महिला बाल विकास विभाग का विवाद गहराया,आरोप-‘बलि का बकरा’ बने OSD, निष्पक्ष जांच की मांग
बैकफुट पर आईं मंत्री? विपक्ष के चौतरफा हमलों के बीच करीबी अधिकारी पर कार्रवाई; विभाग में वित्तीय गड़बड़ी और चहेतों को 'अटैच' करने के खेल पर उठे गंभीर सवाल।


जांच रिपोर्ट से पहले OSD पर गिरी गाज: क्या मंत्री ने खुद को बचाने के लिए दी ‘प्रशासनिक बलि’?
रायपुर । राज्य की सियासत में इन दिनों एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक भूचाल आया हुआ है। महिला एवं बाल विकास विभाग में उपजे एक गंभीर विवाद के बीच, विभागीय मंत्री द्वारा अपने ही ओएसडी (Officer on Special Duty) के खिलाफ अचानक की गई दंडात्मक कार्रवाई ने पूरे गलियारे को चौंका दिया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस मामले को आधार बनाकर यह कार्रवाई की गई है, उसकी आधिकारिक जांच अभी अधूरी है।
न तो जांच एजेंसी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी है और न ही कानूनी या प्रशासनिक स्तर पर अधिकारी का दोष तय हुआ है। ऐसे में जांच पूरी होने से ठीक पहले ओएसडी को पद से हटाना या अनुशासनात्मक कार्रवाई करना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या यह वास्तव में प्रशासनिक शुचिता का कदम है, या फिर मंत्री ने खुद पर आ रहे राजनीतिक दबाव को कम करने के लिए अपने ही करीबी अधिकारी की ‘प्रशासनिक बलि’ चढ़ा दी है?
विगत कुछ दिनों से विभाग से जुड़े एक बड़े विवाद ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर लगातार आक्रामक था और सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया में मंत्री के इस्तीफे की मांग उठ रही थी। सूत्रों के मुताबिक, इसी चौतरफा दबाव से ध्यान भटकाने के लिए आनन-फानन में ओएसडी पर कार्रवाई की पटकथा लिखी गई।
विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को हाथों-हाथ लेते हुए सरकार और संबंधित मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं का साफ कहना है कि यह “बलि का बकरा” बनाने का एक क्लासिक उदाहरण है। मंत्री अपनी राजनीतिक छवि और कुर्सी बचाने के लिए पूरे मामले का ठीकरा एक अधिकारी पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्ष ने अब इस पूरे प्रकरण की किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय एजेंसी से जांच कराने की मांग तेज कर दी है।
विभागीय सूत्रों और हालिया मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस पूरे विवाद की जड़ें बेहद गहरी हैं। विभाग में चर्चा है कि नीतिगत फैसलों के पीछे ओएसडी नहीं, बल्कि ‘पर्दे के पीछे’ सक्रिय कुछ अन्य रसूखदार ताकतें काम कर रही थीं।
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ जहां बेदाग छवि वाले अधिकारियों पर गाज गिर रही है, वहीं दूसरी तरफ विभाग के ही एक अन्य अधिकारी को नियमों को ताक पर रखकर अनाधिकृत रूप से ‘अटैच’ (संबद्ध) किया गया है, जिसके जरिए वित्तीय और प्रशासनिक साठगांठ की बू आ रही है। इतना ही नहीं, सचिवालय के गलियारों में यह सुगबुगाहट भी तेज है कि एक ऐसे दागी और भ्रष्ट अधिकारी को विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की तैयारी चल रही है, जिसके खिलाफ पहले से ही गंभीर विभागीय जांच (DE) लंबित है।
प्रशासनिक जानकारों का मत है कि किसी भी लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था में पहले तथ्यों की स्क्रूटनी (जांच) होती है, फिर जवाबदेही तय की जाती है और अंत में कार्रवाई होती है। लेकिन इस मामले में प्रक्रिया पूरी तरह उलटी दिखाई दे रही है, जो न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत के खिलाफ है।
बिना जांच रिपोर्ट आए सार्वजनिक रूप से एक वरिष्ठ अधिकारी को दोषी ठहराने की इस कार्यशैली से राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों में भारी नाराजगी और असुरक्षा का माहौल है। कर्मचारी संघों का कहना है कि यदि बिना किसी दोषसिद्धि के राजनेता अपनी खाल बचाने के लिए नौकरशाहों को निशाना बनाएंगे, तो इससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का मनोबल टूट जाएगा। भविष्य में कोई भी अधिकारी किसी राजनीतिक दबाव वाले मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।
हालांकि, इस पूरे विवाद पर मंत्री पक्ष की ओर से भी सफाई देने की कोशिश की गई है, जिसमें इसे ‘जीरो टॉलरेंस’ और त्वरित प्रशासनिक सुधार का हिस्सा बताया जा रहा है। आम जनता के बीच भी इस कार्रवाई को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। एक धड़ा जहां इसे त्वरित कार्रवाई मान रहा है, वहीं प्रबुद्ध वर्ग इसे केवल एक राजनीतिक ढाल (Damage Control) के रूप में देख रहा है।
फिलहाल, राज्य की पूरी ब्यूरोक्रेसी और जनता की नजरें जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि जब रिपोर्ट के पन्ने खुलेंगे, तो असली गुनहगारों के नाम सामने आते हैं या फिर इस प्रशासनिक वेदी पर एक अधिकारी की बलि हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगी।



