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अबूझमाड़ में बदली तस्वीर, जहां कभी नक्सलियों का खौफ था वहां शान से लहराया तिरंगा, स्वतंत्रता दिवस पर दिखा नए बस्तर का चेहरा

अबूझमाड़ में कभी नक्सली खौफ था, आज तिरंगा शान से लहरा रहा है। स्वतंत्रता दिवस पर बदले बस्तर की तस्वीर सामने आई।







15 August 2026 | Raipur: छत्तीसगढ़ के बस्तर में इस बार स्वतंत्रता दिवस सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि लंबे समय तक हिंसा और नक्सली प्रभाव से जूझते रहे इलाकों में बदलती तस्वीर का प्रतीक बन गया है। अबूझमाड़ के उन हिस्सों में तिरंगा शान से लहराता नजर आ रहा है, जहां कभी राष्ट्रीय पर्व मनाना भी ग्रामीणों के लिए आसान नहीं था।

अबूझमाड़ लंबे समय तक देश के सबसे दुर्गम और नक्सल प्रभावित इलाकों में गिना जाता रहा। घने जंगल, पहाड़ी रास्ते, सीमित सड़क संपर्क और सरकारी पहुंच की कमी ने इस इलाके को बाकी बस्तर से अलग-थलग रखा था।

यह वही इलाका है जिसे कभी माओवादियों के प्रभाव वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता था। यहां सुरक्षा बलों की आवाजाही और सरकारी गतिविधियां भी बड़ी चुनौती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा अभियान, सड़क निर्माण और प्रशासनिक पहुंच बढ़ने के साथ हालात तेजी से बदले हैं।

अब तस्वीर में सबसे बड़ा बदलाव तिरंगे का दिखाई दे रहा है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन इलाकों में भी राष्ट्रीय ध्वज फहराया जा रहा है जहां लंबे समय तक नक्सली प्रभाव के कारण राष्ट्रीय पर्व के सार्वजनिक आयोजन सीमित रहे थे।

अबूझमाड़ को अक्टूबर 2025 में माओवाद से मुक्त घोषित किए जाने के बाद इलाके में प्रशासनिक और विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाने की कोशिश तेज हुई। राज्य सरकार ने भी उत्तर बस्तर और अबूझमाड़ को नक्सलमुक्त होने को क्षेत्र में शांति और विकास के नए दौर की शुरुआत बताया था।

इस बदलाव का असर सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। जिन इलाकों में कभी सड़क और सरकारी संस्थानों की पहुंच बड़ी चुनौती थी, वहां अब सड़क संपर्क, मोबाइल नेटवर्क, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रशासनिक उपस्थिति को बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

अबूझमाड़ करीब 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैला बड़ा वन क्षेत्र है और इसका विस्तार नारायणपुर, बीजापुर तथा दंतेवाड़ा जिलों तक माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण पहाड़ी और वन क्षेत्रों में रहते हैं, जिनका बाहरी दुनिया से संपर्क लंबे समय तक सीमित रहा।

यही वजह है कि इस क्षेत्र में तिरंगा फहराने की तस्वीर को केवल एक कार्यक्रम के तौर पर नहीं देखा जा रहा। यह उस बदलाव का संकेत है जिसमें कभी डर के साए में रहने वाले ग्रामीण अब सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय पर्व में हिस्सा लेते नजर आ रहे हैं।

इस साल बस्तर में तिरंगा यात्रा भी खास चर्चा में रही। 12 से 14 अगस्त के दौरान प्रस्तावित यात्रा नारायणपुर से शुरू होकर दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर होते हुए कर्रेगुट्टा क्षेत्र तक पहुंची। इस दौरान स्थानीय लोगों, युवाओं, जनप्रतिनिधियों और सुरक्षा बलों की भागीदारी के साथ राष्ट्रगान, ध्वजारोहण और शहीदों को श्रद्धांजलि जैसे कार्यक्रम रखे गए।

