मजबूत इरादों के आगे बौना हुआ शारीरिक कष्ट, महज 3 फीट के संजीव मजूमदार बने मिसाल, शिक्षा जगत में लहराया सफलता का परचम
शारीरिक चुनौतियों को दरकिनार कर असम के जोरहाट जिले के शिक्षक संजीव मजूमदार ने साबित किया है कि इंसान की वास्तविक पहचान उसके शारीरिक कद से नहीं बल्कि उसके कर्मों और बुलंद हौसलों से होती है, जिसके लिए उन्हें वर्ष 2025 के जिला स्तरीय सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है।

रायपुर, 05 जुलाई 2026: इंसान की दृढ़ इच्छाशक्ति और मजबूत इरादे किसी भी शारीरिक अक्षमता या सामाजिक रूढ़िवादिता के बंधनों के आगे कभी घुटने नहीं टेकते। अक्सर समाज में यह कहावत दोहराई जाती है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक ऊंचाई उसके शारीरिक कद से नहीं, बल्कि उसके कर्मों, विचारों और उसके भीतर छिपे अदम्य साहस से मापी जाती है।
इस प्रेरणादायक विचार को असम के जोरहाट जिले के तिताबर क्षेत्र में रहने वाले एक शिक्षक ने पूरी तरह चरितार्थ कर दिखाया है। हम बात कर रहे हैं महज तीन फीट शारीरिक लंबाई वाले संजीव मजूमदार की, जिन्होंने अपनी शारीरिक बनावट की चुनौती को कभी भी अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। अपने अद्वितीय साहस, अटूट आत्मविश्वास और शिक्षा के प्रति अटूट समर्पण के बल पर उन्होंने समाज के सामने आत्मसम्मान से जीने का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया है।
वर्तमान समय में संजीव मजूमदार असम के तिताबर स्थित श्रीमंत शंकर विद्यापीठ में एक कुशल सहायक शिक्षक के पद पर अपनी अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए अनूठे और उत्कृष्ट योगदानों को रेखांकित करते हुए सरकार और प्रशासन ने भी उन्हें पूरा सम्मान दिया है। यही कारण है कि शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2025 में उन्हें जोरहाट जिले के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से नवाजा गया, जो उनकी कड़ी मेहनत और अटूट लगन पर एक आधिकारिक मुहर लगाता है।
कठिन संघर्षों से भरा रहा सरकारी नौकरी की शुरुआत का सफर
एक दिव्यांग व्यक्ति के लिए समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर सम्मानजनक स्थान पाना कभी भी आसान नहीं होता। संजीव मजूमदार के लिए भी एक सरकारी शिक्षक के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने का यह सफर बेहद उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरा रहा था। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए संजीव बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 2008 में शिक्षा विभाग के अंतर्गत सहायक शिक्षक के रूप में अपने सेवाकाल की विधिवत शुरुआत की थी। शुरुआती दौर में उनकी पहली आधिकारिक पोस्टिंग मुख्य जोरहाट शहर के एक विद्यालय में की गई थी।
चूंकि उनका गृहनिवास तिताबर क्षेत्र में स्थित था, इसलिए शारीरिक अक्षमता के कारण उनके लिए प्रतिदिन जोरहाट तक की लंबी और थकाऊ दूरी तय करना एक अत्यंत दुरूह कार्य बन चुका था। सार्वजनिक वाहनों में चढ़ने-उतरने और यात्रा करने में उन्हें भारी शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़ता था। इस कठिन परिस्थिति को देखते हुए वर्ष 2015 में उनके जीवन में एक बड़ा सकारात्मक मोड़ आया। उनके स्वास्थ्य और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनका तबादला तिताबर के श्रीमंत शंकर विद्यापीठ में कर दिया गया।
प्रशासनिक संवेदनशीलता ने बदली संजीव की जिंदगी की राह
संजीव मजूमदार के इस कठिन दौर में प्रशासनिक संवेदनशीलता ने एक संजीवनी का काम किया। संजीव के गृहक्षेत्र के पास तबादला करवाने में जोरहाट के तत्कालीन उपायुक्त विशाल बसंत सोलंकी ने एक बेहद मानवीय और अनुकरणीय भूमिका निभाई थी। उन्होंने संजीव की शारीरिक स्थिति को गंभीरता से समझते हुए नियमों के दायरे में रहकर उनकी नियुक्ति को उनके घर से महज एक किलोमीटर दूर स्थित विद्यालय में स्थानांतरित करने में महत्वपूर्ण मदद की थी।
इस विभागीय सहयोग के बाद संजीव का दैनिक जीवन काफी सुगम हो गया और वे अपनी पूरी ऊर्जा बच्चों को पढ़ाने में लगाने लगे। शिक्षक के रूप में अपनी 18 वर्षों की लंबी सेवा के सफर पर प्रकाश डालते हुए संजीव मजूमदार भावुक होकर कहते हैं कि इन वर्षों के दौरान उन्होंने सामाजिक और पेशेवर जीवन में कई अच्छे और कड़वे अनुभवों का सामना किया है। लेकिन विद्यालय के मासूम बच्चों के बीच रहकर उन्हें जो असीम आनंद और मानसिक संतोष मिलता है, वह उनके जीवन का सबसे सुंदर और अनमोल समय बन चुका है।
