Big BreakingChhattisgarhCrimeFeaturedLawLifestyle
Trending

कानून की आड़ में आपसी सहमति के संबंधों को दुष्कर्म बताना गलत, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार, पीड़िता की अपील खारिज

उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच का अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला, कहा कि यदि वयस्क महिला परिणामों को भली-भांति जानते हुए कृत्य में स्वेच्छा से शामिल होती है तो उसे कानूनी तौर पर आपसी सहमति माना जाएगा।







रायपुर, 30 जून 2026 : छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की बिलासपुर खंडपीठ ने महिलाओं से जुड़े गंभीर अपराधों और विशेष रूप से दुष्कर्म के मामलों में आपसी सहमति की परिभाषा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। माननीय उच्च न्यायालय ने सरगुजा जिले के एक चर्चित मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए निचली अदालत यानी ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बाइज्जत बरी किए जाने के फैसले को पूरी तरह से सही और विधि सम्मत ठहराया है।

अदालत ने मामले की समीक्षा के दौरान यह गंभीर और तीखी टिप्पणी की है कि यदि कोई पीड़िता पूर्ण रूप से बालिग है, समझदार है और अपने द्वारा किए जाने वाले किसी भी कृत्य के भविष्य में होने वाले परिणामों को अच्छी तरह से जानते-समझते हुए उसमें स्वेच्छा से शामिल होती है, तो वैधानिक रूप से उसे आपसी सहमति का ही मामला माना जाएगा।

अदालत ने साफ किया कि ऐसी परिस्थितियों में बाद में लगाए गए यौन शोषण के आरोपों को आपराधिक श्रेणी में रखकर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। इसी कानूनी आधार को रेखांकित करते हुए उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के विरुद्ध पीड़िता द्वारा दायर की गई अक्विटल अपील (दोषमुक्ति के खिलाफ अपील) को पूरी तरह से विचारहीन मानते हुए सिरे से खारिज कर दिया।

न्यायपालिका का यह ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला माननीय न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और माननीय न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की संयुक्त डिवीजन बेंच द्वारा खुली अदालत में सुनाया गया है।

जानिए क्या है पूरा मामला और पीड़िता के गंभीर आरोप मणिपुर चौकी क्षेत्र में वर्ष 2018 में दर्ज कराई गई थी एफआईआर

यह पूरा कानूनी विवाद सरगुजा जिले के जिला मुख्यालय अंबिकापुर के अंतर्गत आने वाले मणिपुर पुलिस चौकी क्षेत्र का है। मामले के इतिहास पर नजर डालें तो एक 40 वर्षीय विवाहित महिला ने स्थानीय पुलिस थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराते हुए आरोपी रामेश्वर दास के खिलाफ जबरन शारीरिक संबंध बनाने और प्रताड़ित करने का संगीन मामला दर्ज कराया था। पीड़िता ने अपने आवेदन में आरोप लगाया था कि 15 जून 2018 की रात को जब वह अपने घर के समीप बने शौचालय से वापस लौट रही थी, तभी वहां पहले से घात लगाकर बैठे आरोपी रामेश्वर दास ने उसे अचानक दबोच लिया।

महिला का आरोप था कि आरोपी ने उसे जान से मारने की नियत से डराया-धमकाया, उसके साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट की और उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन उसके साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। पुलिस ने महिला की इस शिकायत के आधार पर आरोपी रामेश्वर दास के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की संबंधित धाराओं के तहत अपराध पंजीकृत कर मामले को जांच में लिया था। विवेचना पूर्ण होने के बाद पुलिस ने साक्ष्य और चार्जशीट स्थानीय अदालत में पेश की थी।

फास्ट ट्रैक कोर्ट सरगुजा ने आरोपी को किया था बाइज्जत बरी निचली अदालत के फैसले के खिलाफ पीड़िता ने खटखटाया था हाई कोर्ट का दरवाजा

पुलिस द्वारा चालान पेश किए जाने के बाद इस संवेदनशील मामले की सघन सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट (त्वरित न्यायालय), सरगुजा में लंबे समय तक चली। अदालत ने अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष दोनों की दलीलों को बेहद बारीकी से सुना और पत्रावली पर मौजूद तमाम गवाहों के बयानों का गहनता से अवलोकन किया। मामले के सभी पहलुओं, गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास और वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट सरगुजा ने 28 जनवरी 2022 को अपना अंतिम फैसला सुनाया था।

निचली अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि अभियोजन पक्ष आरोपी रामेश्वर दास के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी रामेश्वर दास को सभी आपराधिक आरोपों से पूरी तरह से बाइज्जत बरी कर दिया था। इस फैसले से असंतुष्ट होकर और ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए पीड़िता ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में एक आपराधिक अपील दायर कर आरोपी को सजा देने की मांग की थी।

माननीय हाई कोर्ट ने साक्ष्यों में पाए आपसी सहमति के स्पष्ट संकेत बयानों के अंतर्विरोध और घटनाक्रम की परिस्थितियों पर कोर्ट का रुख

