ग्रीन स्टील पर रायपुर में बड़ा मंथन, सरकार और उद्योग जगत ने तय की डीकार्बोनाइजेशन की राह
रायपुर में Green Steel & Mining Summit 2026 में स्टील उद्योग को कम कार्बन उत्पादन की ओर ले जाने और नई तकनीक पर मंथन हुआ।

13 August 2026 | Raipur: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ग्रीन स्टील को लेकर देश के उद्योग जगत, नीति-निर्माताओं, तकनीकी विशेषज्ञों और शोध संस्थानों की बड़ी बैठक हुई है। मेफेयर रिसॉर्ट में 12 और 13 अगस्त को आयोजित Green Steel & Mining Summit 2026 में भारतीय स्टील उद्योग को कम कार्बन उत्सर्जन वाली उत्पादन व्यवस्था की ओर ले जाने, नई तकनीक अपनाने और ग्रीन स्टील के लिए नीतिगत रास्ता तैयार करने पर चर्चा हुई।
CII-Godrej Green Business Centre की ओर से आयोजित यह समिट इस लिहाज से खास है कि छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख लौह अयस्क और स्टील उत्पादन वाले राज्यों में शामिल है। पांचवें संस्करण का मुख्य विषय Decarbonizing the Indian Steel Industry रखा गया, यानी भारतीय स्टील उद्योग से कार्बन उत्सर्जन घटाने की ऐसी रणनीति तैयार करना, जिससे उत्पादन, निवेश और प्रतिस्पर्धा पर भी असर न पड़े।
समिट में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल किया गया है। वहीं Godawari Power & Ispat Ltd के प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ अग्रवाल को Green Steel Summit 2026 का चेयरमैन बनाया गया है। इससे साफ है कि चर्चा केवल सरकारी नीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्पादन करने वाली कंपनियों और तकनीकी क्षेत्र को भी रोडमैप का हिस्सा बनाया गया है।
रायपुर में हो रही इस चर्चा का सीधा संबंध आने वाले वर्षों में भारत की स्टील जरूरत से भी है। CII-Godrej GBC के अनुसार 2030-31 तक भारत में कच्चे स्टील का उत्पादन 255 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है और 85 प्रतिशत क्षमता उपयोग के आधार पर तैयार स्टील का उत्पादन करीब 230 मिलियन टन हो सकता है। बुनियादी ढांचे, ऑटोमोबाइल और रेलवे के विस्तार के साथ स्टील की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए उत्पादन बढ़ाने के साथ पर्यावरणीय दबाव कम करना बड़ी चुनौती बन गया है।
ग्रीन स्टील की जरूरत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि पारंपरिक स्टील उत्पादन ऊर्जा की बड़ी खपत करता है और इससे कार्बन उत्सर्जन भी काफी होता है। ऐसे में उद्योग के सामने चुनौती यह है कि उत्पादन की लागत को नियंत्रण में रखते हुए ऐसी तकनीक अपनाई जाए, जिससे प्रति टन स्टील के उत्पादन में होने वाला उत्सर्जन लगातार कम किया जा सके।
समिट में इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक और द्वितीयक स्टील उत्पादन के अलग-अलग चरणों पर चर्चा को केंद्र में रखा गया। DRI, BF-BOF, EAF और रोलिंग मिल जैसी उत्पादन प्रक्रियाओं को ज्यादा ऊर्जा दक्ष और कम उत्सर्जन वाला बनाने के विकल्पों पर तकनीकी चर्चा की गई।
कार्यक्रम में कम उत्सर्जन वाले स्टील उत्पादों के लिए नए रास्ते तलाशने पर भी जोर रहा। इसका मतलब केवल उत्पादन प्रक्रिया में बदलाव करना नहीं है, बल्कि कच्चे माल से लेकर ऊर्जा, उत्पादन, परिवहन और तैयार उत्पाद तक पूरी सप्लाई चेन में कार्बन फुटप्रिंट कम करने की दिशा में काम करना है।
