छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का न्याय: रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े मंडी सब-इंस्पेक्टर को बड़ी राहत, मनमाने ट्रांसफर पर लगाई रोक
सेवा समाप्ति के बेहद करीब पहुंच चुके कृषि उपज मंडी समिति खैरागढ़ के एक वरिष्ठ सब-इंस्पेक्टर को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से उनके तबादले को लेकर एक बड़ी और सकारात्मक राहत मिली है। अदालत ने दूसरे जिले में किए गए तबादले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य कृषि विपणन बोर्ड को यह सख्त निर्देश दिया है कि कर्मचारी के पदोन्नति छोड़ने के आवेदन पर विचार कर 10 दिनों के भीतर नई पदस्थापना पर नियमानुसार फैसला लिया जाए।

ऐसे ही एक संवेदनशील मामले में बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत का यह निर्णय उन तमाम सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है, जो अपने रिटायरमेंट के करीब हैं और अकारण तबादलों का दंश झेल रहे हैं।
खैरागढ़ कृषि मंडी के सब-इंस्पेक्टर का है यह पूरा मामला
यह पूरा कानूनी विवाद नवगठित जिले खैरागढ़-छुईखदान-गंडई के अंतर्गत आने वाली कृषि उपज मंडी समिति खैरागढ़ से जुड़ा हुआ है। खैरागढ़ मंडी में पदस्थ सब-इंस्पेक्टर हरीश सिंह ठाकुर, जिनकी उम्र लगभग साठ वर्ष हो चुकी है, ने अपने ट्रांसफर के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय रामदयाल सिंह ठाकुर है। याचिकाकर्ता अपनी शासकीय सेवा के बिल्कुल अंतिम चरण में हैं और जल्द ही सेवानिवृत्त होने की कगार पर हैं।
कृषि विपणन बोर्ड का मई महीने का आदेश बना विवाद की असली जड़
इस पूरे विवाद की शुरुआत पिछले महीने के अंत में हुई थी। छत्तीसगढ़ राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के प्रबंध संचालक द्वारा बाईस मई दो हजार छब्बीस को एक आधिकारिक आदेश जारी किया गया था। इस विभागीय आदेश के माध्यम से याचिकाकर्ता हरीश सिंह ठाकुर को उनके वर्तमान पद सब-इंस्पेक्टर से पदोन्नत करते हुए इंस्पेक्टर मंडी का नया पदभार सौंपा गया था। पदोन्नति तक सब कुछ ठीक था, लेकिन समस्या तब उत्पन्न हुई जब इसी आदेश के तहत उनका स्थानांतरण खैरागढ़ से सीधे कृषि उपज मंडी समिति, दुर्ग कर दिया गया।
याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया था पदोन्नति छोड़ने का आधिकारिक आवेदन
सरकारी सेवा और प्रशासनिक नियमों के तहत जब किसी कर्मचारी को पदोन्नति के साथ किसी दूसरी जगह भेजा जाता है, तो उसे यह कानूनी अधिकार होता है कि वह चाहे तो उस पदोन्नति को अस्वीकार कर दे। इसी नियम का पालन करते हुए याचिकाकर्ता ने मंडी बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों को एक औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया था। इस आवेदन में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया था कि वह अपनी वर्तमान जगह पर ही काम करना चाहते हैं और इसके लिए वे अपनी पदोन्नति यानी प्रमोशन छोड़ने को भी पूरी तरह से तैयार हैं।
विभाग की अनदेखी के बाद लेनी पड़ी हाई कोर्ट की शरण
कानूनी और प्रशासनिक जानकारों के अनुसार, जब कोई कर्मचारी प्रमोशन फोरगो (पदोन्नति का परित्याग) करता है, तो विभाग को उस आवेदन पर विचार करके कर्मचारी को उसी स्थान पर वापस पदस्थ करने का प्रावधान होता है। लेकिन कृषि विपणन बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों ने उनके इस बेहद जायज आवेदन पर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही कोई समयबद्ध फैसला लिया। विभाग के इसी अड़ियल रवैये के कारण साठ वर्षीय कर्मचारी को भारी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा। अंततः न्याय पाने की उम्मीद में उन्होंने बिलासपुर हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल की।
वरिष्ठ अधिवक्ता के माध्यम से अदालत में रखा गया मजबूती से पक्ष
याचिकाकर्ता हरीश सिंह ठाकुर की ओर से हाई कोर्ट में पैरवी उनके अधिवक्ता पूर्णेंद्र खिचड़िया ने की। अधिवक्ता पूर्णेंद्र खिचड़िया ने अदालत के समक्ष इस मामले के सभी तकनीकी, कानूनी और मानवीय पहलुओं को बेहद बारीकी से रखा। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि याचिकाकर्ता की उम्र लगभग साठ वर्ष है और वह सेवा समाप्ति के बेहद करीब है। ऐसे समय में उनका तबादला एक जिले से दूसरे जिले में करना न केवल उनके लिए कष्टदायक है, बल्कि राज्य सरकार की सामान्य स्थानांतरण नीति की मूल भावना के भी एकदम खिलाफ है।
