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कैदियों की समय पूर्व रिहाई में दोहरे मापदंड पर हाईकोर्ट सख्त: एक ही मामले के सह-आरोपियों के लिए अलग-अलग पैमाना तय करने पर उठाए सवाल

बिलासपुर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और जेल विभाग को दिया समानता के सिद्धांत का पालन करने का निर्देश, सह-आरोपी की सकारात्मक रिपोर्ट को आधार बनाकर याचिकाकर्ता के मामले का जल्द निपटारा करने का आदेश।







रायपुर, 25 जून 2026। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने जेलों में बंद कैदियों की समय पूर्व रिहाई (Premature Release) के मामलों में प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर अपनाए जा रहे दोहरे मापदंड को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा आदेश जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच (खंडपीठ) ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई है कि एक ही आपराधिक मामले के दो अलग-अलग आरोपियों के लिए रिहाई के अलग-अलग पैमाने तय किए जा रहे हैं।

हाईकोर्ट ने इस प्रशासनिक विसंगति को रेखांकित करते हुए राज्य सरकार और जेल प्रबंधन को सख्त निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता कैदी की रिहाई के आवेदन पर विचार करते समय देश के संविधान में निहित समानता के सिद्धांत (Principle of Equality) को पूरी तरह से ध्यान में रखा जाए। अदालत ने साफ किया है कि नियमों का मनमाना क्रियान्वयन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

सह-आरोपी की सकारात्मक रिपोर्ट बनेगी आधार

इस मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि एक ही मामले में सजा काट रहे सह-आरोपी की समय पूर्व रिहाई के आवेदन पर जेल प्रशासन और संबंधित सक्षम प्राधिकारियों ने सकारात्मक रुख अपनाया था, जबकि उसी समान पृष्ठभूमि वाले याचिकाकर्ता कैदी के आवेदन पर अलग मापदंड अपनाया जा रहा था। इस पर संज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने मामले को पूरी तरह खारिज करने के बजाय इसे सक्षम प्राधिकारी (जेल विभाग) को वापस भेज दिया है।

हाईकोर्ट ने जेल विभाग को स्पष्ट रूप से निर्देशित किया है कि जिस सह-आरोपी को सकारात्मक रिपोर्ट के आधार पर राहत दी गई है, ठीक उसी रिपोर्ट और मापदंड को आधार बनाकर याचिकाकर्ता के मामले का भी परीक्षण किया जाए। अदालत ने इसके लिए कानून सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए यथाशीघ्र और न्यूनतम समय सीमा के भीतर मामले का निपटारा करने के आदेश दिए हैं।

समय पूर्व रिहाई की प्रक्रिया और सुधारात्मक न्याय

विभागीय और कानूनी जानकारों के अनुसार, छत्तीसगढ़ जेल नियमों (Chhattisgarh Prison Rules) के तहत लंबी सजा काट चुके और जेल में अच्छे आचरण का प्रदर्शन करने वाले कैदियों की समय पूर्व रिहाई के लिए राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (State Sentence Review Board) का गठन किया गया है। नियमतः 14 वर्ष या उससे अधिक की वास्तविक सजा पूरी कर चुके कैदी इस रिहाई की पात्रता के दायरे में आते हैं, जहां उनके आचरण, जिला मजिस्ट्रेट व पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाता है।

उच्च न्यायालय ने अपने इस आदेश से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि समय पूर्व रिहाई की नीति का उद्देश्य सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) को बढ़ावा देना है, न कि प्रशासनिक अधिकारियों को मनमानी का अधिकार देना। एक ही अपराध में शामिल अपराधियों के बीच जेल में रहने के दौरान उनके अच्छे आचरण की समान रिपोर्ट होने के बावजूद अलग-अलग निर्णय लेना समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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