जब कक्षा में बेंच पर खड़े होकर ज्ञान की अलख जगाते हैं गुरुजी
हर दिन जब संजीव मजूमदार अपने छोटे कद के साथ स्कूल परिसर में दाखिल होते हैं, तो वे अपने कंधों पर केवल किताबों का थैला ही नहीं उठाते, बल्कि देश के भविष्य की उम्मीदों और आकांक्षाओं का एक विशाल बोझ भी लेकर चलते हैं। क्लासरूम के भीतर ब्लैकबोर्ड की ऊंचाई और बच्चों के बैठने के स्तर के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए संजीव को एक अनोखा तरीका अपनाना पड़ता है। अपनी कम लंबाई के कारण वे कक्षा में रखी बेंच पर खड़े होकर बच्चों को पढ़ाते हैं।
बेंच पर खड़े होकर पढ़ाने की इस प्रक्रिया में न तो संजीव के मन में किसी प्रकार का कोई संकोच या झिझक होती है और न ही उनके छात्र उन्हें किसी अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। विद्यालय के छात्रों और अन्य स्टाफ के लिए संजीव का यह स्वरूप किसी कमजोरी का प्रतीक नहीं, बल्कि उनके कड़े जीवन संघर्ष और अद्वितीय आत्मविश्वास की सबसे बड़ी और गौरवमयी पहचान बन चुका है। छात्र उनकी बातों को बेहद ध्यान से सुनते हैं और उनका पूरा सम्मान करते हैं।
मिड-डे मील से लेकर स्कूल की साफ-सफाई तक हर जिम्मेदारी में आगे
संजीव मजूमदार की विशेषता केवल कक्षा के भीतर पाठ्यपुस्तकों को पढ़ाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे विद्यालय की हर छोटी-बड़ी गतिविधियों और व्यवस्थाओं में एक सामान्य व्यक्ति से भी बढ़कर सक्रिय भूमिका निभाते हैं। विद्यालय के प्रशासनिक और व्यावहारिक कार्यों जैसे कि परिसर की नियमित साफ-सफाई की निगरानी करना और बच्चों के लिए बनने वाले मिड-डे मील की गुणवत्ता व वितरण व्यवस्था को सुचारू रूप से संभालना, उनकी दैनिक दिनचर्या का एक अहम हिस्सा है।
श्रीमंत शंकर विद्यापीठ के अन्य सहकर्मियों और शिक्षकों का संजीव के प्रति अगाध विश्वास है। उनके सहयोगियों के अनुसार संजीव विद्यालय के सबसे जिम्मेदार, निष्ठावान और भरोसेमंद स्तंभों में से एक हैं। किसी भी विपरीत परिस्थिति में स्कूल प्रबंधन आंख मूंदकर संजीव पर भरोसा कर सकता है क्योंकि वे अपने काम को एक बोझ न मानकर पूरी निष्ठा के साथ पूरा करते हैं।
बेस्ट टीचर अवॉर्ड ने दिया संजीव को जीवन का सबसे अनमोल उपहार
अपनी विविध और कठिन जिम्मेदारियों को हंसते-हंसते निभाने के संबंध में संजीव का मानना है कि कर्म ही पूजा है। वे कहते हैं कि मैं स्कूल में केवल हाजिरी लगाने नहीं आता, बल्कि मैं बच्चों के भोजन की व्यवस्था को व्यक्तिगत रूप से देखता हूं, साफ-सफाई सुनिश्चित करवाता हूं और प्रशासनिक स्तर पर जो भी कागजी कार्य होते हैं, उनमें भी अपना पूरा सहयोग देता हूं।
इन्हीं निस्वार्थ सेवाओं का प्रतिफल उन्हें वर्ष 2025 में मिला जब शिक्षा विभाग ने उन्हें जोरहाट जिले का बेस्ट टीचर अवॉर्ड प्रदान किया। इस ऐतिहासिक और गौरवशाली क्षण को याद करते हुए संजीव कहते हैं कि यह पुरस्कार मिलना उनके संपूर्ण जीवन का सबसे यादगार और भावुक कर देने वाला पल था, जिसने समाज में उनके संघर्षों को एक नई और सम्मानजनक पहचान दी।
स्कूल की चारदीवारी के बाहर भी समाजसेवा को बनाया जीवन का लक्ष्य
संजीव मजूमदार का व्यक्तित्व केवल एक सरकारी कर्मचारी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकलकर भी समाज को बेहतर बनाने में अपना योगदान देते हैं। वे तिताबर और उसके आसपास के क्षेत्रों में आयोजित होने वाले विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और धर्मार्थ कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। समाज के गरीब और असहाय लोगों की मदद के लिए वे आर्थिक और शारीरिक रूप से हमेशा तत्पर रहते हैं।
इसके साथ ही अपने घरेलू जीवन में भी संजीव एक आदर्श बेटे की भूमिका निभा रहे हैं। वे घर पर अपनी वृद्ध मां के साथ रसोई के कार्यों और अन्य घरेलू साफ-सफाई में पूरा हाथ बंटाते हैं। उनका एक स्पष्ट और प्रेरणादायक संदेश है कि इस संसार में कोई भी वैध काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि काम के प्रति आपकी नीयत और सोच ही उसे बड़ा बनाती है।
शिक्षण को मानते हैं राष्ट्र निर्माण और समाज सुधार का एक पवित्र मिशन
