कलियुग में ‘अन्नदाता’ की भूमिका निभा रहे सर्व धर्म हनुमान मंदिर सेवा समिति के संस्थापक कुबेर राठी, हजारों तृप्त लोगों ने दिया शुभाशीष
स्टेशन की पटरियों से समाज के अंतिम व्यक्ति तक, कुबेर राठी बने हर दीन-दुखी का संबल

रायपुर । सनातन परंपरा में कहा गया है ‘अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम्’ अर्थात् अन्न की सेवा ही सबसे बड़ा व्रत है। इसी पौराणिक आदर्श को आत्मसात करते हुए रायपुर की धरा पर सर्व धर्म हनुमान मंदिर सेवा समिति द्वारा भक्ति का एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है, जिसकी सुगंध पूरे प्रदेश में फैल रही है।

भक्ति का शंखनाद और हनुमंत वंदना
शनिवार के पुनीत अवसर पर मंदिर परिसर में एक अलौकिक दृश्य उपस्थित था। आयोजन के सूत्रधार और प्रख्यात समाजसेवी कुबेर राठी ने सर्वप्रथम पवनपुत्र हनुमान जी के श्रीचरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। घंटाध्वनि और शंखध्वनि के बीच जब कुबेर राठी ने आरती उतारी, तो वातावरण ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। उन्होंने बजरंगबली से प्रदेशवासियों की खुशहाली, सुख और समृद्धि की मंगल कामना की।

2009 का वह बीजारोपण, जो आज बना वटवृक्ष
अपनी यात्रा को याद करते हुए संस्थापक एवं समाजसेवी कुबेर राठी ने बताया कि सेवा का यह लघु प्रयास वर्ष 2009 में एक छोटे से संकल्प के रूप में शुरू हुआ था। पौराणिक कथाओं में जिस प्रकार एक छोटा सा बीज विशाल वटवृक्ष बनकर सबको छाया देता है, वैसे ही यह भंडारा आज एक ‘बृहद महाभंडारे’ का रूप ले चुका है। दोपहर से शुरू होकर देर रात तक चलने वाले इस यज्ञ में जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें ढह जाती हैं।

शबरी की भक्ति और सुदामा का सत्कार
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रबंधन है। यहाँ आने वाले गरीब, मजदूर और रेलवे स्टेशन के समीप रहने वाले निराश्रितों को केवल भोजन नहीं, बल्कि ‘सम्मान’ परोसा जाता है।भंडारे में पधारे एक लाभार्थी ने कहा कि जैसे प्रभु राम ने शबरी के जूठे बेर प्रेम से स्वीकार किए थे, वैसे ही कुबेर भैया हमें कुर्सी-टेबल पर ससम्मान बैठाकर भोजन कराते हैं। हमारे लिए तो वे साक्षात् अन्नदाता हैं।

श्रद्धालु कविता नेतराम कहती हैं राठी जी का नाम ‘कुबेर’ है और उनका काम भी धन के देवता कुबेर की भाँति अक्षय भंडार बाँटना है। ईश्वर उन्हें और उनके परिवार को सदैव यशस्वी रखे।

इस शनिवार लगभग 5000 से 6000 लोगों ने पंक्तिबद्ध होकर महाप्रसाद ग्रहण किया। इस सेवा यज्ञ के पूर्ण होने पर कुबेर राठी के चेहरे पर जो संतोष था, वह किसी तपस्वी की सिद्धि से कम नहीं था। उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब मैं किसी भूखे व्यक्ति को तृप्त होकर मुस्कुराते हुए देखता हूँ, तो मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मेरी भक्ति सफल हो गई। यह आत्मिक शांति संसार के किसी भी वैभव से बड़ी है। जब तक प्रभु की इच्छा है, यह सेवा का रथ अविराम चलता रहेगा।

यह आयोजन केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि आधुनिक युग में ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ के पौराणिक सिद्धांत का जीवंत प्रमाण है।



