बालोद वन अपराध: स्कूल परिसर में पर्यावरण की क्रूर हत्या, शाला प्रबंधन ने बिना अनुमति काट डाले 28 हरे-भरे पेड़, हेडमास्टर पर निलंबन की तलवार
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में सरकारी तंत्र और पर्यावरण संरक्षण नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। गुरुर ब्लॉक के ग्राम बड़भूम में शासकीय स्कूल परिसर के भीतर लगे 28 विशाल और हरे-भरे पेड़ों को बिना किसी प्रशासनिक या विभागीय अनुमति के अवैध रूप से काट दिया गया है। शाला प्रबंधन समिति के डंगाल छंटाई के प्रस्ताव की आड़ में पूरे पेड़ों को जमींदोज कर दिया गया और उसकी बेशकीमती लकड़ी को बेचने का भी प्रयास किया गया। इस महाघोटाले के उजागर होने के बाद ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ), पटवारी और राजस्व अमले ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है, जिससे पूरे शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।

यहां स्कूल के प्रांगण को हरा-भरा रखने वाले करीब 28 विशालकाय और जीवित पेड़ों को रातों-रात आधुनिक मशीनों की मदद से काटकर धराशायी कर दिया गया। इस अवैध कटाई की भनक न तो वन विभाग को लगने दी गई और न ही शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी पूर्व सूचना दी गई।
सुरक्षा के नाम पर पारित प्रस्ताव की आड़ में रची गई घिनौनी साजिश
इस पूरे अवैध कांड के पीछे एक सोची-समझी प्रशासनिक साजिश नजर आ रही है। स्थानीय स्तर पर की गई शुरुआती छानबीन में यह बात सामने आई है कि शासकीय माध्यमिक शाला बड़भूम की शाला प्रबंधन समिति (एसएमसी) द्वारा कुछ समय पूर्व एक प्रस्ताव पारित किया गया था। इस लिखित प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि आगामी वर्षा ऋतु को देखते हुए और स्कूली छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के मद्देनजर परिसर के पेड़ों की केवल सूखी हुई या खतरनाक ढंग से झुकी हुई डालियों (डंगालों) की छंटाई की जाएगी।
यह छंटाई इसलिए जरूरी बताई गई थी ताकि तेज आंधी या बारिश के दौरान कोई अप्रिय घटना स्कूल परिसर में न घटे। लेकिन स्कूल प्रशासन और स्थानीय जिम्मेदारों ने इस जनहितैषी प्रस्ताव का दुरुपयोग अपने निजी स्वार्थ के लिए कर डाला। डालियां काटने के बहाने शाला प्रबंधन ने कटर मशीनों का इंतजाम किया और देखते ही देखते 28 फलदार और छायादार हरे-भरे पेड़ों का नामोनिशान मिटा दिया।
शासकीय संपत्ति की सरेआम चोरी, आश्रम को बेची गई कीमती लकड़ियां
भारतीय कानून के तहत किसी भी सरकारी भूमि, स्कूल, अस्पताल या कार्यालय परिसर में लगे हुए पेड़ पूर्णतः शासकीय संपत्ति के दायरे में आते हैं। इन पेड़ों की छंटाई या कटाई के लिए वन विभाग से बकायदा मूल्यांकन कराना होता है, राजस्व विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना होता है और शिक्षा विभाग के सक्षम जिला स्तरीय अधिकारी से अंतिम लिखित स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
बड़भूम स्कूल के मामले में इन सभी स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। इतना ही नहीं, पेड़ों को काटने के बाद उनकी कीमती लकड़ियों के तनों और बोटों को चोरी-छिपे ठिकाने लगाने का काम भी शुरू कर दिया गया। स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इन अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की लकड़ियों को पास ही स्थित प्री-मैट्रिक बालक आश्रम बड़भूम परिसर में लाकर रख दिया गया और इन्हें अवैध रूप से बेच दिए जाने की भी पुख्ता जानकारी सामने आ रही है, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता और चोरी का मामला बनता है।
अधिकारियों के औचक निरीक्षण से मचा हड़कंप, मौके पर मिले अकाट्य सबूत
जैसे ही स्कूल परिसर के भीतर इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई और लकड़ी की अफरा-तफरी की खबर ग्राम बड़भूम के सजग ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लगी, पूरे इलाके में आक्रोश फैल गया। ग्रामीणों ने इसकी लिखित शिकायत तुरंत प्रशासनिक अमले से की। मामले की गंभीरता को देखते हुए गुरुर ब्लॉक के ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ), स्थानीय पटवारी और राजस्व विभाग के अन्य मैदानी अधिकारी दलबल के साथ शासकीय माध्यमिक शाला बड़भूम के प्रांगण में पहुंचे।
