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धमतरी में प्रार्थना सभा पर विवाद, शांति समिति में कई फैसले

धमतरी में प्रार्थना सभा और मतांतरण को लेकर शांति समिति की बैठक में कई फैसले हुए। बपतिस्मा, बाइबल कोर्स और सहायता गतिविधियों पर भी चर्चा हुई।





Raipur, 17 सितंबर 2026 – धमतरी में प्रार्थना सभाओं और कथित मतांतरण को लेकर चल रहा विवाद अब जिला प्रशासन की शांति समिति की बैठक तक पहुंच गया है। 16 सितंबर की शाम जिला कलेक्ट्रेट के सभाकक्ष में हुई बैठक में हिंदू संगठनों और ईसाई समाज के प्रतिनिधियों के बीच धार्मिक गतिविधियों, प्रार्थना सभाओं में भागीदारी, बाइबल कोर्स, बपतिस्मा तथा इलाज और सहायता के नाम पर परिवारों के घर जाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक की अध्यक्षता अपर कलेक्टर इंदिरा सिंह देहारी ने की। अपर पुलिस अधीक्षक डीसी पटेल, एसडीएम पीयूष तिवारी और अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे। रिपोर्ट के अनुसार, बैठक में यह निर्णय रखा गया कि धमतरी शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित ईसाई प्रार्थना सभाओं में हिंदू शामिल नहीं होंगे। यदि कोई हिंदू ऐसी सभा में शामिल पाया जाता है, तो उसे मतांतरण की आशंका से जोड़कर प्रशासन से शिकायत करने की बात कही गई।

बैठक में रखे गए इस निर्णय ने धार्मिक स्वतंत्रता, सामुदायिक संबंधों और धर्म स्वातंत्र्य कानून के दायरे को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। किसी व्यक्ति का धार्मिक सभा में जाना, किसी धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन करना या किसी से सहायता प्राप्त करना अपने आप में धर्म परिवर्तन का कानूनी प्रमाण नहीं होता। दूसरी ओर, यदि किसी गतिविधि में दबाव, भय, धोखे या प्रतिबंधित प्रलोभन के माध्यम से धर्म परिवर्तन कराने का आरोप सामने आता है, तो उसकी जांच संबंधित कानून के तहत की जा सकती है। धमतरी की बैठक में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी चिंताएं रखीं, लेकिन बैठक में कही गई बातों और किसी मामले में अंतिम कानूनी कार्रवाई के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

बैठक में हिंदू संगठनों की ओर से कहा गया कि शहर और गांवों में होने वाली ईसाई प्रार्थना सभाओं में हिंदू व्यक्तियों की भागीदारी पर रोक होनी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में उपस्थित प्रतिनिधियों के बीच सहमति बनने की बात कही गई। हिंदू संगठन का तर्क था कि प्रार्थना सभाओं के माध्यम से मतांतरण की गतिविधियां संचालित होने की आशंका है। वहीं, ईसाई समाज के प्रतिनिधियों ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वे कहीं भी चंगाई सभा आयोजित नहीं करते और किसी का मतांतरण नहीं कराते। उनके अनुसार, समाज के लोग एक स्थान पर मिलकर प्रार्थना करते हैं।

यह विवाद केवल धार्मिक सभा तक सीमित नहीं है। बैठक में इलाज और सहायता के नाम पर हिंदू परिवारों के घर जाने का मुद्दा भी उठाया गया। हिंदू संगठनों की ओर से कहा गया कि यदि ईसाई समाज के लोग किसी हिंदू परिवार के घर इलाज या सहायता के नाम पर जाते हैं, तो इसकी जानकारी प्रशासन को दी जानी चाहिए और मामले को मतांतरण की आशंका के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन या अन्य मदद पहुंचाने वाली गतिविधियां अक्सर सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों के माध्यम से चलती हैं। ऐसे में जांच का आधार स्पष्ट होना जरूरी है। सहायता देना और धर्म परिवर्तन कराना अलग-अलग गतिविधियां हो सकती हैं, जबकि किसी मामले में दोनों के बीच संबंध होने का आरोप साक्ष्यों के आधार पर ही परखा जा सकता है।

