छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वैवाहिक विवादों के स्थानांतरण में पत्नी की सुविधा को मिलेगी सर्वोच्च प्राथमिकता, दुर्ग से बेमेतरा ट्रांसफर हुआ तलाक का मुकदमा
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों के स्थानांतरण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है, जिसके तहत कानूनी लड़ाइयों में महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए 'पत्नी की सुविधा' को सर्वोपरि माना गया है।

रायपुर 25 जून 2026 : छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने देश के सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को ध्यान में रखते हुए एक युगांतरकारी विधिक सिद्धांत को पुनर्स्थापित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब भी पारिवारिक न्यायालयों में लंबित मुकदमों को एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरित करने की बात आएगी, तब न्याय प्रणाली को महिला की व्यावहारिक और आर्थिक स्थिति का विशेष ध्यान रखना होगा।
वैवाहिक विवादों के स्थानांतरण के एक मामले की संवेनदशील सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की एकलपीठ ने देश की सर्वोच्च अदालत के मार्गदर्शक सिद्धांतों को अपनी ढाल बनाया।
माननीय न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय पारित किया। अदालत ने सीधे तौर पर टिप्पणी की कि भारतीय समाज के वर्तमान सामाजिक और आर्थिक ढांचे में वैवाहिक मुकदमों की सुनवाई के भौगोलिक स्थान का निर्धारण करते समय ‘पत्नी की सुविधा’ को हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस टिप्पणी के साथ ही उच्च न्यायालय ने दुर्ग के फैमिली कोर्ट में चल रहे एक बड़े तलाक के मुकदमे को पूरी तरह से बेमेतरा जिले के न्यायालय में स्थानांतरित करने का ऐतिहासिक आदेश जारी कर दिया है।
क्या है पूरा मामला: ग्राम शारदा की फातिमा निशा की आपबीती
यह पूरा विधिक मामला बेमेतरा जिले के अंतर्गत आने वाले सुदूर ग्राम शारदा की रहने वाली एक 20 वर्षीय विवाहिता महिला फातिमा निशा से जुड़ा हुआ है। कानूनी दस्तावेजों और याचिका में प्रस्तुत किए गए तथ्यों के अनुसार, फातिमा निशा का निकाह पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ 27 सितंबर 2024 को दुर्ग शहर के निवासी शेख साहिल के साथ संपन्न हुआ था। निकाह के शुरुआती कुछ महीने तो सामान्य रहे, लेकिन कुछ ही समय बीतने के बाद पारिवारिक कलह और वैचारिक मतभेद शुरू हो गए।
याचिकाकर्ता महिला का आरोप है कि निकाह के कुछ ही महीनों बाद उनके पति शेख साहिल और उनके परिजनों ने उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से गंभीर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। प्रताड़ना का स्तर इस कदर बढ़ गया कि अंततः महिला को अपनी जान और अस्मत की रक्षा करने के लिए मजबूरन अपने मात्र एक साल के दूधमुंहे बच्चे को गोद में लेकर दुर्ग का घर छोड़ना पड़ा। वह तब से बेमेतरा जिले में स्थित अपने मायके (ग्राम शारदा) में शरण लिए हुए है और अपने माता-पिता के संरक्षण में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रही है।
विधिक दांव-पेंच: दुर्ग में तलाक की अर्जी बनाम हाई कोर्ट में ट्रांसफर पिटीशन
विवाद के इस चरम पर पहुंचने के बाद पति शेख साहिल ने अपनी पत्नी को वापस बुलाने के बजाय दुर्ग के स्थानीय फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) में वैवाहिक संबंधों के विच्छेद यानी तलाक का मुकदमा दायर कर दिया। चूंकि मुकदमा दुर्ग में दायर किया गया था, इसलिए बेमेतरा के एक सुदूर गांव में रहने वाली पीड़ित महिला के लिए हर तारीख पर उतनी दूर जाकर अपनी विधिक पैरवी करना एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती बन गया था।
इस भौगोलिक और आर्थिक लाचारी को देखते हुए पीड़िता फातिमा निशा ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का रुख किया। महिला की ओर से हाई कोर्ट में वैवाहिक विवादों के स्थानांतरण की एक विशेष याचिका (Transfer Petition) दायर की गई। इस याचिका में मांग की गई कि दुर्ग में लंबित तलाक के केस को बेमेतरा जिला न्यायालय में ट्रांसफर किया जाए ताकि वह अपने और अपने बच्चे के अधिकारों की रक्षा सुरक्षित माहौल में कर सके।