अबूझमाड़ के संदर्भ में इस यात्रा का संदेश और बड़ा माना जा रहा है। लंबे समय तक जिस इलाके को सुरक्षा चुनौतियों और नक्सली प्रभाव के लिए जाना जाता था, वहां राष्ट्रीय ध्वज के साथ सार्वजनिक आयोजन होना प्रशासन और स्थानीय समाज के बीच बढ़ते संपर्क को दिखाता है।

इससे पहले जनवरी 2026 में भी बस्तर के कई नक्सल प्रभावित गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया था। बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा के 41 गांवों में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए थे।

उस समय कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर भी पहली बार तिरंगा फहराया गया था। यह पहाड़ी लंबे समय तक माओवादियों के मजबूत गढ़ के रूप में पहचानी जाती रही थी और वहां सुरक्षा बलों के अभियान के बाद हालात में बड़ा बदलाव आया।

अब स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस बदलाव का दायरा और बढ़ता दिखाई दे रहा है। बस्तर के दूरस्थ इलाकों में तिरंगा यात्रा और ध्वजारोहण कार्यक्रमों के जरिए लोगों को लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

स्थानीय युवाओं की भूमिका भी इस बदलाव में अहम है। लंबे समय तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पैदा हुए युवाओं के सामने शिक्षा, रोजगार और बेहतर कनेक्टिविटी की सीमाएं रही हैं। अब प्रशासन की कोशिश है कि युवा पढ़ाई, रोजगार और skill development के जरिए आगे बढ़ें।

सड़क और मोबाइल नेटवर्क का विस्तार इस बदलाव का अहम हिस्सा है। जब किसी गांव तक सड़क पहुंचती है तो सिर्फ आवाजाही आसान नहीं होती, बल्कि स्कूल, अस्पताल, बाजार और सरकारी योजनाओं तक पहुंच भी बेहतर होती है।

अबूझमाड़ में विकास का रास्ता आसान नहीं है। भौगोलिक परिस्थितियां बेहद कठिन हैं और घने जंगलों के बीच बिखरे गांवों तक infrastructure पहुंचाना सामान्य इलाकों की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

फिर भी पिछले कुछ समय में प्रशासनिक पहुंच बढ़ने से लोगों के सामने नए अवसर खुलने लगे हैं। revenue survey जैसी प्रक्रिया भी पहली बार आगे बढ़ रही है, जो लंबे समय तक सरकारी रिकॉर्ड और सर्वेक्षण से बाहर रहे इस क्षेत्र के लिए बड़ा बदलाव है।

ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सरकारी तंत्र की मौजूदगी पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई दे रही है। सुरक्षा कैंपों के साथ विकास कार्यों को जोड़ने की रणनीति से सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में काम आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

बस्तर में नक्सल हिंसा के दौरान सुरक्षा बलों और ग्रामीणों दोनों ने लंबे समय तक नुकसान झेला है। इसलिए राष्ट्रीय पर्व के मौके पर शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देना भी इन आयोजनों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना है।

तिरंगे के साथ होने वाले कार्यक्रमों में स्थानीय संस्कृति को भी जगह देने की कोशिश की जा रही है। आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान और राष्ट्रीय एकता को साथ लेकर चलने का संदेश इन आयोजनों के जरिए दिया जा रहा है।

इस पूरे बदलाव का एक सामाजिक पहलू भी है। जब कोई गांव पहली बार स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का आयोजन सार्वजनिक रूप से करता है तो वहां के बच्चों के लिए यह अनुभव सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रहता, बल्कि देश से अपने जुड़ाव का नया अनुभव बनता है।

स्कूलों में ध्वजारोहण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से बच्चों को राष्ट्रीय पर्वों के बारे में जानने का मौका मिलता है। जिन इलाकों में कभी स्कूलों तक पहुंच ही बड़ी चुनौती थी, वहां ऐसी गतिविधियां सामान्य जीवन की वापसी का संकेत देती हैं।

