छत्तीसगढ़ नक्सल नेटवर्क मामला: बिलासपुर विशेष एनआईए अदालत ने चार आरोपियों को दी सशर्त जमानत
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित विशेष एनआईए अदालत ने प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी से संबंध रखने और शहरी नेटवर्क का संचालन करने के आरोपी चार व्यक्तियों की जमानत याचिका स्वीकार कर ली है। विशेष न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी की अदालत ने आरोपियों के लंबे समय से हिरासत में होने और ट्रायल प्रक्रिया के जल्द समाप्त न होने की संभावना को देखते हुए सशर्त रिहाई का आदेश जारी किया है। सभी आरोपियों को 20-20 हजार रुपये का मुचलका और इतनी ही राशि का जमानती प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

विशेष न्यायाधीश एनआईए एक्ट सिराजुद्दीन कुरैशी की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद गिरधर नाग, सुकारू राम कोरसा, संदेव पोड़यामी और शंकर कोरसा को सशर्त रिहा करने का आदेश दिया।
रायपुर के डीडी नगर थाने में दर्ज है पूरा मामला
यह पूरा कानूनी विवाद राजधानी रायपुर के डीडी नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक आपराधिक मामले से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने इन चारों आरोपियों के खिलाफ सुरक्षा और संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने की साजिश के तहत विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था। आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 147, 148, 61 के साथ-साथ अत्यंत कड़े कानून गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम यानी यूएपीए की धारा 17, 18, 19, 20, 38, 39 और 40 के तहत अपराध दर्ज किए गए थे।
पुलिस का मुख्य आरोप था कि ये सभी आरोपी प्रतिबंधित भाकपा माओवादी संगठन के लिए छत्तीसगढ़ के शहरी क्षेत्रों में एक सक्रिय नेटवर्क तैयार कर रहे थे। इसके अलावा इनके ऊपर माओवादियों के लिए खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान करने, रसद और अन्य तकनीकी संसाधन जुटाने तथा देश विरोधी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने का आरोप लगाया गया था।
बचाव पक्ष के तर्क और आपत्तिजनक सामग्री की अनुपस्थिति
विशेष अदालत में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने पुलिस के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दलील दी कि गिरफ्तार किए गए सभी आरोपी कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं और उनका कोई भी पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वे सभी समाज में स्थायी रूप से स्थापित व्यक्ति हैं और उनके भागने या साक्ष्यों को प्रभावित करने की कोई संभावना नहीं है।
अदालत ने मामले के दस्तावेजों और जब्ती पत्रों का गहन अवलोकन करने के बाद पाया कि पुलिस के पास आरोपियों के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस सबूत नहीं थे। जब्ती की कार्रवाई के दौरान आरोपी गिरधर नाग के पास से केवल एक साधारण मोबाइल फोन बरामद किया गया था, जबकि अन्य तीनों आरोपियों के पास से पुलिस को कोई भी संदिग्ध, आपत्तिजनक या प्रतिबंधित सामग्री नहीं मिली थी।
ट्रायल में देरी और सह-आरोपी की जमानत बनी मुख्य आधार
विशेष एनआईए अदालत ने जमानत आदेश जारी करते हुए देश के न्यायिक सिद्धांतों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लेख किया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा कि इस मामले में एक अन्य सह-आरोपी धनसिंह गावड़े को पहले ही उच्च न्यायपीठों से जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के सिद्धांत के आधार पर ये आरोपी भी राहत के हकदार हैं।
न्यायालय ने इस बात को भी रेखांकित किया कि सभी चारों आरोपी पिछले लंबे समय से न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। मामले की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि इस मुकदमे का ट्रायल यानी न्यायिक विचारण जल्द समाप्त होने की कोई संभावना नहीं दिखती है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को बिना दोषसिद्धि के अनंत काल तक जेल में रखना उचित नहीं है।
अदालत ने इन सभी तर्कों को स्वीकार करते हुए आरोपियों को सशर्त जमानत दे दी। रिहाई की शर्तों के अनुसार, प्रत्येक आरोपी को 20 हजार रुपये का निजी बंधपत्र (पर्सनल बॉन्ड) और इतनी ही समान राशि का स्थानीय जमानती अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। अदालत ने आरोपियों को बिना अनुमति शहर न छोड़ने और जांच में सहयोग करने की हिदायत भी दी है।



