छत्तीसगढ़ में अनुकंपा नियुक्ति का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर: सरकारी नौकरी वाली पत्नी की बात छुपाकर क्लर्क बना नरेंद्र वैष्णव बर्खास्त, दोषी अफसरों पर भी गिरेगी गाज
छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर अनुकंपा नियुक्ति हासिल करने वाले सहायक ग्रेड-3 नरेंद्र कुमार वैष्णव को जिला शिक्षा अधिकारी ने बर्खास्त कर दिया है। पत्नी के पहले से सरकारी सेवा में होने की जानकारी छुपाकर फर्जी तरीके से नौकरी पाने वाले इस कर्मचारी से अब तक मिले लाखों रुपये के वेतन की वसूली की तैयारी की जा रही है, साथ ही साठगांठ करने वाले तत्कालीन जांच अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

इस बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के बाद से पूरे शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। बर्खास्त किए गए कर्मचारी का नाम नरेंद्र कुमार वैष्णव है, जो बिलासपुर जिले के बिल्हा विकासखंड के अंतर्गत शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सेमरताल में सहायक ग्रेड-3 (क्लर्क) के पद पर पदस्थ था। नरेंद्र ने वर्ष 2021 में विभाग को गुमराह करके और अपनी वास्तविक पारिवारिक स्थिति को छुपाकर यह अनुकंपा नियुक्ति हासिल की थी।
शपारथ पत्र में छुपाया सच, पत्नी पहले से ही शासकीय सेवा में थी तैनात
पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब विभाग को नरेंद्र कुमार वैष्णव की नियुक्ति के संबंध में एक विस्तृत लिखित शिकायत प्राप्त हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नरेंद्र ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करते समय और दस्तावेज सत्यापन के दौरान इस बात को पूरी तरह छुपाया कि उसका परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर है। जांच टीम ने जब दस्तावेजों और नरेंद्र के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े रिकॉर्ड्स को खंगाला, तो सच सामने आ गया।
विभागीय जांच में यह अकाट्य रूप से साबित हुआ है कि नरेंद्र कुमार वैष्णव का विवाह 30 जनवरी 2020 को संपन्न हो चुका था। उसकी पत्नी मुंगेली जिले के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) में पहले से ही एक नियमित सरकारी कर्मचारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। नियमों के मुताबिक, विवाहित पुरुष के मामले में यदि उसकी पत्नी या परिवार का कोई भी अन्य आश्रित सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है, तो वह अनुकंपा नियुक्ति के लिए पूरी तरह से अयोग्य हो जाता है। नरेंद्र ने इस नियम को जानते हुए भी जानबूझकर विभाग से यह सच छुपाया और गलत तरीके से शासकीय सेवा में प्रवेश किया।
सामान्य प्रशासन विभाग के कड़े नियम और योग्यता के मापदंड
छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा अनुकंपा नियुक्ति को लेकर बेहद स्पष्ट और कड़े दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। इन नियमों को बनाने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शासकीय सेवक के असामयिक निधन के बाद उसके परिवार को तत्काल आर्थिक संबल मिल सके, जिससे उनका जीवनयापन सुचारू रूप से चल सके। यह नियम पूरी तरह से मानवीय और आर्थिक सहायता के सिद्धांत पर आधारित है।
सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों के तहत, यदि मृत शासकीय सेवक के परिवार का कोई भी सदस्य (जैसे पति, पत्नी, पुत्र या अविवाहित पुत्री) पहले से ही केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी भी सरकारी उपक्रम, निगम या निकाय में नियमित सेवा में कार्यरत है, तो उस परिवार के किसी भी अन्य सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता। नरेंद्र कुमार वैष्णव ने आवेदन के समय स्व-घोषणा पत्र और शपथ पत्र में अपनी पत्नी के शासकीय सेवा में होने की जानकारी को जानबूझकर छिपाया, जो कि कानूनी रूप से धोखाधड़ी और जालसाजी की श्रेणी में आता है।
