छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में धर्मांतरण पर भारी बवाल: 26 ईसाई परिवारों का किया गया गांव निकाला
भरंडा गांव में आदिवासियों और मतांतरित परिवारों के बीच गहराया विवाद, श्मशान घाट के पास पुलिस सुरक्षा में कटी रात, प्रशासन की मध्यस्थता के बाद शर्तों पर बनी सहमति।

इस संवेदनशील मामले की जानकारी मिलते ही पूरे इलाके में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। जिला प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी मौके पर पहुंचकर दोनों पक्षों के बीच शांति व्यवस्था बहाल करने के प्रयासों में जुटे हैं।
यह पूरी घटना नारायणपुर जिले के भरंडा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम भरंडा की है। घटना की शुरुआत मंगलवार, 23 जून 2026 को सुबह उस वक्त हुई जब स्थानीय मूल आदिवासी समुदाय के लोग भारी संख्या में लामबंद हो गए। ग्रामीणों का आक्रोश इस बात को लेकर था कि ईसाई मत को मानने वाले लोग अपनी मूल जनजातीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा का परित्याग कर चुके हैं।
ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से दो टूक शब्दों में कहा कि यदि इन परिवारों को गांव में रहना है, तो इन्हें अपने पारंपरिक देवी-देवताओं को मानना होगा और मूल संस्कृति में वापस लौटना होगा, अन्यथा वे गांव में नहीं रह सकते।
नारायणपुर से मिली ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि 22 जून 2026 को ही तैयार हो गई थी, जब पुलिस ने धर्मांतरण के एक मामले में दोनों पक्षों के बीच हुई गहमागहमी के बाद मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट के माध्यम से जेल भेज दिया था। मुख्य आरोपियों के जेल जाने के बाद स्थानीय आदिवासियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ और 23 जून 2026 की सुबह ग्रामीणों ने बैठक कर मतांतरित परिवारों को गांव छोड़ने का कड़ा आदेश दे दिया।
श्मशान घाट के पास पुलिस की सुरक्षा में गुजरी रात
ग्रामीणों के कड़े रुख और गहमागहमी के बीच 26 ईसाई परिवारों को अपने घरों से बाहर निकलना पड़ा। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि भीड़ ने उनके साथ अभद्रता की और उनके घरों से सामान निकालकर उन्हें गांव की सीमा से बाहर खदेड़ दिया। स्थिति बेहद गंभीर हो गई क्योंकि इन बेघर हुए परिवारों को गांव के बाहर स्थित एक श्मशान घाट के पास खुले आसमान और पेड़ों के नीचे शरण लेनी पड़ी।
मामले की संवेदनशीलता और हिंसक टकराव की आशंका को देखते हुए नारायणपुर जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने तुरंत संज्ञान लिया। भरंडा गांव को पूरी तरह से पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। श्मशान घाट के पास रह रहे पीड़ित परिवारों की सुरक्षा के लिए पुलिस बल के जवानों की तैनाती की गई ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके। इस दौरान कुछ महिलाओं के मामूली रूप से घायल होने की भी अपुष्ट खबरें सामने आई हैं।
प्रशासन की मध्यस्थता और समझौते की कड़ी शर्तें
तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए 23 जून की रात से लेकर 24 जून 2026 की दोपहर तक जिला प्रशासन, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों, ग्राम प्रमुखों (गायता) और दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच लगातार मैराथन बैठकें आयोजित की गईं। चौतरफा दबाव और सामाजिक सौहार्द को बचाने के लिए प्रशासन की मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच बीती देर रात एक लिखित समझौता कराया गया।
इस समझौते के तहत आदिवासियों ने इन 26 ईसाई परिवारों को वापस गांव में आकर रहने की अनुमति दे दी है, लेकिन इसके लिए कुछ बेहद कड़ी शर्तें लागू की गई हैं। ग्राम भरंडा में हुए इस समझौते के अनुसार:
- गांव की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार का नया धर्मांतरण (कन्वर्जन) कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाएगा।
- ईसाई मत से जुड़ी सामूहिक प्रार्थना सभाएं या चंगाई सभाओं के लिए मीटिंग करने पर पूरी तरह रोक रहेगी।
- यदि कोई व्यक्ति ईसाई परंपरा के अनुसार जीवन व्यतीत कर रहा है, तो मृत्यु के पश्चात कफ़न-दफ़न की ईसाई रीतियां गांव की पारंपरिक भूमि पर नहीं की जाएंगी।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह सभी परिवार स्वेच्छा से अपने मूल धर्म और संस्कृति में लौट आते हैं, तो उन्हें बिना किसी शर्त के रहने दिया जाएगा। फिलहाल गांव में पुलिस बल तैनात है और स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह समाचार रिपोर्ट www.the4thpillar.live की ओर से केवल सामान्य जानकारी और लोकहित में जारी की गई है। इस रिपोर्ट में शामिल तथ्य स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस सूत्रों और ब्यूरो रिपोर्ट्स से प्राप्त जानकारियों पर आधारित हैं। संस्थान का उद्देश्य किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।