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बैठक में हिंदू जागरण मंच के प्रांत युवा प्रमुख दीपक सिंह ठाकुर ने कहा कि यदि कोई हिंदू व्यक्ति ईसाई धर्म स्वीकार करना चाहता है, तो उसे शपथ पत्र के साथ शासन-प्रशासन को जानकारी देनी चाहिए और कानूनी प्रक्रिया के तहत बपतिस्मा कराना चाहिए। उन्होंने यह मांग भी रखी कि मतांतरण की जानकारी शासन तक पहुंचने के बाद ऐसे लोगों को हिंदू होने के नाम पर मिलने वाले सरकारी लाभों की समीक्षा की जानी चाहिए। इस मांग का संबंध धार्मिक पहचान के साथ सरकारी योजनाओं, प्रमाण-पत्रों और सामाजिक श्रेणियों से जुड़े नियमों से भी है। किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान बदलने के बाद उसके सरकारी लाभों पर क्या असर पड़ेगा, यह लाभ की प्रकृति, लागू कानून और संबंधित दस्तावेजों पर निर्भर करता है। शांति समिति में व्यक्त की गई मांग अपने आप में सरकारी लाभ समाप्त करने का आदेश नहीं होती।

बपतिस्मा को लेकर ईसाई समाज के प्रतिनिधियों ने भी अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से ईसाई समाज में शामिल होना चाहता है, तो उसे पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। यह बयान स्वैच्छिक धार्मिक आस्था और कथित दबाव या प्रलोभन से कराए जाने वाले मतांतरण के बीच अंतर की चर्चा को सामने लाता है। किसी व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से किया या उस पर किसी प्रकार का दबाव डाला गया, यह किसी भी जांच में महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है। शिकायत की स्थिति में व्यक्ति का बयान, गतिविधियों का स्वरूप, कथित प्रलोभन या दबाव के साक्ष्य और लागू कानून की धाराएं देखी जाएंगी।

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बैठक में शहर में संचालित बाइबल कोर्स का मुद्दा भी उठाया गया। दीपक सिंह ठाकुर ने कहा कि धमतरी शहर में दो स्थानों पर बाइबल के कोर्स संचालित होने की जानकारी है। उन्होंने मांग की कि इन कोर्स में शामिल होने वाले हिंदू बच्चों की जानकारी शासन-प्रशासन को दी जाए और हिंदू बच्चों को ऐसे कोर्स नहीं कराए जाएं। उनका कहना था कि बच्चे आगे गांवों में जाकर दूसरों को बाइबल की जानकारी दे सकते हैं। इस मांग के साथ बच्चों की धार्मिक शिक्षा, अभिभावकों की सहमति और संस्थानों की गतिविधियों की निगरानी से जुड़े प्रश्न भी सामने आए हैं।

धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन करना, किसी प्रार्थना सभा में भाग लेना और धर्म परिवर्तन करना अलग-अलग स्थितियां हो सकती हैं। यदि किसी संस्था पर नाबालिगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रभावित करने, दबाव डालने या कानून का उल्लंघन करने का आरोप है, तो प्रशासन को उसकी जांच करनी चाहिए। लेकिन केवल किसी धार्मिक ग्रंथ के अध्ययन को धर्म परिवर्तन का प्रमाण मानने से पहले गतिविधि का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट करना जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्ट में बाइबल कोर्स संचालित करने वाली संस्थाओं के नाम, पाठ्यक्रम की विस्तृत जानकारी या प्रशासन की ओर से किसी विशिष्ट जांच का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस स्तर पर बैठक में रखी गई मांगों को ही तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

