सहकारिता की आड़ में भूमि हड़पने का काला खेल: 21 साल तक ‘मुख्तारनामे’ का झूठा रोना रोकर वैध खरीदारों को प्रताड़ित करने वाली ‘उदया सोसायटी’ पर उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक तमाचा
कोर्ट फीस की चोरी से लेकर रंगदारी की साज़िश तक:उदया सोसायटी के अध्यक्ष भामरा और दलालों पर अब जेल जाने का मंडराया ख़तरा


रायपुर । सहकारिता का मुखौटा पहनकर भू-माफिया का घिनौना खेल खेलने वालों के ताबूत में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आखिरी कील ठोक दी है। सहकारिता का पावन मूल उद्देश्य जहां निर्बल और मध्यम वर्ग को संगठित कर उन्हें संबल देना है, वहीं राजधानी रायपुर की ‘उदया सहकारी गृह निर्माण संस्था मर्यादित‘ ने इस पवित्र सिद्धांत को अपनी काली करतूतों की ढाल बना लिया। इस समिति की बुनियाद और इसकी कार्यप्रणाली शुरू से ही एक बेहद शातिर, कपटी और कुत्सित मानसिकता की गवाही देती रही है।
इस तथाकथित समिति के मठाधीशों की गिद्ध दृष्टि शुरू से ही रायपुर के तेजी से विकसित होते क्षेत्रों की बहुमूल्य भूमियों पर टिकी थी। इनका पूरा ‘नेक्सस’ और ‘मोडस ऑपेरंडी’ यही रहा है कि दशकों पुराने किसी कथित समझौते या मुख्तारनामे (पावर ऑफ अटॉर्नी) के सड़े-गले कागजों को बक्से से निकाला जाए, जमीन की आसमान छूती कीमतों को देखकर लालच की लार टपकाई जाए, और फिर असली भूमिस्वामियों या वैध खरीदारों को अदालती मुकदमों के मकड़जाल में फंसाकर दशकों तक प्रताड़ित किया जाए। इनका मकसद साफ और खौफनाक था ,न्यायालयीन पेचीदगियों का डर दिखाकर करोड़ों की जमीनों पर या तो खुद कब्ज़ा जमा लिया जाए, या फिर पर्दे के पीछे से पीड़ित पक्षों को डरा-धमकाकर मोटी रकम की अवैध उगाही (जबरन समझौता) की जाए।
लेकिन इस बार उदया सोसायटी का यह आत्मघाती दांव उन्हीं के गले की फांस बन गया है। माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के न्यायाधीश बिभु दत्त गुरु ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए उदया सोसायटी की द्वितीय अपील (SA No. 274 of 2017) को प्रारंभिक सुनवाई के चरण में ही पूरी तरह से निरस्त (Dismiss) कर दिया। न्यायालय के इस रुख से जहां पीड़ितों को 21 साल के लंबे संघर्ष के बाद न्याय की संजीवनी मिली है, वहीं सहकारिता के नाम पर जमीनों की दलाली करने वाले उदया सोसायटी के मठाधीशों, अध्यक्ष और बिचौलियों के खेमे में हड़कंप मच गया है।
मामला हीरापुर क्षेत्र के खसरा नंबर 626 (1.15 एकड़) और 627 (2.62 एकड़) कुल 3.77 एकड़ बेशकीमती भूमि का है, जिस पर सोसायटी साल 1984 की एक कथित पंजीकृत जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी के दम पर नाजायज मालिकाना हक जता रही थी। सोसायटी की बदनीयती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साल 2005 में मूल किसान भूमिस्वामियों बुधराम साहू, रामदयाल साहू और चमरीन बाई साहू द्वारा जिन वैध क्रेताओं प्रदीप सिंह राजपूत और विजय कुमार पांडे के पक्ष में विधिवत पक्की रजिस्ट्रियां की गई थीं, सोसायटी ने उन्हें शून्य घोषित कराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन न्याय के मंदिर में उनका यह लालची चक्रव्यूह ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
उच्च न्यायालय के इस विस्तृत फैसले ने उदया सोसायटी के अध्यक्ष जगदीश सिंह भामरा और उनके सहयोगियों के उन तमाम झूठों का सरेआम चीरहरण कर दिया है, जिनके दम पर वे अब तक सीनाजोरी कर रहे थे। अदालत ने अत्यंत कड़े शब्दों में रेखांकित किया कि उदया सोसायटी के पास इस विवादित भूमि का कोई स्वतंत्र मालिकाना हक (Independent Title) कभी था ही नहीं।
सोसायटी का सबसे शर्मनाक झूठ तब पकड़ा गया जब न्यायालय ने उनके खुद के ही वाद-पत्र (Plaint) का पोस्टमार्टम किया। अदालत के सामने उदया सोसायटी लगातार यह खोखला दंभ भरती रही कि भूमि का वास्तविक भौतिक कब्जा उनके पास है। लेकिन जब न्यायालय ने उनके ही दस्तावेजों की अनुसूची ‘A’ को खंगाला, तो उसमें साफ दर्ज था कि कब्जा तो उनके द्वारा आवंटित सदस्यों के पास है। इस गंभीर विरोधाभास और सफेद झूठ को पकड़ते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि जब मुकदमा दायर करने की तिथि पर भी सोसायटी का मौके पर कोई वजूद या कब्जा था ही नहीं, तो वे सिर्फ डिक्लेरेशन का केस कैसे लगा सकते हैं? विशिष्ट राहत अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 34 के तहत उदया सोसायटी का यह पूरा मुकदमा कानूनन पूरी तरह वर्जित और कूड़ेदान में फेंकने योग्य था।
