पिता की हत्या के बाद मां भी छोड़ गई, 10 साल का बच्चा नशे और झगड़े का आदी हुआ, राजनांदगांव की दर्दनाक कहानी
पिता की हत्या और मां के चले जाने के बाद 10 साल का बच्चा नशे और झगड़े का आदी हो गया। राजनांदगांव की यह घटना बाल सुरक्षा पर सवाल उठाती है।

15 August 2026 | Raipur: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से सामने आई एक 10 साल के बच्चे की कहानी झकझोर देने वाली है। पिता की हत्या के बाद मां भी उसे छोड़कर चली गई और परिवार का सहारा छिनने के बाद मासूम की जिंदगी नशे, अकेलेपन और झगड़ों के बीच उलझती चली गई।
नवदुनिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पिता की हत्या के बाद बच्चे के जीवन में ऐसा बदलाव आया कि महज 10 साल की उम्र में वह नशे का आदी हो गया। घर और परिवार से मिलने वाली सुरक्षा खत्म होने के बाद उसके व्यवहार में भी लगातार बदलाव आने लगा।
बच्चे की उम्र अभी खेलने, पढ़ने और स्कूल जाने की है, लेकिन हालात ने उसे ऐसी दुनिया में धकेल दिया जहां नशा और विवाद उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए। पिता की मौत के बाद मां का भी साथ छूटना उसके लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।
रिपोर्ट में सामने आई जानकारी के अनुसार, बच्चे के पिता की हत्या हो चुकी है और उसके बाद मां उसे अकेला छोड़कर चली गई। परिवार के इस टूटने का सीधा असर बच्चे की मानसिक स्थिति और व्यवहार पर पड़ा।
कम उम्र में माता-पिता का संरक्षण खत्म हो जाना किसी भी बच्चे के लिए बेहद मुश्किल स्थिति होती है। ऐसे समय में बच्चे को परिवार के साथ-साथ समाज, प्रशासन और बाल संरक्षण व्यवस्था से तत्काल सहयोग की जरूरत होती है।
बच्चे के नशे की ओर बढ़ने की वजह केवल उसकी व्यक्तिगत आदत के तौर पर नहीं देखी जा सकती। उसके पीछे परिवार का टूटना, भावनात्मक सहारे का खत्म होना, असुरक्षित माहौल और आसपास के लोगों का प्रभाव जैसे कई कारण हो सकते हैं।
10 साल की उम्र में नशे की गिरफ्त में पहुंच जाना समाज के लिए भी गंभीर चेतावनी है। अगर किसी बच्चे को समय रहते सुरक्षित माहौल और सही काउंसलिंग नहीं मिलती, तो उसकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और भविष्य पर इसका लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक बच्चा नशे के साथ झगड़ालू व्यवहार का भी आदी होता गया। अकेलेपन और असुरक्षा की भावना कई बार बच्चों के व्यवहार में गुस्से और आक्रामकता के रूप में दिखाई देती है।
ऐसे मामलों में बच्चे को केवल अनुशासन या डांट के जरिए सुधारने की कोशिश करना पर्याप्त नहीं होता। उसे समझने, सुनने और भरोसे का माहौल देने की जरूरत होती है ताकि वह अपनी परेशानियां किसी सुरक्षित व्यक्ति के साथ साझा कर सके।
पिता की हत्या जैसी घटना का असर बच्चे के मन पर कितना गहरा पड़ा होगा, इसका अंदाजा उसकी कम उम्र से लगाया जा सकता है। जिस उम्र में बच्चा परिवार की सुरक्षा को समझना शुरू करता है, उसी उम्र में उसने अपने पिता को खो दिया और फिर मां का साथ भी छूट गया।
इस घटना ने बाल सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। किसी बच्चे के माता-पिता से अलग होने के बाद उसकी देखभाल कौन कर रहा है, वह किस माहौल में रह रहा है और उसकी पढ़ाई तथा स्वास्थ्य की स्थिति कैसी है, इन सवालों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
बाल संरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे ही बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना है। जरूरत पड़ने पर बच्चे को काउंसलिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और सुरक्षित देखभाल उपलब्ध कराई जा सकती है।
नशे की आदत बच्चों में कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकती है। इससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने के साथ स्कूल से दूरी, गलत संगत, हिंसक व्यवहार और अपराध की ओर बढ़ने का खतरा भी बढ़ सकता है।