संजीव के लिए अध्यापन का यह पेशा केवल मासिक वेतन प्राप्त करने का जरिया या कोई साधारण नौकरी नहीं है, बल्कि वे इसे समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण का एक अत्यंत पवित्र मिशन मानते हैं। वे स्कूल की तय समयावधि समाप्त होने के बाद भी अपने स्तर पर गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
इसके अलावा बच्चों के भीतर प्रतिस्पर्धा की भावना और पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए संजीव मजूमदार हर साल अपने निजी खर्च और वेतन के एक हिस्से से मेधावी विद्यार्थियों को नकद पुरस्कार और शैक्षिक सामग्री देकर प्रोत्साहित करते हैं। उनका यह प्रयास ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के लिए एक बहुत बड़ा संबल साबित हो रहा है।
लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई के बाद हासिल की सरकारी नौकरी
आज संजीव जिस मुकाम पर खड़े हैं, वहां तक पहुंचने की राह कांटों से भरी हुई थी। शारीरिक दिव्यांगता के कारण शुरुआत में उन्हें सरकारी तंत्र और प्रशासनिक बाधाओं का भी सामना करना पड़ा था। उन्हें अपने अधिकारों और शिक्षक बनने की पात्रता को साबित करने के लिए एक लंबी विभागीय और कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी।
इस मानसिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान भी उन्होंने कभी भी अपने हौसलों को डगमगाने नहीं दिया और न ही कभी निराशा के गर्त में डूबे। अपनी अटूट मेहनत, तीक्ष्ण बुद्धि और अडिग इच्छाशक्ति के बल पर आखिरकार उन्होंने वह प्रतिष्ठित मुकाम हासिल कर ही लिया, जिसकी कल्पना कभी उनके आसपास के लोग भी नहीं कर पाते थे।
घर से 30 किलोमीटर दूर जाकर सात सालों तक दी कठिन सेवाएं
सरकारी सेवा में चयन होने के बाद भी संजीव को कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं दिया गया था। उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्य पथ को चुना और स्वेच्छा से अपने घर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चारीगांव के एक सुदूर ग्रामीण विद्यालय में अपनी प्रारंभिक सेवाएं देना स्वीकार किया।
लगातार सात वर्षों तक संजीव ने भीषण गर्मी, बरसात और परिवहन की भारी कमी जैसी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी रोजाना 60 किलोमीटर की अप-डाउन यात्रा तय की और बच्चों के भविष्य को संवारते रहे। उनकी इसी कठिन तपस्या और शारीरिक कष्टों को देखते हुए ही बाद में प्रशासन ने उनका तबादला गृहक्षेत्र के पास किया था। संजीव न केवल एक शिक्षक हैं, बल्कि वे नागरिक प्रशासन द्वारा सौंपे गए अन्य राष्ट्रीय कार्यों को भी उतनी ही शिद्दत से पूरा करते हैं।
चार बार चुनाव ड्यूटी निभाकर पेश की सच्ची देशभक्ति की मिसाल
सच्ची राष्ट्रभक्ति का उदाहरण पेश करते हुए संजीव मजूमदार देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी अपना अमूल्य योगदान देते हैं। वे गर्व से कहते हैं कि मेरा जन्म समाज और देश की सेवा के लिए ही हुआ है और मैं जहां भी जाता हूं, लोग मेरी कार्यक्षमता को देखकर मुझे नई जिम्मेदारियां सौंप देते हैं। स्नातक स्तर तक शिक्षित संजीव को प्रशासन द्वारा बेहद संवेदनशील मानी जाने वाली चुनाव ड्यूटी की जिम्मेदारी भी सौंपी जाती रही है।
अब तक वे पूरी ईमानदारी के साथ चार बड़े चुनावों में मतदान अधिकारी के रूप में अपनी सफल ड्यूटी निभा चुके हैं। इस राष्ट्रीय कार्य के लिए उनकी प्रशासन से सिर्फ एक ही मानवीय शर्त होती है कि उनकी विशेष शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें मतदान केंद्र तक आने-जाने के लिए एक निजी या सरकारी वाहन की सुविधा प्रदान की जाए।
वे आगे कहते हैं कि आज के दौर में जहां कई शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ सरकारी कर्मचारी चुनाव ड्यूटी और अन्य अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों से बचने के लिए तरह-तरह के मेडिकल बहाने बनाते हैं, वहीं मैंने अपने जीवन में कभी भी किसी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। मैं हमेशा देश और समाज के काम को अपनी पहली प्राथमिकता मानता हूं और उसे सहर्ष पूरा करता हूं। संजीव मजूमदार की यह अद्वितीय जीवन गाथा आज देश के करोड़ों युवाओं और शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों के लिए प्रेरणा का एक महासागर है।



