भू-माफिया से सांठगांठ या लाचारी? जोन 7 की सब-इंजीनियर का अजीब तर्क-रेती, गिट्टी, ईंट जब्ती का सामान नहीं
छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 की धारा 302 और 307 को ठेंगा; नोटिस के बाद भी रात-दिन पहुंच रही निर्माण सामग्री, इंजीनियर का संरक्षण ।

रायपुर । छत्तीसगढ़ की राजधानी का नगर निगम इन दिनों ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रहा है। रायपुर नगर निगम के जोन कार्यालयों और खासकर राजस्व अमले की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर भ्रष्टाचार और भू-माफियाओं से गहरी सांठगांठ के गंभीर आरोप लग रहे हैं। पूरा मामला ग्राम चिरहुलडीह (पटवारी हल्का नंबर 52, रा.नि.मं. रायपुर-03) का है, जहां लगभग 5000 स्क्वायर फीट की बेशकीमती जमीन पर कानून की धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से अवैध निर्माण को अंजाम दिया जा रहा है।
शर्मनाक बात यह है कि इस खुले उल्लंघन को रोकने में जिम्मेदार अधिकारी पूरी तरह ‘नतमस्तक’ और नाकाम साबित हो रहे हैं। खुद नगर निगम प्रशासन और जोन 7 आयुक्त यह सार्वजनिक रूप से कबूल कर चुके हैं कि इस महा-निर्माण के लिए न तो कोई वैध भवन अनुज्ञा (Building Permission) ली गई है और न ही कोई नक्शा पास हुआ है। इसके बावजूद, निगम प्रशासन के पीले पंजे (बुलडोजर) का रुख इस अवैध ढांचे की तरफ न होना, कई गहरे और अनुत्तरित सवाल खड़े करता है।
छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 के तहत यदि कोई व्यक्ति बिना वैध भवन अनुज्ञा के या स्वीकृत मानचित्र के विपरीत निर्माण कार्य करता है, तो वह कानूनन अपराध और पूरी तरह अवैध है। इस मामले में जोन 7 प्रशासन द्वारा आरोपी को एक के बाद एक, करीब 2 से 3 नोटिस (धारा 302 और 307 के तहत) जारी किए जा चुके हैं। नियम कहते हैं कि नोटिस के बाद यदि निर्माण न रुके, तो धारा 307(3) के तहत पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचकर अवैध हिस्से को तुरंत ढहाने (Demolition) की कार्रवाई की जानी चाहिए और इसका पूरा खर्च अवैध निर्माणकर्ता से वसूला जाना चाहिए। लेकिन चिरहुलडीह में कानून की इस किताब को बंद करके ताक पर रख दिया गया है।
इस पूरे मामले में जोन 7 की लापरवाही और संदेहास्पद कार्यशैली तब उजागर हो गई, जब जब्ती की कार्रवाई के नाम पर महज कुछ छड़ें उठाकर कोरम पूरा कर लिया गया। हद तो तब हो गई जब कल भी अवैध कब्जाधारी बेखौफ होकर मौके पर रेती, गिट्टी और ईंट से भरी गाड़ियां लेकर पहुंच गया। जब इस खुले उल्लंघन पर जोन 7 की सब-इंजीनियर प्रेरणा अग्रवाल से सवाल किया गया, तो उनका बेहद गैर-जिम्मेदाराना और चौंकाने वाला तर्क सामने आया। सब-इंजीनियर का कहना है कि ये सब (रेती, गिट्टी, ईंट) जब्ती के सामान नहीं हैं और इनकी जब्ती नहीं की जा सकती।
एक तकनीकी अधिकारी का यह बयान सीधे तौर पर भू-माफियाओं को हौसला देने और निगम अधिनियम की मूल भावना का मखौल उड़ाने जैसा है। यदि निर्माण स्थल पर आ रही निर्माण सामग्री ही जब्त नहीं होगी, तो निर्माण रुकेगा कैसे? क्या जोन 7 का अमला जानबूझकर निर्माण पूरा होने का इंतजार कर रहा है?
चूंकि दो से तीन नोटिस पहले ही तामिल किए जा चुके हैं, और अवैध कब्जाधारी लगातार आदेशों की अवहेलना कर रहा है, ऐसे में निगम की यह सुस्ती मिलीभगत की तरफ साफ इशारा करती है। सजग नागरिकों द्वारा अब दोनों नोटिस की कॉपियों का हवाला देते हुए जोन कमिश्नर को तुरंत ध्वस्तीकरण (Demolition) की मांग की जा रही है।
पत्रकारों पर ‘टॉर्चर’ का आरोप मढ़ने वाली सब-इंजीनियर प्रेरणा अग्रवाल को पहले यह जवाब देना चाहिए कि रसूखदारों के आगे नतमस्तक निगम प्रशासन की इस घोर लाचारी के कारण जिस पीड़ित पक्ष की बेशकीमती जमीन पर सरेआम अवैध कब्जा हो रहा है, वह किस मानसिक प्रताड़ना और अंतहीन ‘टॉर्चर’ से गुजर रहा है? चौथे स्तंभ (मीडिया) द्वारा जनता के हक में तीखे सवाल पूछने को अपनी प्रताड़ना बताने वाली सब-इंजीनियर और जोन 7 प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी क्या पीड़ित के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी नहीं है?
एक तरफ रसूखदार कब्जाधारी कानूनी नोटिसों की धज्जियां उड़ाकर बेखौफ निर्माण सामग्री डंप कर रहा है, और दूसरी तरफ अपनी कानूनी जिम्मेदारियों से भागते अधिकारी इसे महज एक सामान्य प्रक्रिया मान रहे हैं। ऐसे में यह गंभीर और यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि इस प्रशासनिक उदासीनता और अन्याय के बोझ तले दबकर यदि पीड़ित पक्ष को कोई शारीरिक या मानसिक क्षति पहुंचती है, तो क्या जोन 7 और नगर निगम प्रशासन इसकी पूरी नैतिक व वैधानिक जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाएगा, या फिर हमेशा की तरह फाइलों के पीछे छिपकर अपनी गर्दन बचा लेगा?
अब देखना यह होगा कि क्या नगर निगम के आला अधिकारी अपने मातहतों की इस घोर लापरवाही और संदिग्ध भूमिका पर संज्ञान लेते हुए चिरहुलडीह के इस ‘महा-अवैध निर्माण’ पर कड़ा बुलडोजर चलाते हैं, या फिर कागजी नोटिसों का यह खेल यूं ही बदस्तूर जारी रहेगा।



