गर्भ के प्रत्येक माह का होता है अधिपति ग्रह

0
347

किसी स्त्री के लिए मां बनना उसके जीवन का सबसे बड़ा और सर्वोत्तम छण होता है ।गर्भ में पल रहा शिशु स्वस्थ रहे और जन्म लेने के बाद भी उसका संपूर्ण जीवन सुंदर, सुखद और आयुष्यमान हो ऐसी कामना की जाती है। गर्भ में पलने के दौरान बालक के संपूर्ण बौद्धिक और शारीरिक विकास के लिए गर्भसंस्कार का प्रचलन भी प्राचीनकाल से रहा है। यह सर्वविदित तथ्य है कि माता का आहार, विहार, विचार, चिंतन, मनन, अध्ययन जैसा होगा उसके गर्भ में पल रहे शिशु पर भी वैसा ही प्रभाव पड़ेगा।

गर्भस्थ शिशु पर ग्रह नक्षत्रों का भी पूर्ण प्रभाव रहता है। इसलिए हमारे प्राचीन मनीषियों ने गहन अध्ययन और शोध करने के बाद गर्भकाल के नौ माह में प्रत्येक माह का एक अधिपति ग्रह निश्चित किया है। गर्भ के उस माह में संबंधित ग्रह का चिंतन, मनन, जाप, पूजन बालक की आयु, आरोग्य और बुद्धि में वृद्धि करता है। प्रत्येक माह से संबंधित ग्रह के मंत्रों आदि का जाप उस माह में किया जाए तो निश्चित रूप से जन्म लेने वाला बालक सभी नौ ग्रहों को साधकर ही जन्म लेगा।

मंत्र

मासेश्वरा: सितकुजेज्यरवीन्दुसौरिचन्द्रात्मजास्तनुपचंद्रदिवाकरा: स्यु:।

ये हैं गर्भ के नौ माह के अधिपति ग्रह

  • गर्भवती स्त्री के गर्भ के
  • पहले माह का स्वामी शुक्र,
  • दूसरे माह का स्वामी मंगल,
  • तीसरे माह का स्वामी बृहस्पति,
  • चौथे माह का स्वामी सूर्य,
  • पांचवें माह का स्वामी चंद्र
  • छठे माह का स्वामी शनि,
  • सातवें माह का स्वामी बुध,
  • आठवें माह का स्वामी लग्नपति, अर्थात गर्भाधान के समय जो लग्न रहा हो उसका स्वामी
  • नवें माह का स्वामी चंद्र,
  • दसवें माह का स्वामी सूर्य होता है।

इस प्रकार प्रत्येक माह के अधिपति ग्रह के मंत्र का जाप करने से गर्भस्थ शिशु निरोगी, सुखी, सुंदर, बलशाली होता है।