबर 398 का हिस्सा हैं) पूर्व सरपंच की निजी लगानी भूमि की सीमा से पूरी तरह बाहर और अलग हैं।
- पूर्व में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर की गई प्रशासनिक कार्रवाई पूरी तरह त्रुटिपूर्ण और आधारहीन थी। इस आधिकारिक क्लीन चिट के बाद ही पूर्व सरपंच ने नियमानुसार अपने खेत की जुताई कराई है।
भामिनी चंद्राकर ने रसूखदारों के दोहरे चरित्र को बेनकाब करते हुए प्रशासन के सामने एक बड़ा गणितीय और तार्किक सवाल दागा है। उन्होंने दस्तावेजी साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि जिस शासकीय भूमि खसरा नंबर 1661 को जनपद पदाधिकारी ‘करोड़ों’ का बताकर कलेक्टरेट में छाती पीट रहे थे, ठीक उसी से लगी हुई 0.39 हेक्टेयर (लगभग 60 डिसमिल) की विशाल शासकीय भूमि खसरा नंबर 1659 और 1660 पर स्वयं उसी जनपद उपाध्यक्ष/सदस्य ने अवैध रूप से कब्जा जमा रखा है।
अगर 0.06 रकबा वाली छोटी सी शासकीय भूमि 1661 करोड़ों रुपये की मूल्यवान है, तो उसी के बगल में जनपद पदाधिकारियों द्वारा कब्जाई गई साढ़े छह गुना बड़ी जमीन की कीमत आज साढ़े छह करोड़ रुपये से अधिक है। रसूखदारों के इस साढ़े छह करोड़ के अवैध साम्राज्य पर प्रशासन का बुलडोज़र क्यों खामोश है? यह दोहरा मापदंड क्यों?
इतना ही नहीं, पूर्व सरपंच ने वर्तमान सरपंच गुट पर शासकीय भूमि खसरा नंबर 556, 281 और 331 पर भी अवैध कब्जा जमाने और एक सरकारी जमीन को कथित तौर पर अवैध रूप से बेचने (सौदा करने) का अत्यंत गंभीर आरोप मढ़ा है।
पूर्व सरपंच और ग्रामीणों ने जिलाधीश के समक्ष तीन कड़े और स्पष्ट प्रस्ताव रखे हैं:
- केवल एक खसरे को टारगेट करने के बजाय, खसरा नंबर 1659, 1660, 1661, 269 सहित क्षेत्र की सभी विवादित शासकीय भूमियों के पुराने राजस्व रिकॉर्ड मंगाकर पारदर्शी ढंग से दोबारा नापजोख कराई जाए।
- राजनीतिक संरक्षण के कवच को तोड़ते हुए, खसरा नंबर 1660 और 1661 सहित सभी शासकीय भूमियों से हर एक रसूखदार कब्जाधारी को तत्काल न्यायिक प्रक्रिया के तहत बेदखल किया जाए।
- पद और शासकीय मशीनरी का दुरुपयोग करने, झूठी कार्रवाई से शांति भंग करने और भू-माफिया गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने पर वर्तमान सरपंच प्रीति ढीमर तथा उपसरपंच कुणाल चंद्राकर को छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम के तहत तुरंत प्रभाव से पद से बर्खास्त किया जाए।
इस पूरे मामले में जब पत्रकारों ने जमीनी हकीकत जानने और निष्पक्षता के साथ वर्तमान सरपंच प्रीति त्रिभुवन ढीमर का पक्ष लेने का प्रयास किया, तो उन्हें केवल टालमटोल और घोर उपेक्षा ही हाथ लगी। सरपंच महोदया ने न तो मीडिया से आमने-सामने मुलाकात करना मुनासिब समझा और न ही बार-बार किए गए फोन कॉल्स का कोई जवाब दिया। जिम्मेदार पद पर बैठी सरपंच की यह रहस्यमयी चुप्पी और मीडिया के तीखे सवालों से लगातार दूरी बनाना क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से इस तरह का पलायन सीधे तौर पर यह अंदेशा पैदा करता है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ा घपला या प्रशासनिक गड़बड़ी जरूर है, जिसे छिपाने के लिए या फिर पत्रकारों के चुभते सवालों के सटीक जवाब न होने के डर से वे लगातार बच रही हैं।
इस धमाकेदार खुलासे और कलेक्टरेट में हुए इस तीखे प्रदर्शन ने महासमुंद के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इन तथाकथित ‘साढ़े छह करोड़’ के रसूखदार कब्जों पर निष्पक्ष दंडात्मक हंटर चलाएगा, या राजनीतिक रसूख के आगे न्याय की यह आवाज फाइलों में दबा दी जाएगी?



