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छत्तीसगढ़ के सरगुजा में पहाड़ी कोरवाओं की ‘ढुकू विवाह’ प्रथा और सामाजिक चुनौतियां

छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल की प्राचीन जनजातीय परंपराओं में आज भी आधुनिक समाज से बिल्कुल अलग नियम और जीवन शैली देखने को मिलती है। विशेष रूप से संरक्षित आदिम जनजाति 'पहाड़ी कोरवा' में 'ढुकू विवाह' (लिव-इन रिलेशनशिप का पारंपरिक रूप) की प्रथा सदियों से चली आ रही है, जो आज भी उनकी सामाजिक व्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।







रायपुर 25 जून 2026 : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सुदूर पहाड़ी और घने वन क्षेत्रों में रहने वाली आदिम जनजाति पहाड़ी कोरवा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के लिए जानी जाती है। इस जनजाति में आज भी ‘ढुकू प्रथा’ पूरी तरह से प्रासंगिक बनी हुई है। आधुनिक समाज में जिसे ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ कहा जाता है, पहाड़ी कोरवा समाज ने उसे सदियों पहले ‘ढुकू’ के रूप में अपनी परंपरा में शामिल कर लिया था।

इस परंपरा के तहत जब कोई लड़का और लड़की एक-दूसरे को पसंद करते हैं, तो वे बिना किसी औपचारिक विवाह या पारंपरिक सात फेरों के, अपनी मर्जी से एक साथ पति-पत्नी की तरह रहने लगते हैं। इस प्रकार साथ रहने वाली महिला को समाज में ढुकू कहा जाता है। शुरुआत में भले ही समाज इसे तुरंत स्वीकार न करे, लेकिन बाद में कुछ विशेष सामाजिक शर्तों, जैसे कि पूरे समाज को प्रीतिभोज (भात देना) कराने के बाद, परिवार और समाज इस रिश्ते को कानूनी और सामाजिक रूप से पूरी मान्यता दे देता है।

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कम उम्र में सहजीवन और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां

इस पारंपरिक स्वतंत्रता के साथ-साथ एक गंभीर पहलू यह भी है कि सुदूर वनांचल और शिक्षा के अभाव के कारण यहां लड़कियां बेहद कम उम्र, यानी मात्र 13 से 14 साल की आयु में ही अपने साथी के साथ रहने लगती हैं। इस कच्ची उम्र में सहजीवन की शुरुआत होने के कारण वे 18 से 19 साल की उम्र तक आते-आते दो से तीन बच्चों की मां बन जाती हैं।

कम उम्र में बार-बार मातृत्व धारण करने और भौगोलिक रूप से कटे होने के कारण इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बेहद सीमित है। उचित पोषण और चिकित्सीय देखरेख न मिलने के कारण इस आदिम जनजाति की महिलाओं और बच्चों में कुपोषण और एनीमिया (खून की कमी) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं बड़े पैमाने पर देखी जाती हैं।

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प्रशासनिक प्रयास और सामाजिक बदलाव की बयार

पहाड़ी कोरवा जनजाति की इस सामाजिक और आर्थिक संवेदनशीलता को देखते हुए शासन और स्थानीय प्रशासन द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमें समय-समय पर इन बस्तियों में पहुंचकर स्वास्थ्य शिविर लगाती हैं और महिलाओं व बच्चों के टीकाकरण तथा पोषण स्तर को सुधारने का काम करती हैं।

इसके साथ ही, समाज में शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है। गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और सामाजिक कार्यकर्ताओं के जमीनी प्रयासों के कारण अब इस समाज के युवा शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं। जागरूकता बढ़ने से विवाह और सहजीवन की उम्र में भी धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है, जिससे आने वाले समय में इनके स्वास्थ्य और जीवन स्तर में बड़े सुधार की उम्मीद की जा रही है।

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Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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