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छत्तीसगढ़ में मदरसा शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल: वक्फ बोर्ड ने मदरसा बोर्ड को समाप्त करने के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को लिखा पत्र, उत्तराखंड मॉडल लागू करने की मांग

छत्तीसगढ़ में मदरसा शिक्षा प्रणाली के आधुनिकीकरण को लेकर एक बहुत बड़ा प्रशासनिक और नीतिगत विवाद खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को एक बेहद कड़ा पत्र लिखकर राज्य मदरसा बोर्ड को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की मांग की है। उत्तराखंड मॉडल का हवाला देते हुए वक्फ बोर्ड ने इसकी जगह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाने और सूबे के 418 मदरसों को सीधे स्कूल शिक्षा बोर्ड से जोड़ने का बड़ा प्रस्ताव रखा है, ताकि मुस्लिम छात्रों को मुख्यधारा की वैज्ञानिक शिक्षा से जोड़ा जा सके।







रायपुर, 5 जुलाई 2026: छत्तीसगढ़ के शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई, जब राज्य वक्फ बोर्ड के नवनियुक्त अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने सीधे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र भेजकर सूबे की मदरसा शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल और क्रांतिकारी बदलाव की वकालत कर दी। वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वर्तमान छत्तीसगढ़ मदरसा बोर्ड को तत्काल प्रभाव से भंग यानी समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को 3 जुलाई 2026 को भेजे गए इस आधिकारिक पत्र में डॉ. सलीम राज ने यह गंभीर तर्क दिया है कि वर्तमान मदरसा बोर्ड मुस्लिम समाज के बच्चों को आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा देने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। उन्होंने राज्य सरकार को उत्तराखंड सरकार के हालिया नीतिगत फैसलों का अनुसरण करने की सलाह दी है। उन्होंने छत्तीसगढ़ में भी मदरसा बोर्ड के स्थान पर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Minority Education Authority) के गठन का एक विस्तृत प्रारूप सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया है।

कुरआन के साथ कंप्यूटर जरूरी, वर्तमान व्यवस्था से बच्चों का भविष्य अंधकारमय

वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने अपने पत्र में वर्तमान मदरसा पाठ्यक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका स्पष्ट मानना है कि वर्तमान में इन मदरसों के भीतर दी जा रही पारंपरिक दीनी तालीम यानी धार्मिक शिक्षा प्रणाली आधुनिक युग की तीव्र व्यावसायिक और तकनीकी आवश्यकताओं के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है। उन्होंने अत्यंत कड़े शब्दों में कहा कि पर्याप्त आधुनिक संसाधनों और सही नीति के अभाव में मदरसों में पढ़ने वाले निर्धन छात्र केवल मौलाना या मौलवी बनकर रह जाते हैं, जिससे मुख्यधारा के रोजगार के बाजार में उनके अवसर बेहद सीमित हो जाते हैं।

डॉ. सलीम राज ने राष्ट्र निर्माण में मुस्लिम युवाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए पत्र में लिखा कि शासन और समाज का यह साझा लक्ष्य होना चाहिए कि मदरसों में पढ़ने वाले गरीब और पिछड़े बच्चों के एक हाथ में पवित्र कुरआन हो तो दूसरे हाथ में आधुनिक कंप्यूटर हो। जब तक मदरसों में पढ़ने वाले छात्र आधुनिक विषयों जैसे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, उन्नत गणित, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और अंग्रेजी भाषा की उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक उनका भविष्य अंधकारमय बना रहेगा।

उत्तराखंड के सफल मॉडल को छत्तीसगढ़ में भी लागू करने पर विशेष जोर

अपने इस बड़े प्रस्ताव को प्रशासनिक आधार देने के लिए वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष ने उत्तराखंड सरकार के ऐतिहासिक निर्णय का पुरजोर हवाला दिया है। उत्तराखंड में भी पूर्ववर्ती मदरसा शिक्षा परिषद के पारंपरिक ढांचे को समाप्त करके एक समेकित अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मार्ग प्रशस्त किया गया है। इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य मदरसों की स्वतंत्र और पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर उन्हें मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा प्रणाली के साथ मजबूती से जोड़ना है।

छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अनुसार, छत्तीसगढ़ में भी ठीक इसी उत्तराखंड मॉडल के आधार पर तुरंत नीतिगत बदलाव किए जाने बेहद जरूरी हैं। इस व्यवस्था के लागू होने से मुस्लिम समुदाय के मेधावी छात्र भी आधुनिक वैज्ञानिक शोधों का हिस्सा बन सकेंगे। वे केवल धार्मिक दायरों तक सीमित रहने के बजाय बड़े डॉक्टर, कुशल इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनकर देश और राज्य के विकास में अपना सक्रिय व अमूल्य योगदान दर्ज करा सकेंगे।

प्रदेश के 418 पंजीकृत मदरसों की वास्तविक स्थिति और सरकारी अनुदान पर खड़े किए सवाल

मुख्यमंत्री को सौंपे गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में इस समय कुल 418 मदरसे मदरसा बोर्ड के अंतर्गत पंजीकृत होकर संचालित हो रहे हैं। डॉ. सलीम राज ने इन सभी संस्थानों की जमीनी हकीकत पर उंगली उठाते हुए कहा कि इनमें से कई मदरसे पूरी तरह से छात्रविहीन हो चुके हैं, यानी वहां कागजों पर तो संचालन हो रहा है लेकिन भौतिक रूप से छात्र नदारद हैं। वहीं, जो अधिकांश मदरसे सक्रिय हैं, वहां केवल और केवल प्राथमिक स्तर की बुनियादी धार्मिक तालीम ही दी जा रही है। Higher Secondary स्तर तक की आधुनिक शिक्षा देने वाले मदरसे उंगलियों पर गिनने लायक हैं।

वक्फ बोर्ड ने सरकार का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया है कि शासन द्वारा इन संस्थाओं को हर साल बड़े पैमाने पर वित्तीय अनुदान और सुविधाएं दी जाती हैं। इसके बावजूद इन मदरसों के भीतर आधुनिक और व्यावसायिक शिक्षा की जमीनी स्थिति बिल्कुल शून्य बनी हुई है। इस विसंगति को दूर करने के लिए डॉ. राज ने ठोस सुझाव दिया है कि इन सभी 418 मदरसों की प्रशासनिक संबद्धता को मदरसा बोर्ड से हटाकर सीधे राज्य के माध्यमिक शिक्षा मंडल (School Education Board) से स्थायी रूप से जोड़ दिया जाना चाहिए।

धार्मिक और आधुनिक शिक्षा के संतुलन के लिए बने विशेषज्ञ समिति

इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष ने साफ किया है कि वे धार्मिक शिक्षा को पूरी तरह बंद करने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि वे उसमें एक अनिवार्य सुधार चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) का गठन करने की मांग की है। यह समिति एक ऐसा नया और संतुलित पाठ्यक्रम (Curriculum) तैयार करेगी जिसमें बच्चे सुबह के समय अपनी धार्मिक व पारंपरिक तालीम भी पूरी कर सकें और उसके तुरंत बाद नियमित स्कूल की तरह आधुनिक विज्ञान और गणित की कक्षाएं भी अटेंड कर सकें।

कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त और भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश प्रभारी डॉ. सलीम राज का यह पत्र सामने आने के बाद अब गेंद पूरी तरह से राज्य सरकार के पाले में चली गई है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) इस नीतिगत बदलाव के कानूनी, सामाजिक और प्रशासनिक पहलुओं का गहराई से अध्ययन कर रहा है। हालांकि, मुस्लिम समाज के कुछ पारंपरिक संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से इस प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं, जिससे आने वाले दिनों में इस विषय पर एक बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ना बिल्कुल तय माना जा रहा है।

Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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