सुभद्रा खापर्डे को विश्व “ग्रामीण जीवन में महिला सरजनात्मकता पुरस्कार”

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इंदौर (म.प्र.)। वुमनवर्ल्ड समिट फ़ाउंडेशन (wwsf) स्विट्ज़रलैंड, द्वारा वर्ष 2020 का “ग्रामीण जीवन में महिला सरजनात्मकता पुरस्कार” विश्व के 10 महिलाओं को दिया गया है। जिनमें इंदौर की अनुभवी दलित महिलावादी कार्यकर्ता सुभद्रा खापर्डे भी शामिल है। इस अवसर पर “THE 4th PILLAR” ने इस पुरस्कार एवं उनके काम के बारे में सुभद्राजी से बातचीत की जिसके सारांश प्रस्तुत है –

THE 4th PILLAR- सुभद्रजी क्या आप इस पुरस्कार एवं आप के काम के बारे में बतायगी?
सुभद्रा : विश्व भर में सबसे पीड़ित समुदाय ग्रामीण महिलाओं का है विशेषकर वे महिलाएं जो किसानी करते है। इनकी समस्याएँ बहुत जटिल है एवं इनके समाधान के लिए सरजनात्मक सोच की आवश्यकता है। इसीलिए wwsf विगत 27 वर्षों से यह पुरस्कार प्रदान कर रहा है और अब तक 462 महिलाओं को सम्मानित किया जा चुका है। मैं 30 वर्षों से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के दलित एवं आदिवासी महिलाओं के साथ नए नए तरीकों से उनके अधिकार एवं विकास के लिए काम कर रही हूँ औरे इसलिए इस वर्ष मुझे यह पुरस्कार मिला है।

THE 4th PILLAR – क्या आप पुरस्कार लेने स्विट्ज़रलैंड जाएगी
सुभद्रा – नहीं पुरस्कार ऑनलाइन प्रदान किया गया। 15 अक्टूबर 2020 को अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के दिन सभी 10 महिलाओं को पुरस्कृत किया गया। उस दिन हम सभी ने हमारे कार्य क्षेत्र, देवास जिले के बिसाली गाँव में एक कार्यक्रम रखा था जिसमें हमारे संगठन की महिलाएं एकत्रित और सभी ने अपनी बातें रखी। ग्रामीण महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने हेतु कार्य योजनाएँ बनाए।

THE 4th PILLAR-आपके कार्य किस प्रकार के है ?
सुभद्रा : महिलाओं को होने वाली प्रजनन स्वास्थ्य की समस्याओं के इलाज के लिए उनके गाँव में स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया जाता है। जिसमें स्त्री रोग विशेषज्ञ, नर्स, लैब टेकनीशियन आदि ले जाकर जांच के बाद दवाई दी जाती है। यह कार्य में महिलाएं पूरी तरह से सहभागी रहती है एवं पुरुषों को भी इन समस्याओं के बारे में सचेत किया जाता है।
इस काम को करने से मुझे समझ में आया कि महिलाएं अधिकतर अपनी प्रजनन तंत्र की परेशानियों को सहन करती रहती है । यहाँ तक कि गर्भाशय बाहर आ जाने के बावजूद भी काम करती रहती है। आदमियों को इस बात की कल्पना तक नहीं है कि महिलाओं को कितनी परेशानी होती है। अगर मालूम भी होता है तो भी नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है। क्योंकि आदमी लोग पैसा खर्च करना नहीं चाहते है। गरीब महिलाएं चुपचाप तब तक काम करती रहती है जब तक कि वह बिस्तर में नही पड़ जाती है। समाज और सरकार केवल महिलाओं को बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझती है ।एवं इसलिए उनके प्रजनन तंत्र की गंभीर समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इस विकराल स्थिति को हम काफी हद तक सुधार पाये है।
इस काम को करते हुये मैंने पाया कि औरतों के सेहत का खराब होना उनके रोज़मर्रा के भोजन से भी जुड़ा हुआ है। मैं सोचने लगी कि उनके भोजन में क्या शामिल किया जाए ताकि उनका पोषण की स्थिति में सुधार हो। उन्हे मैं दवाई के साथ सब्जी और फल खाने की सलाह देती थी। फिर मैं देखी की यह फल और सब्जी एवं अन्य खाद्य पदार्थ जो इनके खेतों में उपलब्ध है, सभी रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों से उत्पादित होकर सेहत के लिए हानी कारक है। इन खाद्यों से पोषण के साथ साथ हमारे शरीर में जहर भी घुस रहा है।
इसी को ध्यान में रखकर मैंने सोचा कि क्यों न भोजन में प्राकृतिक रूप से उत्पादित चीजों को शामिल किया जाए। इतना ही नही इस बात की चेतना लाना भी बड़ी चीज़ होगी कि सिर्फ दवाई खाने से स्वास्थ्य नहीं सुधार जा सकता है बल्कि हमें हमारी खान पान को सही करना होगा। इसलिए मुझे प्रकृतिक कृषि खुद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। मैंने ग्राम पांडुतालाब जिला देवास में एक एकड़ ज़मीन खरीदी और उस पर देसी हिसाब से खेती करना प्रारम्भ किया। मैंने ठान लिया कि औरतों को प्राकृतिक खेती के गुणवत्ता पूर्ण उत्पादों की ओर ले जाऊँगी ।जिससे कि उनके सेहत में सुधार लाने में काफी मदद मिलेगी। हम ने न केवल प्राकृतिक खेती शुरू की बल्कि इस में काम के लिए औरतों के बीच जागरूकता पैदा की, इसका असर यह हुआ कि इस काम में औरतें आगे आए। इससे उन्हें समझ आया कि वह अपनी पारंपरिक देसी खेती को वापस अपना सकें और खुद की खेती में प्रयोग कर सके। पिछले तीन साल से यही देशी तरीका अपनाया जा रहा है। बारिश के समय एक एकड़ में 25 किस्म के बीज बोये जाते है।