बेलसोंडा में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई पर बवाल,पूर्व सरपंच ने लगाया बदले की भावना और मिलीभगत का आरोप
प्रशासनिक प्रक्रिया पर उठे सवाल: बिना लिखित आदेश और सीमांकन के चली जेसीबी, 'न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों' की अनदेखी का दावा।

महासमुंद। जनपद पंचायत महासमुंद के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत बेलसोंडा में हाल ही में हुई अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई एक बड़े विवाद में तब्दील हो गई है। ग्राम की पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर ने स्थानीय प्रशासन और वर्तमान सरपंच पर मिलीभगत का गंभीर आरोप लगाते हुए इस पूरी प्रक्रिया को ‘टारगेटेड हमला’ करार दिया है। उनका आरोप है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने के कारण उन्हें राजनीतिक रंजिश का शिकार बनाया जा रहा है।
भ्रष्टाचार की शिकायत बनी कार्रवाई का आधार?
पूर्व सरपंच भामिनी चंद्राकर के अनुसार, विवाद की जड़ वर्तमान सरपंच के कार्यकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार की शिकायत है। उन्होंने कलेक्टर जनदर्शन में अमृत सरोवर से अवैध मुरम खनन और जल संरक्षण के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए तालाब सुखाकर मुरम बेचने की शिकायत की थी। आरोप है कि इसी शिकायत से बौखलाकर वर्तमान सरपंच और कुछ तथाकथित लोगों ने राजस्व अमले को गुमराह किया और बिना किसी पूर्व सूचना या विधि सम्मत सीमांकन (Demarcation) के, उनकी निजी ‘लगानी’ भूमि को शासकीय बताकर बुलडोजर चलवा दिया।
प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न
इस पूरी कार्रवाई के दौरान प्रशासनिक और विधिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन के कई मामले सामने आए हैं:
- लिखित आदेश का अभाव: मौके पर मौजूद राजस्व अधिकारी मनीष श्रीवास्तव और वर्तमान सरपंच कार्रवाई से संबंधित कोई भी आधिकारिक लिखित आदेश प्रस्तुत नहीं कर पाए। नायब तहसीलदार मोहित अमिला ने भी फोन पर चर्चा के दौरान स्वीकार किया कि कोई लिखित आदेश जारी नहीं हुआ था और पूरी कार्रवाई ‘मौखिक वार्तालाप’ के आधार पर हुई।
- न्यायालय की अवहेलना: पूर्व सरपंच ने कार्रवाई की आशंका को देखते हुए नायब तहसीलदार न्यायालय में स्थगन (Stay) हेतु आवेदन प्रस्तुत कर पावती प्राप्त कर ली थी। इसके बावजूद विधिक प्रक्रिया को दरकिनार कर घेरा तोड़ा गया और फसलें नष्ट कर दी गईं।
- वित्तीय क्षति: इस कार्रवाई में लगभग 3 लाख रुपये की फसल और संपत्ति के नुकसान का दावा किया गया है।
जिम्मेदारों के विरोधाभासी बयान और बदसलूकी
जब इस मामले में पत्रकारों ने पक्ष जानने की कोशिश की, तो ग्राम पंचायत के जिम्मेदारों का रवैया संदेहास्पद रहा:
वर्तमान सरपंच प्रीति त्रिभुवन धीवर: उन्होंने कार्रवाई के समय राजस्व अमले की मौजूदगी का हवाला दिया, लेकिन दस्तावेजों की बात आते ही पल्ला झाड़ लिया और सारी जिम्मेदारी सचिव पर डाल दी।
पंचायत सचिव नेहा उपाध्याय: सचिव का व्यवहार पत्रकारों के प्रति अत्यंत अभद्र और अमर्यादित रहा। उन्होंने न केवल जानकारी देने से इनकार किया, बल्कि पत्रकारों के साथ भी दुर्व्यवहार किया, जिससे शासन-प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
नायब तहसीलदार का रुख: नायब तहसीलदार मोहित अमिला ने इस संवेदनशील मामले को ‘पंचायत का काम’ बताकर पल्ला झाड़ लिया, जबकि निजी भूमि पर कार्रवाई बिना राजस्व आदेश के संभव नहीं है।
क्या है भूमि का विवाद?
पूर्व सरपंच का दावा है कि जिस खसरा नंबर 1661, 1651 और 1654 को शासकीय बताया जा रहा है, वह असल में ‘बंदोबस्त त्रुटि’ का मामला है। री-नंबरिंग के दौरान हुई इस गलती के सुधार हेतु तहसील कार्यालय में पहले ही आवेदन दिया जा चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि गांव के ही अन्य रसूखदारों (जैसे शंकर लाल चंद्राकर) द्वारा शासकीय भूमि पर किए गए वास्तविक कब्जों पर प्रशासन मौन है, जबकि उनकी 52 साल पुरानी पैतृक भूमि को निशाना बनाया जा रहा है।
पूर्व सरपंच भामिनी पोखन चंद्राकर ने कहा कि मैंने सदैव भ्रष्टाचार और अवैध अतिक्रमण के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। आज उसी ईमानदारी की सजा मुझे और मेरे परिवार को दी जा रही है। बिना रिकॉर्ड देखे मेरी पैतृक जमीन पर जेसीबी चलाना न्याय का गला घोंटने जैसा है।
बेलसोंडा का यह मामला अब केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक तानाशाही का उदाहरण बनता जा रहा है। बिना किसी ठोस लिखित आदेश के एक महिला जनप्रतिनिधि (पूर्व) की भूमि पर कार्रवाई करना और पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार करना, इस पूरे घटनाक्रम के पीछे किसी बड़े आर्थिक लेनदेन या गहरी रंजिश की ओर इशारा करता है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में हस्तक्षेप कर ‘न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों’ की रक्षा करता है या भ्रष्टाचार की यह परतें और गहरी होती जाएंगी।