राजनांदगांव से सामने आया यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें बच्चा खुद किसी अपराध की वजह नहीं, बल्कि परिस्थितियों का शिकार नजर आता है। उसके जीवन में हुई घटनाओं ने उसे उस उम्र में ऐसे रास्ते पर पहुंचा दिया, जहां से वापस लाने के लिए लगातार सहयोग की जरूरत होगी।
ऐसे बच्चों के लिए परिवार की भूमिका सबसे अहम होती है। अगर परिवार उपलब्ध नहीं है तो रिश्तेदार, पड़ोसी, स्कूल, स्थानीय प्रशासन और बाल संरक्षण से जुड़े संगठन मिलकर बच्चे के लिए सुरक्षित नेटवर्क तैयार कर सकते हैं।
स्कूल भी ऐसे मामलों में अहम भूमिका निभा सकता है। बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव, लगातार अनुपस्थिति, पढ़ाई में गिरावट, गुस्सा या दूसरे बच्चों से दूरी जैसे संकेतों को शिक्षक गंभीरता से लें तो समस्या की पहचान शुरुआती स्तर पर हो सकती है।
नशे की समस्या सामने आने के बाद बच्चे को अपराधी की तरह देखने के बजाय पीड़ित और जरूरतमंद बच्चे के रूप में देखना ज्यादा जरूरी है। उसकी मदद के लिए काउंसलिंग और पुनर्वास की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बच्चे के लिए शिक्षा दोबारा शुरू कराना भी बड़ी चुनौती हो सकती है। यदि वह लंबे समय से पढ़ाई से दूर है तो उसे सीधे सामान्य कक्षा में भेजने के बजाय उसकी स्थिति के अनुसार शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक सहयोग देना अधिक उपयोगी रहेगा।
इस तरह की घटनाएं यह भी दिखाती हैं कि बच्चों के आसपास के सामाजिक माहौल पर निगरानी कितनी जरूरी है। माता-पिता के न रहने की स्थिति में बच्चे को अकेला छोड़ देना उसके लिए कई तरह के जोखिम पैदा कर सकता है।
नशे की शुरुआत अक्सर कम उम्र में जिज्ञासा, साथियों के दबाव या आसपास के माहौल से होती है। लेकिन जब इसके साथ परिवार का भावनात्मक सहारा भी खत्म हो जाए तो बच्चे के लिए उस आदत से बाहर निकलना और कठिन हो सकता है।
बच्चे की कहानी केवल राजनांदगांव की एक घटना नहीं है, बल्कि उन बच्चों की स्थिति पर भी सवाल उठाती है जो परिवार टूटने के बाद बिना पर्याप्त निगरानी और संरक्षण के रह जाते हैं। ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें समय पर सहायता उपलब्ध कराना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी बनती है।
स्थानीय स्तर पर भी लोगों को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। अगर किसी बच्चे के व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई देता है या वह नशे की गिरफ्त में नजर आता है तो उसे अपमानित करने के बजाय जिम्मेदार लोगों और संबंधित बाल संरक्षण व्यवस्था तक जानकारी पहुंचाना ज्यादा जरूरी है।
बच्चे के भविष्य को बचाने के लिए केवल नशे की आदत छुड़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उसके साथ हुई पारिवारिक त्रासदी को समझना, उसे भावनात्मक सुरक्षा देना, पढ़ाई से जोड़ना और समाज में दोबारा भरोसा पैदा करना भी उतना ही जरूरी होगा।
पिता की हत्या और मां के चले जाने के बाद इस 10 साल के बच्चे ने जिस तरह अकेलेपन और नशे का सामना किया, वह बताता है कि बचपन कितना संवेदनशील होता है। समय रहते मदद मिले तो ऐसे बच्चे को दोबारा सामान्य जीवन की ओर लाया जा सकता है।
इस मामले में प्रशासन और बाल संरक्षण से जुड़े विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। बच्चे की वर्तमान स्थिति, उसकी देखभाल कौन कर रहा है, उसकी शिक्षा कहां तक पहुंची है और नशे की आदत से बाहर निकालने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, इन पहलुओं पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
समाज के लिए इस घटना का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी बच्चे का व्यवहार देखकर उसे केवल बदतमीज या बिगड़ा हुआ मान लेना सही नहीं है। कई बार गुस्से, नशे या झगड़े के पीछे ऐसी कहानी छिपी होती है जिसे बच्चा खुद शब्दों में बता पाने की स्थिति में नहीं होता।
राजनांदगांव के इस 10 साल के बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत डांट की नहीं, बल्कि भरोसे, सुरक्षा और सही दिशा की है। अगर परिवार का सहारा नहीं है तो समाज और सिस्टम को आगे आकर उसकी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।


