साय सरकार की रणनीति से बस्तर में नक्सलवाद का पतन, लोकतंत्र और विकास की नई सुबह
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सुरक्षा, संवाद और विकास की त्रिस्तरीय रणनीति अपनाकर नक्सलवाद की कमर तोड़ दी है। मार्च 2026 तक प्रदेश को नक्सल-मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया गया है और इसके साथ ही बस्तर में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिल रहा है।

रायपुर, 27 जनवरी 2026 : कभी नक्सल हिंसा और पिछड़ेपन की पहचान रहा बस्तर अब विकास और लोकतंत्र की नई मिसाल बन रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने सुरक्षा और विकास को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई है, जिसके परिणामस्वरूप नक्सलवाद का अंत करीब है और बस्तर में शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और संस्कृति का नया अध्याय लिखा जा रहा है।
नक्सलवाद का अंत करीब
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने हाल ही में कहा कि 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल-मुक्त बनाने का लक्ष्य है। केंद्र सरकार के सहयोग से चल रही सुरक्षा रणनीति के तहत 90 प्रतिशत से अधिक नक्सली सरेंडर, गिरफ्तार या मारे जा चुके हैं। वर्ष 2025 में ही 1,500 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था। जनवरी 2026 में बीजापुर और गरियाबंद जिलों में दर्जनों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिन पर करोड़ों रुपये का इनाम था।
नियद नेल्लानार योजना बनी संजीवनी
साय सरकार ने बस्तर के विकास के लिए नियद नेल्लानार योजना शुरू की। इस योजना के तहत सुरक्षा कैंपों की परिधि में आने वाले गांवों को आवास, बिजली, पानी, सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। स्थानीय बोली में इसका अर्थ है “आपका अच्छा गांव”। इस योजना ने वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार की नई दिशा दी है।
शिक्षा और महिला सशक्तिकरण
- दो वर्षों में 300 से अधिक बंद स्कूलों को पुनः खोला गया।
- दुर्गम क्षेत्रों में पोटा केबिन स्कूल बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र बने।
- महिलाओं को महतारी वंदन योजना और गारमेंट फैक्ट्रियों से रोजगार मिला। दंतेवाड़ा की फैक्ट्रियों में बने कपड़े अब बड़े शहरों और विदेशों तक पहुंच रहे हैं।
पर्यटन और रोजगार
बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता और आदिवासी संस्कृति को पर्यटन के माध्यम से नई पहचान दी जा रही है।
- चित्रकोट, तीरथगढ़ और कांगेर घाटी जैसे स्थलों का विकास किया गया।
- धुड़मारास गांव को संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन ने सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव के उन्नयन कार्यक्रम के लिए चुना।
- पर्यटन से स्थानीय युवाओं को होमस्टे, गाइड सेवा, हस्तशिल्प और लोक कला में रोजगार मिला।
खेल और संस्कृति का उत्थान
- बस्तर ओलंपिक ने युवाओं को खेलों में नई दिशा दी।
- बस्तर पंडुम ने आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
- इन आयोजनों ने पर्यटन को भी बढ़ावा दिया और स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार मिला।
राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
बस्तर के कलाकार और समाजसेवक राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हो रहे हैं।
- अजय मंडावी, पंडी राम मंडावी और हेमचंद मांझी को पद्मश्री सम्मान मिला।
- वर्ष 2026 में बुधरी ताती और डॉ. रामचंद्र त्रयम्बक गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा।
लोकतंत्र की जीत
बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा के 41 गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया। दशकों तक नक्सली हिंसा से दूर रहे ये गांव अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। यह कदम बस्तर में शांति और विकास की नई शुरुआत का प्रतीक है।
निष्कर्ष
साय सरकार की रणनीति ने बस्तर को हिंसा और भय की पहचान से निकालकर विकास और लोकतंत्र की राह पर ला खड़ा किया है। मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण अंत का लक्ष्य तय है और इसके साथ ही बस्तर अब शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और संस्कृति का केंद्र बनकर उभर रहा है।