बस्तर में पूर्व माओवादियों को भी मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। स्वतंत्रता दिवस से पहले पुलिस और आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व माओवादियों के बीच बैठक की खबर भी सामने आई, जिसमें उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से राष्ट्रीय पर्व मनाने की अपील की गई।

यह बदलाव बताता है कि सुरक्षा अभियान के साथ rehabilitation और social reintegration भी महत्वपूर्ण है। बंदूक छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने वाले लोगों के लिए रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की राह बनाना लंबे समय की शांति के लिए जरूरी माना जाता है।

बस्तर में शांति का मतलब सिर्फ नक्सली हिंसा का कम होना नहीं है। वास्तविक बदलाव तब माना जाएगा जब ग्रामीण बिना डर के खेतों में काम कर सकें, बच्चे नियमित स्कूल जा सकें, मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकें और युवाओं को रोजगार के अवसर मिलें।

अबूझमाड़ में तिरंगे की मौजूदगी इसी बड़े बदलाव की तस्वीर का एक हिस्सा है। यह तस्वीर बताती है कि सुरक्षा और विकास की प्रक्रिया के साथ सार्वजनिक जीवन भी धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है।

हालांकि चुनौतियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। इतने बड़े और कठिन भौगोलिक क्षेत्र में विकास का infrastructure तैयार करने और उसे लगातार बनाए रखने के लिए लंबे समय तक प्रशासनिक मौजूदगी और स्थानीय भागीदारी की जरूरत होगी।

स्थानीय लोगों का भरोसा इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। ग्रामीण अगर विकास कार्यों में भागीदारी करते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे उन तक पहुंचता है तो क्षेत्र में स्थायी बदलाव की संभावना मजबूत होती है।

अबूझमाड़ का इतिहास देश के बाकी हिस्सों से अलग रहा है। लंबे समय तक यहां बाहरी लोगों की पहुंच सीमित रही और क्षेत्र के बड़े हिस्से का सर्वेक्षण भी नहीं हो पाया था।

आज उसी क्षेत्र में तिरंगा यात्रा और स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम नई कहानी लिख रहे हैं। एक ऐसा इलाका जिसे कभी नक्सली प्रभाव के कारण खबरों में जगह मिलती थी, अब वहां शांति, विकास और राष्ट्रीय पर्वों की तस्वीरें सामने आ रही हैं।

बस्तर के लिए यह बदलाव भावनात्मक भी है और प्रशासनिक भी। जिन परिवारों ने हिंसा का दौर देखा है, उनके लिए सामान्य जीवन की वापसी सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

स्वतंत्रता दिवस पर अबूझमाड़ में तिरंगा फहरना इसी उम्मीद को मजबूत करता है कि लोकतंत्र की पहुंच देश के सबसे दूरस्थ इलाकों तक भी हो सकती है। तिरंगे की यह तस्वीर केवल आज के समारोह की नहीं, बल्कि उस बदलाव की कहानी है जिसमें बस्तर धीरे-धीरे डर की पहचान से बाहर निकलकर विकास और शांति की ओर बढ़ रहा है।

अब आने वाले वर्षों में इस बदलाव को जमीन पर मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य, रोजगार और स्थानीय प्रशासन की मजबूत मौजूदगी ही यह तय करेगी कि आज दिखाई दे रहा बदलाव स्थायी शांति और बेहतर जीवन में कितना बदलता है।

15 अगस्त 2026 का अबूझमाड़ इसलिए भी खास है क्योंकि यहां तिरंगा सिर्फ एक ध्वज नहीं, बल्कि बदलते माहौल का प्रतीक बनकर सामने आया है। जिस इलाके में कभी राष्ट्रीय पर्व मनाने को लेकर डर और असुरक्षा की चर्चा होती थी, वहां आज देश की आजादी का पर्व खुले माहौल में मनाने की तस्वीर सामने आ रही है।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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