धमतरी में प्रार्थना सभा को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि पिछले कुछ समय से सामने आ रहे मतांतरण संबंधी मामलों से भी जुड़ी है। सितंबर 2026 में धमतरी के टिकरापारा क्षेत्र में एक प्रार्थना सभा में करीब 40 लोगों के शामिल होने को लेकर विवाद हुआ था। इस मामले में पुलिस जांच कर रही है। इससे पहले जिले के कुछ गांवों में मतांतरित परिवारों के अंतिम संस्कार को लेकर भी तनाव की स्थिति बनी थी। ऐसे मामलों में धार्मिक पहचान, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और अंतिम संस्कार की पद्धति को लेकर विवाद सामने आया। इन घटनाओं ने स्थानीय स्तर पर मतांतरण के मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है।

छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य कानून 2026 लागू होने के बाद धार्मिक गतिविधियों और मतांतरण को लेकर प्रशासनिक प्रक्रिया पर चर्चा तेज हुई है। धमतरी में प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए आवेदन दिए जाने की खबर भी सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, जिले के नगरी, धमतरी और कुरुद क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आवेदन प्राप्त हुए हैं। इन आवेदनों में लोगों ने प्रार्थना सभा में शामिल होने की अनुमति मांगी है और यह दावा किया है कि उनकी उपस्थिति स्वैच्छिक है। आवेदन में बल, भय, धमकी, दबाव, अनुचित प्रभाव, धन, नौकरी, शिक्षा, चिकित्सा या अन्य प्रलोभन के आधार पर सभा में शामिल होने अथवा धर्म स्वीकार करने से इनकार किया गया है। अपर कलेक्टर इंदिरा सिंह देहारी के अनुसार, आवेदन फिलहाल एकत्र किए जा रहे हैं और अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

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धर्म स्वातंत्र्य कानून का उद्देश्य और उसका वास्तविक अनुप्रयोग इसी अंतर पर निर्भर करता है कि स्वैच्छिक धार्मिक आस्था और प्रतिबंधित तरीके से कराए गए मतांतरण को किस तरह परिभाषित किया जाता है। बैठक में छह माह से तीन वर्ष तक की सजा का उल्लेख किया गया, लेकिन किसी मामले में सजा तभी लागू होगी जब संबंधित कानून की शर्तें पूरी हों और आरोप जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया में प्रमाणित हों। किसी धार्मिक सभा में उपस्थित होने, किसी संस्था से सहायता लेने या धार्मिक साहित्य पढ़ने को सीधे अपराध मानने से पहले कानून की सटीक धाराओं और मामले की परिस्थितियों को देखना आवश्यक है।

ईसाई समाज के प्रतिनिधियों ने बैठक में कहा कि वे किसी का मतांतरण नहीं कराते और केवल सामूहिक प्रार्थना करते हैं। हिंदू संगठनों ने प्रार्थना सभाओं, सहायता गतिविधियों और धार्मिक शिक्षा को लेकर आशंका जताई है। प्रशासन के सामने चुनौती यही है कि शिकायतों की जांच तथ्यात्मक आधार पर हो, किसी समुदाय के खिलाफ बिना प्रमाण निष्कर्ष न निकाला जाए और कानून का पालन भी सुनिश्चित किया जाए। धार्मिक गतिविधियों को लेकर विवाद बढ़ने पर स्थानीय स्तर पर संवाद और स्पष्ट प्रशासनिक निर्देश की जरूरत बढ़ जाती है।

धमतरी की शांति समिति की बैठक के बाद अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि बैठक में लिए गए निर्णयों को किस रूप में लागू किया जाएगा। क्या इन निर्णयों का लिखित आदेश जारी होगा, शिकायतों की जांच के लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी और धार्मिक गतिविधियों में शामिल लोगों के अधिकारों तथा कानून के पालन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा, यह आगे की प्रशासनिक कार्रवाई से सामने आएगा। फिलहाल बैठक ने मतांतरण को लेकर चल रहे विवाद को एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है। स्थानीय प्रशासन के लिए आगे की प्रक्रिया में कानून, साक्ष्य और सामाजिक शांति तीनों को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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