SIMS की बदहाली पर हाईकोर्ट सख्त: हलफनामों के दावों की होगी जमीनी जांच, कोर्ट कमिश्नर को भौतिक सत्यापन के आदेश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर स्थित सिम्स अस्पताल की अव्यवस्थाओं को लेकर स्वतः संज्ञान जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के दावों की स्वतंत्र जमीनी जांच कराने का महत्वपूर्ण फैसला लिया है। स्वास्थ्य सचिव और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक द्वारा दायर व्यक्तिगत हलफनामों के बाद अदालत ने कोर्ट कमिश्नर को अस्पताल का भौतिक सत्यापन कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होगी।

रायपुर | 8 जुलाई 2026 : बिलासपुर स्थित शासकीय छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में सामने आई स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर अव्यवस्थाओं को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि केवल सरकारी हलफनामों के आधार पर संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। अदालत ने अधिकारियों द्वारा किए गए दावों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराने का आदेश दिया है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं और सुधारों के संबंध में प्रस्तुत दावों की वास्तविकता का पता लगाने के लिए स्वतंत्र जांच आवश्यक है। इसी उद्देश्य से कोर्ट कमिश्नर को अस्पताल का निरीक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।
मीडिया रिपोर्ट के बाद स्वतः संज्ञान में आया मामला
यह पूरा मामला उस समय चर्चा में आया जब मीडिया रिपोर्टों में सिम्स अस्पताल की गंभीर अव्यवस्थाएं सामने आईं।
रिपोर्टों में बताया गया था कि अस्पताल में स्ट्रेचर पर एयर कंडीशनर ले जाया जा रहा था, जबकि इलाज के लिए पहुंची गर्भवती महिला को पैदल चलने के लिए मजबूर होना पड़ा। इन घटनाओं ने अस्पताल की कार्यप्रणाली, संसाधनों के उपयोग और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की।
सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने दायर किए व्यक्तिगत हलफनामे
पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य शासन के स्वास्थ्य सचिव तथा छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (सीजीएमएससी) के प्रबंध निदेशक को व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान दोनों अधिकारियों ने अपने-अपने व्यक्तिगत हलफनामे अदालत में प्रस्तुत किए।
इन हलफनामों में अस्पताल में उपलब्ध संसाधनों, व्यवस्थाओं, सुधारात्मक कदमों तथा पूर्व में दिए गए न्यायालय के निर्देशों के पालन का उल्लेख किया गया।
कोर्ट ने केवल दस्तावेजों पर भरोसा नहीं किया
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए संकेत दिया कि केवल कागजी दावों के आधार पर वास्तविक स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।
इसी कारण अदालत ने कोर्ट कमिश्नर को अस्पताल का प्रत्यक्ष निरीक्षण करने और प्रस्तुत हलफनामों में किए गए दावों का भौतिक सत्यापन करने का निर्देश दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालय द्वारा स्वतंत्र भौतिक सत्यापन का आदेश देना यह दर्शाता है कि अदालत मामले में तथ्यात्मक स्थिति को स्वयं सुनिश्चित करना चाहती है।
कोर्ट कमिश्नर को सौंपी गई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
सुनवाई के दौरान कोर्ट कमिश्नर अपूर्व त्रिपाठी भी उपस्थित रहे।
हाईकोर्ट ने उन्हें निर्देश दिया कि वे सिम्स अस्पताल का निरीक्षण करें और अस्पताल की वर्तमान व्यवस्थाओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करते हुए विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।
रिपोर्ट में यह भी देखा जाएगा कि हलफनामों में जिन सुविधाओं और सुधारों का उल्लेख किया गया है, वे वास्तव में अस्पताल में उपलब्ध हैं या नहीं।
सुनवाई में कई पक्ष रहे मौजूद
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर उपस्थित रहे।
वहीं छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन की ओर से अधिवक्ता त्रिविक्रम नायक ने पक्ष रखा।
अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद स्वतंत्र सत्यापन की आवश्यकता महसूस करते हुए आगे की प्रक्रिया निर्धारित की।
21 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट कमिश्नर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर आगे की सुनवाई की जाएगी।
मामले को 21 जुलाई 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
संभावना है कि अगली सुनवाई में न्यायालय निरीक्षण रिपोर्ट, सरकारी हलफनामों तथा वास्तविक स्थिति की तुलना कर आगे के निर्देश जारी कर सकता है।
सिम्स राज्य के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल
बिलासपुर स्थित सिम्स छत्तीसगढ़ के प्रमुख शासकीय चिकित्सा शिक्षण संस्थानों और रेफरल अस्पतालों में से एक है।
यहां बिलासपुर संभाग सहित कई जिलों के मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।
संस्थान में चिकित्सा शिक्षा के साथ-साथ गंभीर रोगों का उपचार, आपातकालीन सेवाएं, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं तथा विभिन्न विशेषज्ञ विभाग संचालित होते हैं।
इसी कारण अस्पताल में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था का प्रभाव बड़ी संख्या में मरीजों पर पड़ता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर बढ़ी चिंता
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी अस्पताल में मरीजों को बुनियादी सुविधाएं समय पर उपलब्ध होना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
स्ट्रेचर, व्हीलचेयर, आपातकालीन परिवहन, स्वच्छता, दवा उपलब्धता, उपकरणों का रखरखाव तथा मानव संसाधन जैसी व्यवस्थाएं अस्पताल संचालन की मूल आवश्यकताएं हैं।
यदि इन व्यवस्थाओं में कमी आती है तो उसका सीधा असर मरीजों की सुरक्षा और उपचार की गुणवत्ता पर पड़ता है।
न्यायिक निगरानी से बढ़ सकती है जवाबदेही
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े मामलों में न्यायालय की निगरानी प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने का माध्यम बन सकती है।
जब अदालत स्वतंत्र निरीक्षण और भौतिक सत्यापन का आदेश देती है तो संबंधित विभागों को केवल कागजी कार्रवाई के बजाय वास्तविक सुधार सुनिश्चित करने की आवश्यकता होती है।
ऐसी प्रक्रिया से अस्पतालों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व दोनों बढ़ते हैं।
सीजीएमएससी की भूमिका भी महत्वपूर्ण
छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन राज्य के सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं, चिकित्सा उपकरणों तथा अन्य आवश्यक संसाधनों की खरीद और आपूर्ति से जुड़ी प्रमुख संस्था है।
अस्पतालों में आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इसी कारण अदालत ने इस मामले में सीजीएमएससी के प्रबंध निदेशक से भी व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करने को कहा था।
रिपोर्ट के बाद तय होगी आगे की दिशा
अब पूरे मामले की दिशा कोर्ट कमिश्नर की निरीक्षण रिपोर्ट पर निर्भर करेगी।
यदि रिपोर्ट में सरकारी हलफनामों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर पाया जाता है तो हाईकोर्ट आगे और कड़े निर्देश जारी कर सकता है।
वहीं यदि रिपोर्ट में सुधारात्मक कदमों की पुष्टि होती है तो अदालत भविष्य में अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर निगरानी संबंधी अन्य निर्देश भी दे सकती है।
फिलहाल यह मामला केवल सिम्स अस्पताल तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जवाबदेही, संसाधनों के प्रभावी उपयोग और मरीजों के अधिकारों से जुड़े व्यापक प्रश्नों को भी सामने ला रहा है।