इस महा-खुलासे में एक और घिनौना मोड़ तब आया, जब यह साफ हुआ कि उदया सोसायटी ने करोड़ों रुपये की इस मूल्यवान संपत्ति के लेन-देन से जुड़े मुकदमे का मूल्यांकन बेहद ‘नाममात्र की राशि’ पर किया था। कानून के जानकारों का कहना है कि ऐसा केवल इसलिए किया गया ताकि सरकार को दी जाने वाली भारी-भरकम अदालती फीस (Court Fees) की चोरी की जा सके और बेहद कम खर्च में वैध भूमि स्वामियों को अंतहीन मुकदमों में फंसाकर मानसिक रूप से लहूलुहान किया जा सके।
आपको बता दे कि अदालत ने इसे एक “फर्जी और दिखावटी मुकदमा” (Sham Litigation) करार दिया जो न्यायालयों का कीमती समय बर्बाद करने के लिए रचा गया था। उदया सोसायटी की इस पराजय का सिलसिला देखिए ,वे लगातार तीन अदालतों में मुंह की खा चुके हैं। सबसे पहले साल 2011 में व्यवहार न्यायालय (Trial Court) ने उनके दावे को खारिज किया। इसके बाद साल 2017 में प्रथम अपीलीय न्यायालय (8th ADJ रायपुर) ने भी उनकी दलीलों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। और अब, 01 मई 2026 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने उनकी द्वितीय अपील को प्रारंभिक चरण में ही निरस्त करके उनकी कानूनी गुंडागर्दी के खेल का ‘द एंड’ कर दिया है।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब पासा पूरी तरह पलट चुका है। अब तक रक्षात्मक मुद्रा में रहे पीड़ित भू-स्वामी प्रदीप सिंह राजपूत और विजय कुमार पांडे अब आक्रामक रणबांकुरे की तरह उदया सोसायटी के पदाधिकारियों को सीधे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने की विधिक तैयारी में हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस अंतिम फैसले के प्रकाश में पीड़ित पक्ष सोसायटी के पदाधिकारियों के खिलाफ निम्नलिखित गंभीर आपराधिक मामले दर्ज कराने जा रहे हैं:-
1) अपराधिक अतिचार और अवैध हस्तक्षेप (धारा 441/447): चूंकि उच्च न्यायालय ने माना है कि सोसायटी का कभी कब्जा नहीं था, इसलिए अब यदि सोसायटी का कोई भी कारिंदा जमीन पर कदम रखता है या काम रोकता है, तो उनके खिलाफ तत्काल गैर-जमानती धाराओं में FIR दर्ज होगी।
2) न्यायालय को गुमराह करना और जालसाजी (धारा 193/209/420): न्यायालय में झूठे दावे और विरोधाभासी बयान देकर 21 साल तक न्यायिक प्रक्रिया का गला घोंटने और धोखाधड़ी करने के आरोप में पूरी कार्यकारिणी पर सख्त आपराधिक केस दर्ज होगा।
3) अवैध उगाही और जबरन वसूली का प्रयास (धारा 384/506): उच्च न्यायालय से हारने के बाद भी यदि गुप्त रिकॉर्डिंग्स के अनुसार समझौते के नाम पर पैसों का अनुचित दबाव बनाया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर रंगदारी का मामला है।
उच्च न्यायालय के इस तमाचे के बाद अब सीधे तौर पर उदया सोसायटी के प्रबंधन और उनके अध्यक्ष जगदीश सिंह भामरा पर उंगलियां उठ रही हैं। समाज और सहकारिता विभाग के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा है कि पिछले 21 सालों से लगातार हर अदालत में मुंह की खाने के बावजूद, किसके निजी स्वार्थ के लिए यह केस लड़ा जा रहा था? इस बेबुनियाद केस की पैरवी में, नामी वकीलों की फौज खड़ी करने में और अदालती ऐश-ओ-आराम में समिति के मासूम सदस्यों की गाढ़ी कमाई का लाखों-करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा दिया गया, जिसका हिसाब आज तक किसी ऑडिट में नहीं दिया गया। यह सीधे-सीधे वित्तीय गबन का मामला है।
अब गेंद शासन और स्थानीय प्रशासन के पाले में है। राजस्व अधिकारियों (तहसीलदार/एसडीएम) को चाहिए कि वे उदया सोसायटी द्वारा पैदा की गई तमाम अवैध बाधाओं को तत्काल ध्वस्त कर वैध खरीदारों के रिकॉर्ड दुरुस्त करें। वहीं, सहकारिता विभाग के पंजीयक को तुरंत इस संस्था के वित्तीय खातों की उच्चस्तरीय फॉरेंसिक जांच करवाकर उन पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करानी चाहिए, जिन्होंने संस्था के धन का दुरुपयोग करके अपनी व्यक्तिगत सनक और भू-माफिया वाले चरित्र के लिए 21 साल तक यह छद्म युद्ध चलाया। जनता अब इस समिति के काले कारनामों को समझ चुकी है, और उच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक डंडे ने यह साबित कर दिया है कि भू-माफिया चाहे कितना भी रसूखदार हो, कानून के शिकंजे से बच नहीं सकता।




अच्छी खबर बनाई है। बिल्कुल सच्ची बात।