न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने की मामले की त्वरित सुनवाई
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ में हुई। न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की अदालत ने मामले की गंभीरता और याचिकाकर्ता की बढ़ती उम्र को ध्यान में रखते हुए इस पर त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना। अदालत ने यह तथ्य पाया कि याचिकाकर्ता ने पहले ही विभाग को पदोन्नति छोड़ने का लिखित विकल्प दे दिया है, जिस पर विभाग को बहुत पहले ही नियमानुसार फैसला ले लेना चाहिए था।
दस दिनों के भीतर निर्णय लेने का जारी किया गया सख्त आदेश
सभी तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों की बारीकी से समीक्षा करने के बाद, न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने छत्तीसगढ़ राज्य कृषि विपणन बोर्ड के प्रबंध संचालक को एक स्पष्ट और सख्त निर्देश जारी किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित विभाग याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए पदोन्नति छोड़ने के आवेदन पर पूरी गंभीरता के साथ विचार करे। इसके साथ ही, अदालत ने नई पदस्थापना के संबंध में दस दिनों के भीतर नियमानुसार एक उचित और न्यायसंगत निर्णय लेने का आदेश भी पारित कर दिया है।
राज्य सरकार की स्थानांतरण नीति और बुजुर्ग कर्मचारियों के अधिकार
इस मामले ने एक बार फिर से राज्य सरकार की स्थानांतरण नीति पर एक नई बहस छेड़ दी है। आमतौर पर सरकारी नीतियों में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित होता है कि जिन कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति में एक या दो वर्ष का समय ही शेष रह गया हो, उन्हें उनके वर्तमान पदस्थापना स्थल से किसी भी हाल में नहीं हटाया जाना चाहिए। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए किया जाता है ताकि कोई भी कर्मचारी रिटायरमेंट से ठीक पहले अपने पेंशन, पीएफ और ग्रेच्युटी से जुड़े दस्तावेजों को आसानी से पूरा कर सके। खैरागढ़ से दुर्ग का तबादला इस नीतिगत भावना का सीधा उल्लंघन लग रहा था।
ट्रांसफर के मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक नकारात्मक प्रभाव
सेवा के अंतिम वर्षों में किसी भी कर्मचारी के लिए एक नई जगह पर जाकर खुद को स्थापित करना बेहद मुश्किल काम होता है। साठ वर्ष की उम्र में किसी नए शहर में नया आवास खोजना, नए अधिकारियों और सहयोगियों के साथ तालमेल बिठाना, और अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का प्रबंधन करना एक बहुत बड़ी चुनौती होती है। याचिकाकर्ता का पदोन्नति छोड़ने का फैसला यह साफ दर्शाता है कि मानसिक शांति और स्थिरता उनके लिए ऊंचे पद और आर्थिक लाभ से कहीं अधिक मायने रखती है।
पदोन्नति परित्याग (फोरगो) का कानूनी पहलू और नुकसान
सरकारी नौकरी के सेवा नियमों में प्रमोशन फोरगो का स्पष्ट रूप से जिक्र मिलता है। जब भी कोई कर्मचारी अपना प्रमोशन छोड़ता है, तो उसे इसका आर्थिक नुकसान उठाना ही पड़ता है, साथ ही भविष्य में होने वाले अन्य प्रमोशन से भी उसे एक निश्चित समय सीमा के लिए पूरी तरह वंचित कर दिया जाता है। याचिकाकर्ता हरीश सिंह ठाकुर इन सभी नुकसानों को सहने के लिए तैयार थे, बशर्ते उन्हें खैरागढ़ में ही अपनी सेवाएं देने दी जाएं। अदालत ने कर्मचारी के इसी अधिकार को पूर्ण मान्यता दी है और विभाग को इसे जल्द लागू करने का रास्ता दिखाया है।
न्याय प्रणाली पर आम जनता और कर्मचारियों का बढ़ता भरोसा
अक्सर यह देखा गया है कि सरकारी सिस्टम की लालफीताशाही के आगे आम कर्मचारी खुद को बेहद असहाय महसूस करता है। लेकिन जब माननीय न्यायालय इस तरह के मामलों में तत्परता से हस्तक्षेप करता है और आम आदमी या पीड़ित कर्मचारी को त्वरित न्याय दिलाता है, तो इससे देश की न्याय प्रणाली पर आम जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होता है। खैरागढ़ मंडी के साठ वर्षीय सब-इंस्पेक्टर को मिली यह राहत इसी मजबूत भरोसे का एक जीवंत और उत्कृष्ट उदाहरण है।