लाखों रुपये के वेतन वसूली का संकट और राजकोष को लगी भारी चपत
नरेंद्र कुमार वैष्णव की सेवा समाप्ति का आदेश जारी होने के बाद अब शिक्षा विभाग के सामने एक और बड़ी तकनीकी और कानूनी चुनौती खड़ी हो गई है। वर्ष 2021 में नियुक्ति पाने के बाद से लेकर वर्ष 2026 में बर्खास्तगी की तारीख तक, नरेंद्र ने सहायक ग्रेड-3 के पद पर रहते हुए शासन से लाखों रुपये का वेतन और अन्य भत्ते प्राप्त किए हैं। फर्जी तरीके से नौकरी पाकर सरकारी खजाने से उठाए गए इस धन की रिकवरी कैसे की जाए, इसे लेकर विभागीय स्तर पर मंथन शुरू हो गया है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि यह नियुक्ति शुरुआत से ही अवैध और धोखाधड़ी पर आधारित थी, इसलिए शासन को इस अवधि के दौरान बांटे गए कुल वेतन की पाई-पाई वसूल करने का पूरा कानूनी अधिकार है। यदि आरोपी कर्मचारी स्वेच्छा से इस राशि को जमा नहीं करता है, तो विभाग उसकी व्यक्तिगत संपत्ति की कुर्की या भू-राजस्व की बकाया राशि की तरह वसूली की कड़क कार्रवाई कर सकता है। इस फर्जीवाड़े के कारण सीधे तौर पर शासन को भारी आर्थिक चपत लगी है, जिसकी भरपाई किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
दस्तावेज जांचने वाले अफसरों की संदिग्ध भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने केवल नरेंद्र कुमार वैष्णव की जालसाजी को ही उजागर नहीं किया है, बल्कि वर्ष 2021 में नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों का स्क्रूटनी (जांच) करने वाले अधिकारियों और बाबुओं की कार्यप्रणाली पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। विभाग के भीतर और आम जनता के बीच यह चर्चा बेहद तेज है कि आखिर इतनी बड़ी और स्पष्ट चूक जांच कमेटी की नजरों से कैसे बच गई।
सच्चाई यह है कि इस मामले की शिकायतें विभाग को काफी पहले भी मिली थीं, लेकिन विभाग के भीतर बैठे कुछ रसूखदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने आपसी साठगांठ करके उस फाइल को लंबे समय तक दबाकर रखा। यदि शुरुआती शिकायतों पर ही तुरंत संज्ञान लेकर जांच की गई होती, तो शासन के लाखों रुपये बर्बाद होने से बच जाते। अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों द्वारा यह मांग पुरजोर तरीके से उठाई जा रही है कि वर्ष 2021 में नरेंद्र की फाइल को हरी झंडी देने वाले और जांच में लापरवाही बरतने वाले तत्कालीन जिम्मेदार अफसरों और बाबुओं की भूमिका की भी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
फर्जीवाड़ा करने वालों के खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर सख्त संदेश
जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा की गई इस त्वरित और कड़ी कार्रवाई से उन लोगों को एक बेहद सख्त संदेश गया है जो गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी तंत्र में घुसने का प्रयास करते हैं। डीईओ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि नरेंद्र कुमार वैष्णव को अपनी बेगुनाही साबित करने और तथ्यों को सामने रखने का पूरा मौका दिया गया था, लेकिन उनकी ओर से प्रस्तुत किया गया स्पष्टीकरण और दस्तावेज पूरी तरह से असंतोषजनक और गुमराह करने वाले पाए गए।
इस मामले के सामने आने के बाद अब बिलासपुर संभाग सहित पूरे छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभागों में हाल के वर्षों में हुई अन्य अनुकंपा नियुक्तियों के दस्तावेजों की भी गुपचुप तरीके से री-वेरिफिकेशन (पुनः जांच) की मांग उठने लगी है। प्रशासन का मानना है कि अनुकंपा नियुक्ति जैसी संवेदनशील व्यवस्था में पारदर्शिता बेहद जरूरी है, ताकि किसी वास्तविक जरूरतमंद और पीड़ित परिवार का हक मारकर कोई जालसाज नौकरी न हथिया सके। आने वाले दिनों में इस मामले में शामिल रहे विभागीय अधिकारियों के खिलाफ भी अनुशासनात्मक या विभागीय जांच की गाज गिरना लगभग तय माना जा रहा है।