पति की अनुपस्थिति में हुई एकपक्षीय सुनवाई
उच्च न्यायालय ने इस स्थानांतरण याचिका पर संज्ञान लेते हुए विपक्षी यानी पति शेख साहिल को नोटिस जारी कर उनका पक्ष रखने के लिए अदालत में तलब किया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान पति या उनकी ओर से कोई भी अधिकृत विधिक प्रतिनिधि न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ।
पति की इस निरंतर अनुपस्थिति और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने मामले में और अधिक विलंब न करते हुए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर एकपक्षीय सुनवाई (Ex-Parte Hearing) करने का निर्णय लिया।
अधिवक्ता की अकाट्य दलीलें: नवजात बच्चे के साथ सफर करना असंभव
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला के विद्वान अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष बेहद तार्किक और व्यावहारिक दलीलें पेश कीं। उन्होंने माननीय न्यायालय को अवगत कराया कि पीड़िता वर्तमान में पूरी तरह से अपने मायके के परिवार पर आश्रित है। उसके पास आय का कोई स्वतंत्र और नियमित स्रोत नहीं है।
इसके अतिरिक्त, उनके साथ एक साल का अत्यंत छोटा बच्चा है। ऐसे में बेमेतरा के ग्रामीण अंचल से अकेले निकलकर, ट्रेन या बसों का लंबा सफर तय करके दुर्ग जाना, वहां कोर्ट की तारीखों पर पूरा दिन बिताना और फिर वापस लौटना एक अकेली महिला के लिए न केवल आर्थिक रूप से बोझिल है, बल्कि उसकी सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी बेहद खतरनाक और असंभव है।
सुप्रीम कोर्ट के तीन मील के पत्थरों जैसे फैसलों का हवाला
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत फैसले को विधिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) द्वारा समय-समय पर प्रतिपादित किए गए तीन अत्यंत महत्वपूर्ण नजीरों और न्यायिक सिद्धांतों का विशेष रूप से उल्लेख किया। हाई कोर्ट ने कहा कि देश की शीर्ष अदालत ने हमेशा यह माना है कि वैवाहिक मुकदमों में दोनों पक्षों की तुलना में महिला पक्ष का पलड़ा हमेशा कमजोर होता है, इसलिए उनकी यात्रा और निवास की असुविधाओं को कम किया जाना चाहिए।
इन्हीं ऐतिहासिक विधिक सिद्धांतों को आधार बनाते हुए न्यायमूर्ति चंद्रवंशी ने व्यवस्था दी कि न्याय का प्राथमिक उद्देश्य समाज के कमजोर वर्ग को सुलभ न्याय प्रदान करना है। चूंकि महिला अपने मायके में रहकर बच्चे की देखरेख कर रही है, इसलिए वैवाहिक विवादों के स्थानांतरण की उनकी यह मांग पूरी तरह से न्यायोचित और कानून सम्मत है।
चार महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का कड़ा निर्देश
उच्च न्यायालय ने केवल केस ट्रांसफर करने का ही आदेश नहीं दिया, बल्कि त्वरित न्याय (Speedy Justice) के सिद्धांत को लागू करते हुए दुर्ग के पारिवारिक न्यायालय को तत्काल प्रभाव से केस के तमाम रिकॉर्ड बेमेतरा भेजने के निर्देश दिए। इसके साथ ही बेमेतरा फैमिली कोर्ट को सख्त हिदायत जारी की गई है कि वे इस स्थानांतरित मामले को अपनी प्राथमिकता सूची में रखें।
अदालत ने आदेश दिया है कि दोनों पक्षों को पर्याप्त और उचित अवसर देते हुए अगले चार महीने के भीतर इस पूरे ट्रायल की प्रक्रिया को मुकम्मल कर अंतिम फैसला सुनाया जाए। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख से यह साफ हो गया है कि महिलाओं के पारिवारिक मामलों में अब कानूनी देरी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस फैसले का समाज और भावी मुकदमों पर दूरगामी असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह ताजा फैसला राज्य में चल रहे हजारों अन्य वैवाहिक मुकदमों के लिए एक बड़ा नजीर साबित होगा। अक्सर देखा जाता है कि वैवाहिक विवादों में पुरुष पक्ष महिला को परेशान करने या उस पर मानसिक दबाव बनाने के उद्देश्य से अपने गृह जिले में मुकदमे दायर कर देता है।
इस फैसले के बाद अब ऐसी प्रवृत्तियों पर लगाम लगेगी। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि कानून महिलाओं को केवल कागजी अधिकार नहीं देता, बल्कि अदालतें उनके वास्तविक जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए भी पूरी तरह संवेदनशील और प्रतिबद्ध हैं।