भारत के स्टील सेक्टर के सामने एक और बड़ी चुनौती लागत की है। नई ग्रीन तकनीक, ऊर्जा दक्ष मशीनरी, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और उत्सर्जन नियंत्रण सिस्टम लगाने में शुरुआती निवेश काफी हो सकता है। इसलिए उद्योग जगत के लिए यह जरूरी है कि सरकार की नीति, वित्तीय प्रोत्साहन और तकनीकी नवाचार एक साथ आगे बढ़ें।
रायपुर समिट में नीतिगत चर्चा को भी इसी कारण प्रमुख स्थान दिया गया। ग्रीन स्टील को तेजी से अपनाने के लिए किस तरह की पॉलिसी चाहिए, उद्योगों को किस तरह का सपोर्ट मिलना चाहिए और नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू करने में कौन-कौन सी बाधाएं हैं, इन मुद्दों पर बातचीत की गई।
समिट का एक अहम फोकस India Green Steel Coalition से जुड़ा सहयोगी रोडमैप भी है। इसका उद्देश्य अलग-अलग उद्योगों, विशेषज्ञों और नीति से जुड़े लोगों को एक साझा प्लेटफॉर्म पर लाकर भारत में कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्टील उत्पादन को आगे बढ़ाने की दिशा में सहयोग बढ़ाना है।
कार्यक्रम में देश और विदेश में विकसित हो रही लो-कार्बन स्टील तकनीकों और उनसे जुड़े नीतिगत अनुभवों को भी चर्चा में शामिल किया गया। इससे भारतीय कंपनियों को यह समझने का अवसर मिलता है कि दुनिया के दूसरे स्टील उत्पादक देश डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में किस तरह आगे बढ़ रहे हैं और उनमें से कौन से मॉडल भारतीय परिस्थितियों में लागू किए जा सकते हैं।
रायपुर में इस तरह का आयोजन छत्तीसगढ़ के लिए भी कारोबारी और औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राज्य पहले से ही लौह अयस्क, स्पंज आयरन, स्टील और उससे जुड़े उद्योगों का बड़ा केंद्र है। ऐसे में ग्रीन स्टील की दिशा में बदलाव राज्य की मौजूदा औद्योगिक क्षमता को नई तकनीक और नए निवेश अवसरों से जोड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ के लिए इसका एक दूसरा पहलू रोजगार और निवेश से जुड़ा है। यदि राज्य में ग्रीन स्टील से जुड़ी नई इकाइयां, तकनीकी समाधान, ऊर्जा परियोजनाएं, रिसाइक्लिंग सिस्टम और सप्लाई चेन विकसित होती हैं तो इससे केवल बड़े स्टील प्लांट ही नहीं, बल्कि छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए भी नए कारोबारी अवसर बन सकते हैं।
पिछले वर्ष रायपुर में आयोजित Green Steel & Mining Summit के दौरान भी राज्य सरकार ने ग्रीन स्टील उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक नीति के तहत प्रोत्साहन और निवेश के अवसरों पर जोर दिया था। 2025 के समिट में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्टील उद्यमियों को छत्तीसगढ़ में निवेश का आमंत्रण देते हुए ग्रीन स्टील उत्पादन के लिए विशेष प्रोत्साहन की बात कही थी।
2025 के आयोजन में CII के अनुसार भारत और विदेश से 400 से ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए थे। वहां नीति-निर्माताओं, तकनीकी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और उद्योग प्रतिनिधियों ने भारत के स्टील सेक्टर को डीकार्बोनाइज करने की रणनीति पर चर्चा की थी।
इस बार भी समिट को केवल एक सामान्य औद्योगिक सम्मेलन के बजाय टेक्नोलॉजी, पॉलिसी और निवेश के बीच कनेक्शन बनाने वाले प्लेटफॉर्म के तौर पर पेश किया गया है। आयोजकों के अनुसार यहां विशेषज्ञों के इंटरैक्टिव सेशन, नई तकनीकों की प्रस्तुति, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय केस स्टडी, डीकार्बोनाइजेशन के अवसर तथा बिजनेस-टू-बिजनेस नेटवर्किंग के मौके उपलब्ध कराए गए हैं।
