अरबईन यात्रा 2025: करबला में इंसानियत, सेवा और श्रद्धा का अद्वितीय संगम

नजफ से कर्बला तक की पैदल यात्रा में दिखा भाईचारे और सेवा का अद्भुत नजारा, 2.1 करोड़ से अधिक लोग हुए शामिल।





इराक के नजफ से करबला तक की 90 किलोमीटर पैदल यात्रा में इस वर्ष 2 करोड़ 11 लाख से अधिक ज़ायरीन शामिल हुए। यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक रहा, बल्कि सेवा, एकता और सामाजिक समरसता की मिसाल भी बना। भारत सहित 105 देशों से आए तीर्थयात्रियों ने इमाम हुसैन की शहादत को श्रद्धांजलि दी।


करबला, इराक — अरबईन यात्रा 2025 ने एक बार फिर इतिहास रच दिया। इस वर्ष 17 अगस्त को संपन्न हुई इस यात्रा में 2 करोड़ 11 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया। यह आंकड़ा एक आधुनिक AI-आधारित इलेक्ट्रॉनिक काउंटिंग सिस्टम द्वारा दर्ज किया गया, जिसे हज़रत अब्बास के रौज़े की ओर से लगाया गया था। यह यात्रा पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत के 40वें दिन आयोजित होती है, जिसे चेहल्लुम या अरबईन कहा जाता है।


पैदल यात्रा: नजफ से करबला तक

अरबईन यात्रा की शुरुआत नजफ स्थित हज़रत अली की मस्जिद से होती है और यह करबला में इमाम हुसैन के रौज़े तक पहुंचती है। यह दूरी लगभग 90 किलोमीटर की होती है, जिसे ज़ायरीन 2-3 दिनों में पैदल तय करते हैं। रास्ते में 1455 से अधिक पॉल (मार्कर) लगाए जाते हैं, जिन पर विभिन्न देशों के मोकिब (सेवा शिविर) मौजूद होते हैं।


सेवा की भावना: करबला में मुफ्त भोजन, चिकित्सा और आवास

इस यात्रा की सबसे अनोखी बात यह रही कि करबला में किसी भी चीज़ की कीमत नहीं बढ़ी। स्थानीय लोगों ने अपने घरों के दरवाज़े तीर्थयात्रियों के लिए खोल दिए। एसी युक्त कमरे, होटल जैसी भोजन व्यवस्था, मुफ्त पानी, जूस, चाय और यहां तक कि मसाज और इत्र की सेवा भी दी गई। भारत से आए स्वयंसेवकों ने भी 15 से अधिक मोकिब लगाए, जिनमें रोज़ाना लाखों लोगों को भोजन और विश्राम की सुविधा दी गई। भारतीय डॉक्टरों की 50 से अधिक टीमों ने चिकित्सा सेवाएं दीं।


सुरक्षा और व्यवस्था: बिना पुलिस या सेना के सफल संचालन

इतनी विशाल भीड़ के बावजूद, करबला में कोई भगदड़ या अव्यवस्था नहीं देखी गई। केवल 21-22 हज़ार वॉलंटियर्स ने पूरे आयोजन को संभाला। ये सभी सामान्य नागरिक थे, जिन्होंने श्रद्धा और सेवा की भावना से व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया।


धार्मिक और सामाजिक महत्व

अरबईन यात्रा केवल शिया मुसलमानों तक सीमित नहीं रही। इसमें सुन्नी, हिंदू, ईसाई और अन्य धर्मों के लोग भी शामिल हुए। यह आयोजन इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करने के साथ-साथ अत्याचार के खिलाफ संघर्ष, प्रेम और एकता का संदेश देता है।


गाजा और फलस्तीन के समर्थन में आवाज

2025 की यात्रा के दौरान ज़ायरीनों ने गाजा और फलस्तीन के हालात पर चर्चा की और उत्पीड़ितों के समर्थन में आवाज़ बुलंद की। यह दर्शाता है कि अरबईन यात्रा केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रतीक बन चुकी है।


भारत की भागीदारी और सम्मान

इस वर्ष भारत से लाखों श्रद्धालु करबला पहुंचे। भारतीय मोकिबों में सेवा देने वाले डॉक्टरों की टीम ने चिकित्सा सेवाएं दीं। करबला में भारतीय तिरंगा भी फहराया गया, जिसे इराकी नागरिकों ने सम्मानपूर्वक चूमा। यह दृश्य इमाम हुसैन की उस ऐतिहासिक इच्छा की याद दिलाता है, जिसमें उन्होंने हिंदुस्तान आने की ख्वाहिश जताई थी।


अरबईन का पैग़ाम

अरबईन यात्रा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक और मानवीय संदेश भी है। यह आयोजन दुनिया को कुरबानी, इंसाफ़ और एकता का सबक़ देता है। इमाम हुसैन की शहादत आज भी सत्य और न्याय के लिए खड़े होने की प्रेरणा देती है।


अस्वीकरण: (Disclaimer)
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Richa Sahay

ऋचा सहाय — पत्रकारिता और न्याय जगत की एक सशक्त आवाज़, जिनका अनुभव दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय है। वर्तमान में The 4th Pillar की वरिष्ठ समाचार संपादक के रूप में कार्यरत ऋचा सहाय दशकों से राजनीति, समाज, खेल, व्यापार और क्राइम जैसी विविध विषयों पर बेबाक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी की सबसे खास बात है – जटिल मुद्दों को सरल, सुबोध भाषा में इस तरह प्रस्तुत करना कि पाठक हर पहलू को सहजता से समझ सकें।पत्रकारिता के साथ-साथ ऋचा सहाय एक प्रतिष्ठित वकील भी हैं। LLB और MA Political Science की डिग्री के साथ, उन्होंने क्राइम मामलों में गहरी न्यायिक समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण स्थापित किया है। उनके अनुभव की गहराई न केवल अदालतों की बहसों में दिखाई देती है, बल्कि पत्रकारिता में उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावशाली बनाती है।दोनों क्षेत्रों में वर्षों की तपस्या और सेवा ने ऋचा सहाय को एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है जो ज्ञान, निडरता और संवेदनशीलता का प्रेरक संगम है।

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