हिंदी पत्रकारिता दिवस: 121 साल पहले छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में रखी गई थी हिंदी पत्रकारिता की नींव

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हिंदी पत्रकारिता दिवस: अविभाजित बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव पेंड्रा से प्रख्यात साहित्यकार व लेखक माधवराव सप्रे ने पहला हिंदी मासिक समाचार पत्र छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन सितंबर 1900 में प्रारंभ किया। तब समूचे छत्तीसगढ़ में एक भी प्रिंटिंग प्रेस नहीं था। उस दौर में छत्तीसगढ़ मित्र की छपाई नागपुर में हुआ करती थी। बाद में रायपुर से प्रिंटिंग शुरू हुई।

मासिक अखबार छत्तीसगढ़ मित्र तीन साल चल पाया। आर्थिक तंगी के कारण वर्ष 1902 में छत्तीसगढ़ मित्र को बेमन से बंद करना पड़ा। प्रकाशन के पहले वर्ष में छत्तीसगढ़ मित्र प्रबंधन को 175 स्र्पये और दूसरे वर्ष में 118 स्र्पये का घाटा सहना पड़ा।इस क्षति के एवज में जनसहयोग की मांग भी उठी। स्व सप्रे ने भरे मन से लिखा था कि परमात्मा के अनुग्रह से जब छत्तीसगढ़ मित्र स्वयं सामर्थ्यवान होगा तब वह फिर कभी लोकसेवा के लिए जन्मधारण करेगा।

उनकी यह इच्छा फिर कभी पूरी नहीं हो पाई। छत्तीसगढ़ मित्र के प्रकाशन बंद होने के बाद सप्रेजी ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की मराठी केसरी पत्रिका को हिंदी केसरी के रूप में छापना शुरू किया। कर्मवीर के प्रकाशन में भी सप्रेजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कहानी लेखन की तरफ भी उनकी गहरी रुचि रही। यही कारण है कि सप्रेजी की कहानी एक टोकरी भर मिट्टी को हिंदी की पहली मौलिक कहानी का श्रेय प्राप्त है।

राजकुमार को अंग्रेजी पढ़ाने आए थे पेंड्रा

पेंड्रा के वरिष्ठ नागरिक रामनिवास तिवारी बताते हैं कि वर्ष 1900 में सप्रेजी पहली बार पेंड्रा आए। यहां के राजकुमार अमोल सिंह को अंग्रेजी की शिक्षा दीक्षा देने आए थे। दो वर्ष तक उनको अंग्रेजी की शिक्षा दी। इसी बीच उन्होंने छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। पेंड्रा क्षेत्र में सप्रेजी को लोग आदर के भाव से देखते थे और उनकी हर एक बात लोगों के लिए पत्थर की लकीर जैसी थी। लोगों पर उनके विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा था।

बालिका शिक्षा को लेकर थे गंभीर

बालिका शिक्षा को लेकर भी वे गंभीर रहे। सन 1921 में रायपुर में पहला कन्या विद्यालय जानकी देवी कन्या पाठशाला की स्थापना की। इसके अलावा राष्ट्रीय विद्यालय की भी स्थापना की। बेटियों की पढ़ाई के लिए सप्रे की अपनी अलग सोच थी। जब उन्होंने रायपुर में कन्या शाला की स्थापना की तब बेटियों की पढ़ाई के लिए अभियान चलाया। पालकों से मिलकर बात की। उनकी कोशिश रंग लाई। घर की चहारदीवारी से बेटियां निकलीं और स्कूल पहुंच गईं। उनकी कोशिश रंग लाई। स्व सप्रे की सोच आज फलीभूत होते दिखाई दे रहा है।