जांच टीम ने जब स्कूल के मैदान का मुआयना किया तो वहां चारों तरफ कटे हुए पेड़ों के ठूंठ और बिखरी हुई पत्तियां गवाही दे रही थीं। अधिकारियों ने मौके पर ही कटे हुए पेड़ों की गिनती की, जिनकी संख्या पूरी 28 पाई गई। इसके बाद जांच दल ने प्री-मैट्रिक बालक आश्रम का भी रुख किया, जहां अवैध रूप से काटी गई लकड़ियों का भारी जखीरा बरामद किया गया। अधिकारियों ने पंचनामा तैयार कर लिया है और लकड़ियों को प्रशासनिक अभिरक्षा में लेने की कार्रवाई शुरू कर दी है।
पूरा स्टाफ प्रथम दृष्ट्या दोषी, हेडमास्टर के सस्पेंशन के लिए भेजा गया कड़ा प्रस्ताव
मौके पर मौजूद जांच अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत करते हुए इस बात को स्वीकार किया है कि यह पर्यावरण नियमों का बेहद क्रूर और गंभीर उल्लंघन है। जांच दल में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि प्राथमिक जांच में स्कूल के प्रधान पाठक (हेडमास्टर) सहित पूरा शैक्षणिक और प्रशासनिक स्टाफ इस गंभीर गड़बड़झाले में पूरी तरह से संलिप्त और दोषी पाया गया है। बिना किसी उच्च अधिकारी के आदेश के इतनी बड़ी कार्रवाई स्कूल समय या उसके आस-पास होना और स्टाफ का चुप रहना उनकी मौन सहमति को दर्शाता है।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ब्लॉक स्तर के अधिकारियों के पास हेडमास्टर या उच्च श्रेणी के शिक्षकों को सीधे निलंबित करने का विधिक अधिकार नहीं होता है। इसलिए, घटना की विस्तृत जांच रिपोर्ट, तैयार किया गया पंचनामा और हेडमास्टर के तत्काल प्रभाव से निलंबन (सस्पेंशन) का कड़ा प्रस्ताव तैयार कर जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) और जिला कलेक्टर बालोद के पास भेजा जा रहा है।
राजस्व, शिक्षा और वन विभाग के संयुक्त नियम क्या कहते हैं
सरकारी जमीनों पर वृक्षों के संरक्षण को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के कड़े नियम हैं। आइए समझते हैं कि इस मामले में किन प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया:
| आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया | बड़भूम स्कूल मामले में वास्तविक स्थिति | कानूनी श्रेणी व परिणाम |
|---|---|---|
| शाला प्रबंधन का प्रस्ताव | केवल सूखी डालियों की छंटाई की अनुमति थी | प्रस्ताव का उल्लंघन, धोखाधड़ी |
| वन विभाग की अनुमति | किसी भी प्रकार की अनुमति या सूचना नहीं ली गई | वन अपराध अधिनियम के तहत केस |
| वरिष्ठ अधिकारियों की स्वीकृति | बीईओ या डीईओ को पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया | सेवा नियमों का उल्लंघन, विभागीय जांच |
| लकड़ी का निस्तारण | बिना निविदा (टेंडर) के अवैध रूप से आश्रम को ट्रांसफर | शासकीय संपत्ति की चोरी और गबन |
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने उठाई पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत एफआईआर की मांग
इस घटना के बाद से बड़भूम और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में गहरा रोष व्याप्त है। ग्रामीणों का कहना है कि जिन पेड़ों को उन्होंने और उनके बच्चों ने सालों तक सींचकर बड़ा किया था, ताकि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को छांव और शुद्ध हवा मिल सके, उन्हें चंद रुपयों के लालच में बेरहमी से काट दिया गया।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में केवल विभागीय जांच और निलंबन जैसी सामान्य दंडात्मक कार्रवाई काफी नहीं है। यह सरकारी संपत्ति की चोरी के साथ-साथ पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाने का गंभीर अपराध है। इसलिए, दोषी हेडमास्टर, संलिप्त कर्मचारियों और लकड़ी खरीदने वाले कबाड़ियों या आश्रम प्रबंधन के खिलाफ वन अपराध अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के तहत एफआईआर (प्रथम सूचना पत्र) दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए।



