AdministrationBig BreakingChhattisgarhFeaturedछत्तीसगढ़रायपुर
Trending

रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान अश्विनी बांधे का मालिकाना हक का दावा, सुप्रीम कोर्ट में मांगा 3,500 करोड़ का मुआवजा

छत्तीसगढ़ के एक साधारण किसान ने देश की सर्वोच्च अदालत में न्याय की गुहार लगाते हुए एक असाधारण कानूनी लड़ाई छेड़ दी है। बिलासपुर और रायपुर संभाग के मध्य रहने वाले 53 वर्षीय किसान अश्विनी बांधे ने सुप्रीम कोर्ट में रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की जमीन पर अपना दावा ठोकते हुए 3,500 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक मुआवजे की मांग की है। किसान का दावा है कि उनके पूर्वजों की उपजाऊ जमीन को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने केवल अस्थायी रूप से अधिग्रहित किया था, जिसे युद्ध समाप्ति के बाद कभी वापस नहीं किया गया और न ही कोई हर्जाना दिया गया।







रायपुर, 5 जुलाई 2026: छत्तीसगढ़ के राजस्व और कानूनी इतिहास में अब तक का सबसे अनोखा, अविश्वसनीय और बेहद चौंकाने वाला मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के पटल पर पहुंच चुका है। छत्तीसगढ़ के रहने वाले एक 53 वर्षीय साधारण किसान अश्विनी बांधे ने भारत सरकार, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के खिलाफ एक ऐतिहासिक कानूनी जंग का शंखनाद किया है। किसान अश्विनी बांधे का आधिकारिक दावा है कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का जो मुख्य स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (माना एयरपोर्ट) संचालित हो रहा है, उसकी आलीशान मुख्य टर्मिनल बिल्डिंग, रनवे और पूरा का पूरा प्रशासनिक परिसर जिस भूमि पर निर्मित है, वह वास्तव में उनके पूर्वजों की पैतृक जायदाद है।

इस विशाल भूखंड के वर्तमान बाजार मूल्य और दशकों के बकाया हर्जाने को जोड़कर किसान ने सुप्रीम कोर्ट में करीब 3,500 करोड़ रुपये के विशाल मुआवजे का एक दीवानी दावा (Compensation Claim) दायर किया है। किसान का मुख्य कानूनी तर्क यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने वर्ष 1942 में अपनी तात्कालिक सैन्य आवश्यकताओं और युद्धकालीन हवाई पट्टी (Airfield) के निर्माण के लिए इस संपूर्ण भूखंड को केवल अस्थायी रूप से अधिग्रहित (Temporary Acquisition) किया था। युद्ध के नियम और शर्तों के अनुसार, वैश्विक महायुद्ध समाप्त होने के बाद यह पूरी जमीन उनके परिवार को ससम्मान वापस की जानी तय थी, लेकिन आजाद भारत की सरकारों ने भी इस दिशा में भारी उपेक्षा दिखाई और जमीन कभी वापस नहीं मिल सकी।

दशकों लंबा कानूनी संघर्ष और 35 वर्षों की अथक तपस्या का सफर

किसान अश्विनी बांधे इस बेहद पेचीदा और संवेदनशील जमीनी मामले को लेकर पिछले 35 वर्षों से लगातार विभिन्न अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। उन्होंने अपनी युवावस्था के शुरुआती दिनों से ही इस कानूनी लड़ाई को अपने जीवन का एकमात्र मुख्य उद्देश्य बना लिया था। पिछले साढ़े तीन दशकों के इस लंबे और थका देने वाले सफर के दौरान अश्विनी बांधे ने देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक सरकारी रिकॉर्ड रूम्स, राष्ट्रीय पुस्तकालयों, रक्षा मंत्रालय के पुराने अभिलेखागारों और मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के राजस्व विभागों की धूल फांकते हुए हजारों गोपनीय और प्रामाणिक दस्तावेज जुटाए हैं।

अश्विनी बांधे का यह दृढ़ और कानूनी दावा है कि उनके द्वारा जुटाए गए इन सभी ऐतिहासिक एवं प्रामाणिक सरकारी दस्तावेजों से यह अकाट्य रूप से साबित होता है कि ब्रिटिश हुकूमत द्वारा उक्त भूमि का स्थायी अधिग्रहण कभी किया ही नहीं गया था। इस बेहद खर्चीली और लंबी कानूनी प्रक्रिया को जीवित रखने के लिए इस किसान ने अपनी भारी-भरकम पूंजी दांव पर लगा दी है। बांधे के अनुसार, विभिन्न अदालतों की फीस, वकीलों के मानदेय, देश भर की यात्राओं और प्राचीन दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां निकलवाने में उनके परिवार के अब तक लगभग 15 से 20 करोड़ रुपये पूरी तरह से खर्च हो चुके हैं।