समिट में स्टील और माइनिंग सेक्टर से जुड़े कई उद्योग प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों को वक्ता के तौर पर शामिल किया गया। इनमें विजय गुप्ता, सिद्धार्थ अग्रवाल, बीएल अग्रवाल, वीरेंद्र गोयल, रमेश अग्रवाल, दिनेश अग्रवाल, महेंद्र अग्रवाल, उमेश चितलांगिया, कमल सारडा, पंकज सारडा, नरेंद्र गोयल, आनंद सिंघानिया और बजरंग गोयल समेत उद्योग जगत के कई नाम शामिल हैं।
ग्रीन स्टील की दिशा में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पर्यावरणीय लक्ष्य और कारोबारी व्यवहारिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उद्योग के लिए ऐसी तकनीक तभी लंबे समय तक टिकाऊ साबित होगी जब उससे उत्सर्जन कम होने के साथ उत्पादन लागत, ऊर्जा खपत और उत्पाद की बाजार प्रतिस्पर्धा भी नियंत्रण में रहे।
छत्तीसगढ़ के लिए यह मुद्दा और ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन और धातु आधारित उद्योगों की बड़ी भूमिका है। आने वाले वर्षों में यदि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कार्बन वाले उत्पादों की मांग बढ़ती है तो राज्य के स्टील उत्पादकों के लिए ग्रीन टेक्नोलॉजी में शुरुआती निवेश प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी बन सकता है।
दूसरी तरफ, नई तकनीक के लिए बिजली और स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता भी जरूरी होगी। स्टील उद्योग में डीकार्बोनाइजेशन केवल मशीनरी बदलने से संभव नहीं होगा, बल्कि ऊर्जा स्रोतों, उत्पादन प्रक्रियाओं, डिजिटल मॉनिटरिंग, कार्बन अकाउंटिंग और सप्लाई चेन में भी बदलाव करना होगा।
यही वजह है कि रायपुर में आयोजित समिट में नीति-निर्माताओं के साथ टेक्नोलॉजी सप्लायर, मैन्युफैक्चरर, रिसर्च संस्थान, थिंक टैंक, वित्तीय संस्थान और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों को एक मंच पर लाया गया। आयोजकों का उद्देश्य इन अलग-अलग पक्षों के बीच साझेदारी और कारोबारी सहयोग को बढ़ाना भी है।
ग्रीन स्टील का बाजार अभी बदलाव के दौर में है और भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ देश को बढ़ती घरेलू मांग के लिए बड़े पैमाने पर स्टील उत्पादन करना है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक बाजार में पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप बने रहना है। ऐसे में कम उत्सर्जन वाली उत्पादन तकनीक अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि उद्योग की भविष्य की प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा विषय बन गया है।
रायपुर का यह आयोजन इसी बदलते औद्योगिक परिदृश्य में छत्तीसगढ़ की भूमिका को भी सामने रखता है। खनिज संसाधन, स्टील उत्पादन की मौजूदा क्षमता, उद्योगों का नेटवर्क और देश के मध्य हिस्से में स्थित होने के कारण राज्य ग्रीन स्टील की नई वैल्यू चेन विकसित करने की क्षमता रखता है।
अब आगे की चुनौती चर्चा को जमीन पर उतारने की होगी। नई तकनीक में निवेश, ग्रीन एनर्जी की उपलब्धता, लागत में कमी, नीति का स्थायित्व और बाजार में ग्रीन स्टील की मांग ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार और उद्योग को मिलकर काम करना होगा।
रायपुर में दो दिन चले Green Steel & Mining Summit 2026 ने कम से कम इतना साफ कर दिया है कि भारतीय स्टील उद्योग के भविष्य की चर्चा अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। आने वाले दौर में स्टील की गुणवत्ता के साथ यह भी देखा जाएगा कि वह कितनी ऊर्जा से बना, उसमें कितना कार्बन उत्सर्जन हुआ और उद्योग उस उत्सर्जन को कितनी तेजी से कम कर सकता है।



