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प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को हटाने वाले विधेयकों पर विपक्ष बिखरा; जेपीसी को TMC और SP ने बताया ‘तमाशा’, कांग्रेस दबाव में

संविधान के 130वें संशोधन समेत तीन विधेयकों को लेकर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) पर विपक्षी दलों में मतभेद गहराए। तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया है, जिससे कांग्रेस पर विपक्षी एकजुटता का दबाव बढ़ गया है। विपक्ष ने इन विधेयकों को संघीय ढांचे पर हमला और लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है।










लोकसभा में हाल ही में पेश किए गए तीन अहम विधेयकों—संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025, केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 ने संसद में तीखी बहस और राजनीतिक उथल-पुथल को जन्म दिया है। इन विधेयकों में प्रस्ताव है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री गंभीर आरोपों में लगातार 30 दिन तक जेल में रहता है, तो उसे पद से हटाने की कानूनी व्यवस्था लागू की जाएगी। सरकार ने इन विधेयकों को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा है, जो 31 सदस्यों वाली समिति है और इसे शीतकालीन सत्र तक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

विपक्षी दलों का विरोध और बिखराव

तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इन विधेयकों को “संविधान विरोधी” और “राजनीतिक हथियार” करार देते हुए जेपीसी को “तमाशा” बताया है। पार्टी ने स्पष्ट किया कि वह समिति में कोई सदस्य नहीं भेजेगी। टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि “जेपीसी अब सिर्फ सत्तारूढ़ दल का एक राजनीतिक स्टंट बन गया है” और “इसमें विपक्ष की राय को कभी महत्व नहीं दिया जाता”।

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समाजवादी पार्टी (SP) ने भी टीएमसी का साथ देते हुए समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि “विधेयक की सोच ही गलत है” और यह भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि “अगर कोई भी किसी पर फर्जी केस डाल सकता है, तो इस विधेयक का क्या औचित्य रह जाता है?”

कांग्रेस पर बढ़ा दबाव

अब तक कांग्रेस जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में थी, लेकिन सपा और टीएमसी के विरोध के बाद पार्टी के भीतर संशय गहराने लगा है। विपक्षी एकजुटता के नाम पर कांग्रेस पर दबाव बढ़ गया है कि वह भी समिति से दूरी बनाए।

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विधेयकों की संवैधानिक जटिलता

130वें संविधान संशोधन विधेयक के तहत प्रस्ताव है कि यदि कोई मंत्री गंभीर अपराध में 30 दिन तक जेल में रहता है, तो उसे पद से हटाया जाएगा। यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 75 को प्रभावित करेगा, जो मंत्रियों की नियुक्ति और पद की शर्तों से संबंधित है।

हालांकि, विपक्ष का तर्क है कि यह विधेयक “निर्दोष जब तक दोष सिद्ध न हो” की न्यायिक अवधारणा को तोड़ता है और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने का जरिया बन सकता है। AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने इसे “लोकतंत्र के लिए खतरा” बताया है।

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संसद में हंगामा और सुरक्षा घेरे

विधेयकों के पेश होने के दौरान संसद में भारी हंगामा हुआ। विपक्षी सांसदों ने विधेयकों की प्रतियां फाड़ीं और गृह मंत्री अमित शाह के सामने नारेबाजी की। शाह को सुरक्षा घेरे में लिया गया और सदन को कई बार स्थगित करना पड़ा।

निष्कर्ष

जेपीसी को लेकर विपक्ष में मतभेद गहराते जा रहे हैं। जहां कुछ दल इसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी मानते हैं, वहीं अन्य इसे सत्ता पक्ष का राजनीतिक हथकंडा बता रहे हैं। आने वाले शीतकालीन सत्र में समिति की रिपोर्ट और विपक्ष की रणनीति तय करेगी कि यह विधेयक संसद में पारित होते हैं या नहीं।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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