पीड़िता की इस अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने पीड़िता द्वारा ट्रायल कोर्ट और पुलिस के समक्ष दिए गए बयानों के साथ-साथ अन्य सभी भौतिक व मौखिक साक्ष्यों का नए सिरे से विस्तृत और वैज्ञानिक परीक्षण किया। खंडपीठ ने अपने फैसले में इस बात का विशेष उल्लेख किया कि कथित घटना के दौरान और उसके ठीक बाद भी दोनों पक्षों के बीच सामान्य बातचीत होने के प्रमाण मिले हैं।

अदालत ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के क्रोनोलॉजिकल अध्ययन से यह बात पूरी तरह से साफ और स्थापित होती है कि दोनों व्यक्तियों के बीच जो भी शारीरिक संबंध स्थापित हुए थे, वे किसी भी तरह के जबरन दबाव या भय का परिणाम नहीं थे, बल्कि वे पूरी तरह से आपसी सहमति और इच्छा से बनाए गए थे। कोर्ट ने कहा कि जब संबंध आपसी मर्जी से बने हों, तो बाद में आपसी अनबन होने पर उसे कानून की नजर में जबरन किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक कैनी राजन फैसले का दिया गया हवाला सहमति केवल मूक आत्मसमर्पण नहीं बल्कि सोच-समझकर लिया गया निर्णय है

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आपसी सहमति की कानूनी परिभाषा को और अधिक स्पष्ट करने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत यानी माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2013 में दिए गए एक बेहद ऐतिहासिक फैसले का विशेष रूप से संदर्भ लिया। हाई कोर्ट ने कैनी राजन बनाम केरल राज्य के सुप्रसिद्ध मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि कानून की नजर में सहमति का मतलब केवल किसी विपरीत परिस्थिति के आगे मूक आत्मसमर्पण कर देना या चुप रह जाना नहीं होता है।

उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि वास्तविक सहमति वह होती है जो एक वयस्क और स्वस्थ दिमाग का व्यक्ति बिना किसी बहकावे, डर, या दबाव के, सोच-समझकर और कृत्य के सभी अच्छे-बुरे परिणामों को जानते हुए स्वेच्छा से लेता है। यदि कोई वयस्क व्यक्ति किसी कृत्य में सक्रिय रूप से भाग लेता है, तो कानून यह मानकर चलेगा कि उसने अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपनी मर्जी से वह कदम उठाया है।

मेडिकल रिपोर्ट से भी नहीं हुई जबरन दुष्कर्म की पुष्टि डॉक्टर की रिपोर्ट और चोटों के समय में पाया गया भारी अंतर

न्यायालय ने मामले के वैज्ञानिक और चिकित्सकीय पहलुओं पर भी गहराई से प्रकाश डाला। खंडपीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कथित घटना के समय पीड़िता की उम्र 40 वर्ष थी और वह तीन बच्चों की मां थी। इतनी परिपक्व उम्र की महिला को अपने किसी भी सामाजिक कृत्य, उसके संभावित परिणामों और समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभाव की पूरी और मुकम्मल जानकारी थी। वह कोई नासमझ या अवयस्क लड़की नहीं थी जिसे बहलाया-फुसलाया जा सके।

इसके अतिरिक्त, मामले की जांच करने वाली महिला चिकित्सक डॉ. रोजलिन आर. एक्का द्वारा तैयार की गई विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट का भी अदालत ने अवलोकन किया। इस मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर या गुप्तांगों पर जबरन किए गए दुष्कर्म या किसी भी प्रकार के हिंसक संघर्ष की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई थी। रिपोर्ट में महिला के शरीर पर जो मामूली चोटें दर्ज की गई थीं, वे भी कथित घटना के बताए गए समय और तारीख से किसी भी तरह मेल नहीं खाती थीं। चिकित्सकीय साक्ष्यों का यह विरोधाभास आरोपी के पक्ष में एक बड़ा आधार बना।

हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया अपील को आधारहीन मानकर किया खारिज ट्रायल कोर्ट के फैसले में नहीं मिली कोई कानूनी त्रुटि या विसंगति

इन तमाम महत्वपूर्ण तथ्यों, कानूनी सिद्धांतों और वैज्ञानिक रिपोर्टों का संज्ञान लेने के बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उपलब्ध सभी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और डाक्टरी रिपोर्ट का बिल्कुल सही, निष्पक्ष और सटीक मूल्यांकन करते हुए ही आरोपी को बरी करने का न्यायसंगत निर्णय लिया था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित किए गए फैसले में किसी भी प्रकार की कोई कानूनी त्रुटि, प्रक्रियात्मक चूक या व्यावहारिक विसंगति नहीं पाई गई है।

खंडपीठ ने अपने निर्णय में अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश में किसी भी प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है। परिणामस्वरूप, उच्च न्यायालय ने पीड़िता की ओर से प्रस्तुत की गई अपील को पहली ही प्रारंभिक सुनवाई में पूरी तरह से सारहीन और आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया और आरोपी की दोषमुक्ति को अंतिम रूप से बरकरार रखा।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button