वो आगे बढ़ता गया, वो आगे बढ़ता गया

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वो कभी आसमान में उड़ा,
फिर गिरा
कई बार गिरा
फिर भरी उड़ान,
वो उड़ चला वो उड़ चला,

बड़ी बड़ी थी उम्मीदे,
कई बार बिखरीं,
बार-बार बिखरीं,
फिर उठा वो
वो चल पड़ा वो चल पड़ा,

सभी को समझा उसने अपना,
अपनों ने ठगा,गैरों ने ठगा,
नहीं बदला उसका रूप,
वो समझता रहा अपना,वो समझता रहा अपना,

हर रंग था उसका अपना,
हर रिश्ता था अपना,
रिश्तो ने ही दिया धोखा,
हर बार सीखा कुछ नया उसने,
फिर दौड़ा,
कई बार दौड़ा
वो दौड़ता ही रहा, वो दौड़ता ही रहा,

एक जिद थी उसकी अपनी,
जिंदगी में कुछ सीखने की
आगे बढ़ने की
अपनो को अपना बनाने की,
इसी जिद में,
वो आगे बढ़ता गया,वो आगे बढ़ता गया ।

“ऋचा”