माना एयरफील्ड के लिए ली गई थी बांधे परिवार की पैतृक उपजाऊ भूमि

प्राचीन भू-राजस्व के पुराने अभिलेखों और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के गहन विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 1942 में तत्कालीन ब्रिटिश सैन्य कमांड ने सैन्य विमानों के संचालन हेतु माना एयरफील्ड के निर्माण के लिए बांधे परिवार की लगभग 30 एकड़ और 18 डिसमिल अत्यधिक उपजाऊ कृषि भूमि का आधिकारिक अधिग्रहण किया था। उस समय के लिखित सरकारी प्रावधानों और समझौतों के अनुसार, इस अस्थायी भूमि उपयोग के बदले में पीड़ित किसान परिवार को प्रतिवर्ष 1,300 रुपये का सालाना किराया (Annual Rental Compensation) देने का एक स्पष्ट विधिक प्रावधान तय किया गया था।

परंतु, दुर्भाग्यवश वैश्विक युद्ध की आपाधापी के बीच बांधे परिवार को न तो वह तयशुदा सालाना किराया कभी दिया गया और न ही 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के पूरी तरह समाप्त हो जाने के बाद उनकी पैतृक जमीन उन्हें वापस लौटाई गई। भारत की आजादी के बाद इस भूमि पर हवाई अड्डे का निरंतर विस्तार होता चला गया। इसी घोर प्रशासनिक विसंगति और बुनियादी मानवाधिकारों के हनन को मुख्य आधार बनाते हुए किसान ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर 3,500 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है। हालांकि, देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस बेहद जटिल और करोड़ों रुपये के दावे पर अपना कोई अंतिम या बाध्यकारी फैसला नहीं सुनाया है और यह मामला वर्तमान में कोर्ट में विचाराधीन (Sub-Judice) है।

संस्कृति विभाग की प्रदर्शनी से मिले मजबूत ऐतिहासिक साक्ष्य और सरकारी दस्तावेज

अश्विनी बांधे के अनुसार, भारत में वर्ष 1946 में तत्कालीन ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ (Defense of India Act) की मियाद पूरी तरह से समाप्त हो गई थी। इसके बाद स्वतंत्र भारत की संसद द्वारा वर्ष 1952 में एक नया भूमि प्रबंधन कानून लागू किया गया था, जिसके तहत इन औपनिवेशिक काल की सैन्य जमीनों का वास्तविक प्रशासनिक प्रबंधन देश के विभिन्न नागरिक और सरकारी विभागों को हस्तांतरित कर दिया गया। बांधे का सीधा आरोप है कि इस पूरी नौकरशाही की लंबी प्रक्रिया के दौरान उनके परिवार के वैध कानूनी अधिकारों और मालिकाना हक की घोर अनदेखी की गई।

इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा रायपुर में आयोजित की गई एक ऐतिहासिक अभिलेखीय प्रदर्शनी में अश्विनी बांधे को सन 1942 के माना एयरफील्ड भूमि अधिग्रहण से जुड़ी कुछ मूल सरकारी फाइलें और दस्तावेज दिखाई दिए। इसके तत्काल बाद उन्होंने ‘लोक सेवा गारंटी अधिनियम’ (Public Service Guarantee Act) के तहत कानूनी चैनलों का उपयोग करते हुए उन सभी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां (Certified Copies) आधिकारिक तौर पर प्राप्त कर लीं। किसान का कहना है कि संस्कृति विभाग के ये आधिकारिक दस्तावेज उनके मालिकाना हक के दावे को कानूनी रूप से अभेद्य बनाते हैं।

संस्कृति विभाग की आधिकारिक पुष्टि, मगर मालिकाना हक पर साधी चुप्पी

इस पूरे मामले के मीडिया में आने के बाद छत्तीसगढ़ राज्य संस्कृति विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अनौपचारिक रूप से इस बात की पुष्टि की है कि विभाग के ऐतिहासिक सरकारी अभिलेखागार में उस कालखंड की भूमि अधिग्रहण से संबंधित महत्वपूर्ण फाइलें, ब्रिटिश सेना के पत्राचार और प्रभावित स्थानीय किसानों के नामों की विस्तृत सूचियां पूरी तरह से सुरक्षित दर्ज हैं, जिनमें बांधे परिवार के पूर्वजों का भी उल्लेख मिलता है।

हालांकि, चूंकि यह पूरा मामला सीधे तौर पर भारत सरकार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा संपत्ति (National Infrastructure Asset) यानी चालू हवाई अड्डे की सुरक्षा और अरबों रुपये की भूमि के स्वामित्व से जुड़ा हुआ है, इसलिए संस्कृति विभाग के किसी भी अधिकारी ने वर्तमान में इस जमीन के वास्तविक कानूनी मालिकाना हक या मुआवजे की वैधता पर कोई भी आधिकारिक टिप्पणी करने से पूरी तरह से इंकार कर दिया है। अब पूरे देश की नजरें सुप्रीम कोर्ट के आने वाले रुख पर टिकी हैं कि क्या शीर्ष अदालत इस 84 साल पुराने ऐतिहासिक विवाद में किसान के पक्ष में कोई बड़ा फैसला सुनाती है या नहीं।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button