गया में ई-पिंडदान पर मचा घमासान, धर्म बनाम डिजिटल सुविधा पर टकराव, पंडा समाज ने कहा, “मोक्ष ऑनलाइन नहीं मिलता”




बिहार सरकार की नई ई-पिंडदान सेवा ने पितृपक्ष मेले से पहले धार्मिक और प्रशासनिक हलकों में बहस छेड़ दी है। ₹23,000 के ऑनलाइन पैकेज को लेकर पंडा समाज ने इसे धर्म का व्यावसायीकरण बताया, जबकि सरकार इसे सुविधा और समावेशिता की दिशा में कदम मान रही है।
पितृपक्ष मेला की तैयारी और डिजिटल पहल
गया जी की मोक्ष भूमि पर 6 से 21 सितंबर 2025 तक पितृपक्ष मेला आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। इस बार बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम (BSTDC) ने एक नई ई-पिंडदान सेवा शुरू की है, जिसमें ₹23,000 के शुल्क पर पूजा सामग्री, पुरोहित, दक्षिणा, अग्नाशन अनुष्ठान और वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा दी जा रही है।
यह सेवा उन श्रद्धालुओं के लिए शुरू की गई है जो स्वास्थ्य, दूरी या समय की बाधाओं के कारण गया नहीं आ सकते। ऑनलाइन बुकिंग के माध्यम से वे अपने पितरों के लिए पिंडदान करवा सकते हैं।
पंडा समाज का विरोध: परंपरा की रक्षा की पुकार
गया के पारंपरिक पंडा समाज ने इस योजना का तीव्र विरोध किया है। उनका कहना है कि शास्त्रों के अनुसार पिंडदान पुत्र या पुरुष वंशज द्वारा स्वयं गया जी की भूमि पर उपस्थित होकर ही करना चाहिए। ऑनलाइन माध्यम से यह संस्कार करवाना धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन है।
नारायण शब्द सेवा आश्रम के संस्थापक पंडा दीपू भैया ने कहा कि जिस तरह बिना पति-पत्नी के समागम के संतान उत्पन्न नहीं हो सकती, उसी तरह बिना गया जी की धरती पर कदम रखे पितरों की मुक्ति संभव नहीं। उन्होंने वायु पुराण और महाभारत का हवाला देते हुए कहा कि भगवान राम ने भी गया जी में राजा दशरथ का पिंडदान किया था। उनके अनुसार, गया की धरती पर पग-पग रखते ही पितरों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
सरकार का पक्ष: समावेशिता और सुविधा का प्रयास
पर्यटन मंत्री राजू सिंह ने स्पष्ट किया कि यह सेवा पहले भी सीमित रूप से चल रही थी, लेकिन इस बार इसका प्रचार-प्रसार किया गया है। उन्होंने कहा कि इस सेवा से पंडा समाज को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि ऑनलाइन बुकिंग से भी राशि उन्हीं के पास जाएगी।
सहकारिता मंत्री प्रेम कुमार और मंत्री श्रवण कुमार ने पंडा समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए योजना की समीक्षा का आश्वासन दिया है। सरकार का कहना है कि यह सेवा उन श्रद्धालुओं के लिए राहत है जो व्यक्तिगत रूप से गया नहीं आ सकते।
धार्मिक दृष्टिकोण और ग्रंथों का संदर्भ
विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभू लाल विट्ठल ने कहा कि धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी ऑनलाइन पिंडदान का उल्लेख नहीं है। उनके अनुसार, पितरों को मोक्ष तभी मिलता है जब उनके वंशज स्वयं अपने हाथों से गया जी में पिंडदान करें। दूसरे के हाथों से किया गया पिंडदान स्वीकार नहीं होता।
निष्कर्ष: परंपरा और तकनीक के बीच संतुलन की चुनौती
गया जी की मोक्ष भूमि पर पिंडदान को लेकर शुरू हुई यह बहस सिर्फ एक धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन की चुनौती बन गई है। सरकार को जहां समावेशिता और सुविधा का ध्यान रखना है, वहीं पंडा समाज की धार्मिक आस्था और परंपरा को भी सम्मान देना होगा।
यह सवाल अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है — क्या मोक्ष डिजिटल हो सकता है ?