नवरात्रि के चौथे दिन होती है मां कुष्मांडा देवी की पूजा, मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के रोग शोक होते हैं नष्ट

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शारदीय नवरात्र का चौथा दिन जगत जननी के चतुर्थ स्वरूप को समर्पित होता है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा देवी की पूजा की जाती है।श्रीमद् देवी भागवत पुराण में बताया गया है कि मां दुर्गा के छठे स्वरूप कूष्मांडा स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।कुरान में बताया गया है कि पहले से लेकर शेट्टी के आरंभ तक चारों ओर अंधकार ही अंधकार था और सृष्टि एकदम शून्य थी तब आदिशक्ति के कुष्मांडा रूप में अंडा का रूप में ब्रह्मांड की रचना की।अपने उधर से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग शोक नष्ट हो जाते हैं और उनके घर में सुख शांति आती है।

मां कुष्मांडा शेर पर सवार रहती है इनकी आठ भुजाएं हैं। इनके साथ भुजाओं में क्रमशः कमल पुष्प, बाण, धनुष कमंडल चक्र और गदा सुशोभित हैं। जिसमें सभी प्रकार की सिद्धियां है। मां के शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान देदीप्यमान है ।देवी कुष्मांडा के इस दिन का रंग हरा है । संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को देवी के स्वरूप की पूजा आराधना करनी चाहिए।

1 – ऐसा है मां का स्वरूप

मां का यह स्वरूप मन मुस्कुराहट पाला है कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तो देवी भगवती के इसी स्वरूप मैं मंद मंद मुस्कुराते हुए सृष्टि की रचना की थी। इसीलिए यही सृष्टि की आदि स्वरूपा और आदि शक्ति हैं।

2 – मिट जाते हैं सारे रोग शोक

देवी कुष्मांडा की आराधना करने से आ रात को के सभी रोग और शोक का नाश हो जाता है।इसके अलावा मां की कृपा से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य समृद्धि आती है ।जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें देवी कुष्मांडा की पूजा श्रद्धा भाव सहित करना चाहिए।

3 – मां कुष्मांडा आराधना मंत्र

देवी कुष्मांडा की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए “या देवी सर्वभूतेषु कुष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

4 – कुष्मांडा देवी को प्रिय है यह प्रसाद

संस्कृत में कुष्मांडा कद्दू और‌ कुम्हणे को कहा जाता है। देवी ब्रह्मांड के मध्य में निवास करती हैं और सभी जीवो का संरक्षण करते हैं इनको कुम्हणे की बलि सबसे प्रिय है। इस देवी को कुम्हणे से बने प्रसाद का भोग लगाया जाता है।