सोनाखान के हुतात्मा वीरनारायण सिंह ” बलिदान दिवस “

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छत्तीसगढ़ के वीर सपूत

छत्तीसगढ़ भारत का एक वन सम्पदा से भरपूर राज्य है। पहले यह मध्य प्रदेश का ही एक भाग था। अंग्रेजी शासन में जब दत्तक पुत्र को अस्वीकार करने का निर्णय हुआ, तो छत्तीसगढ़ भी अंग्रेजों के अधीन आ गया।

रायपुर में अंग्रेजों ने एक कमिश्नरी की स्थापना की थी। वहाँ पर ही एक छोटी सी रियासत थी सोनाखान। यहाँ की मिट्टी में सोने के कण मिलते थे, इस कारण इसका नाम सोनाखान पड़ा। यहाँ के जमींदार थे बिंझवार राजपूत घराने के वीर नारायण सिंह। वे बहुत वीर और स्वाभिमानी थे।

नारायण सिंह के पिता रामराय सिंह का देहान्त 1830 में हुआ। इसके बाद जमींदारी की देखरेख नारायण सिंह के जिम्मे आयी।उन्होंने अपने पिता का अनुसरण करते हुए अपने क्षेत्र की जनता के हित के लिए व्यवस्था बनाई। इससे वे बहुत लोकप्रिय हो गये और लोग उन्हें राजा मानने लगे।

1856 में वर्षा न होने के कारण खेती सूख गयी, तो नारायण सिंह ने अपना निजी अन्न का भंडार खोल दिया। जब उससे भी काम नहीं चला, तो उन्होंने कसड़ोल के एक व्यापारी माखनसिंह से अन्न माँगा। माखनसिंह अंग्रेजों का पिट्ठू था, उसने अन्न देना तो दूर, ऐसे कठिन समय में लोगों से जबरन लगान वसूलना शुरू कर दिया। इससे नारायण सिंह क्रोध में भर गये। उन्होंने माखनसिंह का अन्न भंडार लूट कर जनता में बाँट दिया। माखनसिंह की शिकायत पर रायपुर के डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स डी इलियट ने नारायण सिंह को बन्दी बनाकर रायपुर के कारागार में डाल दिया।

उधर उत्तर भारत में देशव्यापी स्वतन्त्रता युद्ध की योजना बन रही थी। नाना साहब द्वारा उसकी सूचना रोटी और कमल के माध्यम से देश भर की सैनिक छावनियों में भेजी जा रही थी। यह सूचना जब रायपुर पहुँची, तो सैनिकों ने कुछ देशभक्त जेलकर्मियों के सहयोग से कारागार से बाहर तक एक गुप्त सुरंग बनायी और नारायण सिंह को मुक्त करा लिया।

जेल से मुक्त होकर वीर नारायण सिंह ने 500 सैनिकों की एक सेना गठित की और 20 अगस्त, 1857 को सोनाखान में स्वतन्त्रता का बिगुल बजा दिया। इलियट ने स्मिथ नामक सेनापति के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना भेज दी। पर नारायण सिंह ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं। उन्होंने सोनाखान से अचानक बाहर निकल कर ऐसा धावा बोला कि अंग्रेजी सेना को भागते भी नहीं बना; पर दुर्भाग्यवश सोनाखान के आसपास के अनेक जमींदार अंग्रेजों से मिल गये। इस कारण नारायण सिंह को पीछे हटकर एक पहाड़ी की शरण में जाना पड़ा। अंग्रेजों ने सोनाखान में घुसकर पूरे नगर को आग लगा दी।

नारायण सिंह में जब तक शक्ति और सामर्थ्य रही, वे छापामार प्रणाली से अंग्रेजों को परेशान करते रहे। काफी समय तक यह गुरिल्ला युद्ध चलता रहा; पर आसपास के जमींदारों की गद्दारी से नारायण सिंह फिर पकड़े गये और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। कैसा आश्चर्य कि जनता ने जिसे राजा के रूप में अपने हृदय मन्दिर में बसाया, उस पर राजद्रोह का मुकदमा ? पर अंग्रेजी शासन में न्याय का नाटक ऐसे ही होता था।

मुकदमे में वीर नारायण सिंह को मृत्युदंड दिया गया। उन्हें 10 दिसम्बर, 1857 को जहाँ फाँसी दी गयी, स्वातंत्र्य प्राप्ति के बाद वहाँ ‘जय स्तम्भ’ बनाया गया, जो आज भी छत्तीसगढ़ के उस वीर सपूत की याद दिलाता है।